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17 फरवरी, 2020|10:31|IST

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शहीदों की चौखट चूमने का जुनून

वह कमरे में दाखिल हुईं और नीचे बिछी कालीन पर सिर झुकाए बैठ गईं। दोनों के बीच की खामोशी जैसे सदियां समेटे थी। वह एक मां और उसके शहीद बेटे के सोगवार के बीच की खामोशी थी। कारगिल की जंग में 19 साल का उनका जांबाज टाइगर हिल पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर गया था। ग्रेनेडियर उदयमान सिंह की गमजदा मां से हुई उस मुलाकात के लंबे मौन ने विकास मन्हास को जैसे हिला दिया। मन्हास को कोई सिरा नहीं सूझ रहा था कि वह उस मां को क्या कहें? एक घंटे तक दोनों ने कुछ नहीं बोला। उसके बाद उदयभान की मां ने ही पूछा, ‘आप चाय पिएंगे?’ फिर शब्दों का सिलसिला चल पड़़ा। हजार बातें और फिर कमरे की एक तस्वीर पर जाकर उन दोनों की नम आंखें ठहर गई थीं- ‘यह उसकी आखिरी तस्वीर है।’
कारगिल जंग के बाद से ही विकास मन्हास शहीदों के परिवार की पावन यात्रा करते आ रहे हैं। किसी-किसी साल तो वह ग्यारह महीने सफर में ही रहे। अब तक 200 से भी अधिक दिवंगत वीरों के घर की माटी चूम चुके मन्हास जम्मू-कश्मीर के भदेरवाह के हैं। जम्मू यूनिवर्सिटी से बीएससी करने के बाद उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय से मैनेजमेंट स्टडीज में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है।
फौजियों और शहीदों के प्रति उनके गहरे सम्मान का वाकया कारगिल से बहुत पहले का है। बात 1994 की एक रात की है। गरमियों की छुट्टी में मन्हास एक पारिवारिक शादी में शिरकत करने के लिए अपने शहर आए थे। एक रात खाने से पहले सैर के इरादे से वह घर से बाहर निकले। उन्हें कतई इलहाम न था कि उनका शहर सूरज ढलते ही कफ्र्यू की जद में आ जाता है। मन्हास ने अभी कुछ ही डग भरे होंगे कि एक तेज रोशनी उनकी आंखों में बलात् घुस आई और उसके साथ कड़कती आवाज भी- रुको! खौफ के मारे जिस्म को जैसे काठ मार गया था। चंद सेकंडों में मन्हास की चेतना लौटी और वह दौड़ते हुए अपने घर की तरफ भागे। घर में घुसते ही मुख्य दरवाजा बंद किया और परिवार के लोगों के बीच आकर बैठ गए।
कुछ ही मिनटों में दरवाजे पर थाप सुनाई पड़ी। फौजियों की एक टुकड़ी सामने थी, ‘हमने एक आतंकी को इस घर में घुसते देखा है।’ मन्हास के चाचा ने इससे इनकार किया, मगर मन्हास ने पूरी हिम्मत बटोरकर कहा कि आप लोगों ने जिसे देखा है, वह मैं ही हूं और मैं दहशतगर्द नहीं। 
वह खुशकिस्मत थे कि जवानों ने गोलियां नहीं दागी थीं। फौजी लौट गए। लेकिन इसके कुछ ही देर बाद अचानक गोलियों की आवाज से पूरा इलाका थर्रा उठा। बहुत देर तक वह मनहूस आवाज गूंजती रही। सुबह खबर सरेआम थी कि चौकी पर आतंकियों ने घात लगाकर हमला बोला, जिसमें आठ में से सात सैनिक शहीद हो गए। अकेला बचा सैनिक रात भर आतंकियों से लोहा लेता रहा, मगर उसने चौकी को लुटने नहीं दिया।
उन दिनों फौजियों के शव उनके घर नहीं भेजे जाते थे, बल्कि अंतिम संस्कार के बाद अवशेष की पोटली उनके अपनों तक पहुंचाई जाती थी। इस एहसास ने मन्हास को द्रवित कर दिया कि शहीदों के परिजन अपने लाडलों के आखिरी दर्शन भी नहीं कर पाएंगे। वह उन सातों जवानों की अर्थियां जलते देख रो पड़े। तभी उनके मन में यह बीज पड़ा कि वह शहीदों के घरवालों के दर्द को साझा करने अकेले जाएंगे।
कारगिल जंग के वक्त सरकार ने फैसला किया था कि शहीदों के शव उनके अपनों तक ससम्मान पहुंचाए जाएंगे। तब मीडिया में बहादुर बलिदानियों की तफसीलें आने लगी थीं। मन्हास के लिए शहीदों के घर तक पहुंचना आसान हो गया। ग्रेनेडियर उदयमान सिंह के घर की तरफ वह पहली बार बढ़े थे। यह एक दर्दनाक स्थिति से दूसरी पीड़ादायक स्थिति तक का ऐसा सफर रहा, जिसने मन्हास की जिंदगी को एक मकसद दे दिया। और नौकरी करते हुए भी उन्होंने इस मकसद को निबाहा।
साल 2007-11 तक मन्हास बौद्धिक संसाधन से जुड़ी बेंगलुरु की एक कंपनी क्रॉसटीम कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े थे। कंपनी के काम से उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों में जाना पड़ता था। लेकिन उनके जज्बे को देखते हुए कंपनी ने मन्हास को यह इजाजत दे रखी थी कि वह बिजनेस दौरे के दौरान भी शहीदों के घर का भ्रमण कर सकते हैं। मगर उनके मन में तो वे परिवार और परिजन उमड़-घुमड़ रहे थे, जो किसी अपने के शहीद होने के गौरव और पीड़ा को जीते हैं।
मन्हास 2011 में जो जम्मू लौटे, तो उन्होंने अपनी ही ट्रेवल कंपनी शुरू कर दी। इससे उन्हें पर्याप्त वक्त मिल गया कि वह अपनी इच्छा आसानी से पूरी कर सकें। उनके पास शहीदों के परिजनों की ऐसी-ऐसी कहानियां हैं कि कठोर से कठोर इंसान के लिए भी आंसू थामना मुश्किल हो जाए। मन्हास न सिर्फ उनकी कहानियां एक-दूसरे से साझा करते हैं, बल्कि पिछले 20 वर्षों में अनेक शहीदों के परिवार से उनका अपनापा सा हो चुका है। 
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह

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