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हर जन्म में सैनिक बनना चाहता हूं

दीपचंद प्रख्यात  लांस नायक 

हरियाणा के हिसार गांव के रहने वाले दीपचंद देशभक्ति की कहानियां सुनकर बड़े हुए थे। यहीं से उनके अंदर सैनिक बनकर देश-सेवा का जज्बा पैदा हुआ। बचपन में दादाजी आजादी की लड़ाई के किस्से सुनाया करते थे। शहीदों की कहानी सुनाते वक्त कई बार उनकी आंखों में आंसू आ जाया करते थे। दीपचंद बताते हैं, दादाजी ने मुझे बताया  कि 1947 के दौरान कैसे आजादी के मतवाले देश पर कुर्बान होने को आमादा थे। मैंने उनसे 1965 की जंग के बारे में भी काफी कुछ जाना। क्या दौर रहा होगा, जब हमारे जवान सीमा पर कुर्बानी दे रहे थे और गांव में लोग उनकी सलामती की दुआएं कर रहे थे। वे किस्से आज भी मुझे रोमांचित करते हैं। 
बचपन में ही दीपचंद ने तय कर लिया था कि बड़े होकर सैनिक बनूंगा। दादाजी ने उनका हौसला बढ़ाया। 1989 में उनका सपना पूरा हुआ। वह सेना में भर्ती हो गए। दीपचंद बताते हैं, सेना की वर्दी पहनकर कितना नाज हुआ खुद पर यह मैं बयां नहीं कर सकता। लाइट रेजिमेंट से मेरे सैन्य करियर की शुरुआत हुई। पहली तैनाती फिरोजपुर (पंजाब) में हुई। फिर, ऑपरेशन रक्षक के दौरान उन्हें कश्मीर भेजा गया। उन दिनों घाटी में आतंकवाद बड़ी तेजी के साथ पांव पसार रहा था। लिहाजा वहां हर पल जान को खतरा था। कश्मीर जाने की बात सुनकर घरवालों को चिंता हुई, पर वह बेफिक्र थे। घाटी में हर दिन आतंकी वारदातों से सामना होने लगा, पर वह कभी नहीं घबराए। 
मई 1999 में कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ की खबर आई। तब वह गुलबर्ग में तैनात थे। उनकी रेजिमेंट को कारगिल जाने का आदेश मिला। जवानों की टीम कारगिल की पहाड़ी की ओर चल पड़ी। दीपचंद बताते हैं, हम जवानों में भारी जोश था। हम दुश्मन को सबक सिखाने को आतुर थे। कारगिल पहाड़ की चोटी बहुत नुकीली थी, इसलिए वहां चढ़ना बहुत मुश्किल था, लेकिन हमारे जोश के आगे हर मुश्किल आसान बन गई।  कारगिल की लड़ाई आसान नहीं थी। दुश्मन देश के घुसपैठिए काफी अंदर तक आ चुके थे। उन्हें भगाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा। सैनिकों को बिना खाए-पीए कई दिनों तक लड़ना पडा। दीपचंद बताते हैं, हमें अपने खाने-पीने की कोई चिंता नहीं थी। युद्ध के दौरान हम सैनिकों को भूख नहीं लगती थी। हमारे लिए देश पहले, बाद में कुछ और था। हमें बस एक बात की फिक्र थी कि दुश्मन को कैसे मिटाया जाए? लड़ाई के दौरान हमने राशन नहीं मांगा। बस गोला-बारूद मांगा, ताकि दुश्मन को खत्म कर सकें। 
कारगिल की लड़ाई के दौरान सैनिक लगातार दुश्मन से मोर्चा ले रहे थे। बीच-बीच में जब फार्यंरग और धमाके शांत होते, तो उनके मन में साथी सैनिकों को लेकर चिंता बढ़ जाती। वह जानना चाहते कि बाकी मोर्चों पर क्या हाल हैं? दीपचंद बताते हैं, हमारे पास मोबाइल फोन नहीं थे। बाहर की दुनिया से हमारा कोई संपर्क नहीं था। विविध भारती  से हमें खबरें मिलती थीं। मुझे आज भी याद है। हम बड़ी उत्सुकता से समाचार सुनते थे। साथी सैनिकों की खबरें को लेकर बड़ी दिलचस्पी होती है। भारत ने 84 दिनों में यह जंग जीत ली। 
कारगिल युद्ध के दो साल बाद 13 दिसंबर, 2001 को दिल्ली में संसद पर आतंकी हमला हो गया। यह हमला भी पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने किया था। एक बार फिर भारत-पाकिस्तान सीमा पर तनाव फैल गया। सीमा पर हलचल थी। हमारे सैनिक देश की रक्षा को लेकर मुस्तैद थे। हमले के बाद ऑपरेशन पराक्रम के दौरान दीपचंद की रेजिमेंट को राजस्थान सीमा के करीब तैनात किया गया। उसी दौरान एक दिन गोला-बारूद ले जाते समय धमाका हो गया। दीपचंद बताते हैं, रविवार का दिन था। बारूद का बक्सा अचानक फटा और मैं बुरी तरह घायल हो गया। मेरे दोनों पैरों के चीथड़े उड़ गए। मैंने बाएं हाथ से दाहिने हाथ को थामने की कोशिश की। इसके बाद आंखें खुलीं, तो अस्पताल में था। जिस वक्त यह हादसा हुआ, उनका बेटा मात्र डेढ़ साल का था। पत्नी गर्भवती थीं। किसी को उम्मीद नहीं थी कि उनकी जान बच पाएगी। डॉक्टरों ने कहा कि उनके बचने की संभावना सिर्फ पांच फीसदी है। खैर, जान तो बच गई, लेकिन दाहिना हाथ और दोनों पैर काटने पड़े। दीपचंद कहते हैं, 24 घंटे बाद होश आया, तो पता चला कि पैर नहीं हैं। दाहिना हाथ भी कट गया। लेकिन कोई गम नहीं है। अगले जन्म में भी मैं सैनिक बनकर देश की सेवा करना चाहूंगा। 
हादसे के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। छह महीने बाद अस्पताल से लौटने के बाद खुद को संभाला। चूंकि कमर के नीचे से पैर कटे थे, लिहाजा कृत्रिम पैर लगाना मुश्किल था। उन्होंने अपने कमांडर से बात की। उनके लिए विशेष कृत्रिम पैर डिजाइन किए गए। आज उन कृत्रिम पैरों के दम पर वह गाड़ी चलाते हैं। दीपचंद कहते हैं, मेरे दो बेटे हैं। मैंने एक बेटी गोद ली। मैं बहुत खुश हूं। मुझे कभी नहीं लगता कि मैं अपाहिज हूं। ईश्वर ने मुझे देश-सेवा करने का मौका दिया। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? 
 प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी
 

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