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पढ़ाई का मकसद सिर्फ डिग्री नहीं 

सोनम वांगचुक  मैग्सेसे पुरस्कार विजेता 

सोनम वांगचुक का बचपन जम्मू-कश्मीर के लेह जिले की खूबसूरत वादियों में बीता। उनका परिवार लेह के एक सुदूर गांव अल्ची में रहता था। वहां एक भी स्कूल नहीं था। लिहाजा नौ साल की उम्र तक वह स्कूल नहीं जा सके। मां पढ़ी-लिखी थीं। उन्होंने बेटे को घर पर पढ़ाया। पापा राजनीति में थे। जब वह नौ साल के थे, पापा परिवार के संग श्रीनगर आ गए। मां को बेटे की पढ़ाई की बड़ी चिंता थी। श्रीनगर आते ही उन्होंने स्कूल में उनका एडमिशन करा दिया।
वांगचुक के लिए स्कूल के दिन बहुत खराब रहे। साथी बच्चों का रवैया उनके प्रति अच्छा नहीं था। दरअसल उनकी शक्ल बाकी बच्चों से अलग थी, लिहाजा सब उन्हें बाहरी समझते थे। भाषा को लेकर भी बड़ी परेशानी थी। मां उन्हें घर पर लेह की स्थानीय भाषा में पढ़ाया करती थीं, जबकि श्रीनगर में अंग्रेजी या उर्दू में पढ़ाया जाता था। उन्हें किताब में लिखे शब्द बिल्कुल समझ में नहीं आते थे। बोलचाल में भी दिक्कत आती थी। जब भी क्लास में टीचर उनसे कोई सवाल पूछते, वह चुपचाप खड़े हो जाते। उन्हें समझ में ही नहीं आता था कि उनसे क्या पूछा जा रहा है? क्लास के बच्चे उनकी खूब खिल्ली उड़ाते। सब कहते, यह बड़ा मूर्ख लड़का है। पता नहीं, कहां से आ गया स्कूल में? वह उदास रहने लगे। वांगचुक स्कूल के उन दिनों को याद करते हुए आज भी भावुक हो जाते हैं।   
धीरे-धीरे हालात सुधरने लगे। भाषा की दिक्क्त दूर हो गई और क्लास में उनके कई अच्छे दोस्त बन गए। पढ़ाई को लेकर उनका नजरिया एकदम अलग था। वह ज्ञान हासिल करने के लिए पढ़ना चाहते थे, डिग्री के लिए नहीं। 12वीं के बाद वह मैकेनिकल इंजीनिर्यंरग पढ़ना चाहते थे। इसे लेकर पापा से अनबन हो गई। वांगचुक कहते हैं, मेरी दिलचस्पी मैकेनिकल इंजीनियरिंग में थी, जबकि पापा चाहते थे कि मैं सिविल इंजीनिर्यंरग पढ़ूं। मैं भी अड़ गया। पापा नाराज हो गए। उन्हें लगा, मैं उनके खिलाफ जा रहा हूं।
उन्होंने 1987 में एनआईटी, श्रीनगर से इंजीनिर्यंरग की पढ़ाई पूरी की। घरवाले चाहते थे कि वह नौकरी करें, पर उनके मन में कुछ और ही चल रहा था। उन्हें अपने गांव के पुराने दिन याद थे। वह लेह के बर्फीले रेगिस्तान में रहने वाले बच्चों को पढ़ाना चाहते थे। ऐसे बच्चे, जो सुविधाएं न होने की वजह से शिक्षा से वंचित रह जाते थे। डिग्री हासिल करने के बाद वह अपने घर लेह लौटे। यहां 1988 में उन्होंने स्टूडेंट्स एजुकेशन ऐंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख की स्थापना की। उन्होंने उन बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, जो पढ़ाई में फिसड्डी थे या फिर बार-बार एक ही कक्षा में फेल हो रहे थे।
उनका मिशन सफल रहा। उनके द्वारा पढ़ाए गए तमाम छात्र इंजीनियर और वैज्ञानिक बने। कुछ छात्रों ने अपना बिजनेस शुरू किया और आज वे बहुत तरक्की कर रहे हैं। वांगचुक कहते हैं, मैंने डिग्री हासिल करने के लिए पढ़ाई नहीं की। मुझे इंजीनिर्यंरग में दिलचस्पी थी, इसलिए मैंने बीटेक किया। अब मैं अपने ज्ञान का इस्तेमाल समाज की बेहतरी के लिए करना चाहता हूं। मैं एक ऐसी यूनिवर्सिटी बनाना चाहता हूं, जहां बच्चे ज्ञान हासिल करें।  
साल 1994 में उन्होंने ऑपरेशन न्यू होप अभियान शुरू किया। इसका मकसद कमजोर छात्रों में पढ़ाई के प्रति दिलचस्पी पैदा करना था। इस दौरान करीब सात सौ टीचर्स को ट्रेनिंग दी गई। ट्रेनिंग के दौरान उन्हें सिखाया गया कि कैसे कमजोर बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि पैदा की जाए? नतीजे सुखद रहे। लद्दाख में मैट्रिक पास करने वालों की संख्या में भारी इजाफा हुआ। इस बीच एक समारोह में उनकी मुलाकात अभिनेता आमिर खान से हुई। आमिर उनकी सोच से बहुत प्रभावित हुए। थ्री इडियट्स   फिल्म में आमिर खान द्वारा निभाया गया फुनशुक वांगड़ू का किरदार उनके जीवन से प्रभावित था।
सुदूर बर्फीले इलाकों में पानी किल्लत बड़ी समस्या थी। खासकर खेती करने वाले किसानों को पानी की वजह से काफी परेशानी झेलनी पड़ती थी। वांगचुक ने अपने साथियों के साथ मिलकर इस समस्या का समाधान खोजा। उन्होंने स्थानीय लोगों की मदद से बर्फ के स्तूप बनाने का तरीका खोज निकाला। अपनी टीम की मदद से उन्होंने तमाम गांवों में कड़ाके की ठंड में बर्फ के स्तूप तैयार किए। गरमी में इन स्तूपों के पिघलने से किसानों को पानी मिलने लगा। वांगचुक बताते हैं, स्तूप बनाने की प्रेरणा मुझे चवांग के एक ग्रामीण नॉर्फेल से मिली। उन्होंने कृत्रिम ग्लेशियर्स बनाए थे। करीब 40 मीटर ऊंचे स्तूप से 10 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई का पानी मिल जाता है। सर्दियों में तैयार किए गए स्तूप जून-जूलाई तक बने रहते हैं। यही नहीं, उन्होंने लेह में सोलर पावर से तमाम इलाकों को रोशन किया। पूरी दुनिया में उनके काम की तारीफ होने लगी। 2008 में उन्हें रीयल हीरो और 2017 में ग्लोबल अवॉर्ड फॉर सस्टेनेबल आर्किटेक्चर से सम्मानित किया गया। हाल में उन्हें प्रतिष्ठित रमन मैग्सेसे पुरस्कार से नवाजा गया है।
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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