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शिक्षा के जरिए बदलें अपनी तकदीर  

मैरी मेकर

मैरी मेकर का जन्म सूडान में हुआ। बचपन गोलीबारी और बम धमाकों के साये में गुजरा। पापा सेना में थे। वह जंग के मैदान में जूझ रहे थे और मां गांव में अकेले बच्चों के संग संघर्ष कर रही थीं। पापा ने दो शादी की थी। मां उनकी दूसरी पत्नी थीं। पहली बीवी से पापा के कई बच्चे थे, जो पड़ोसी मुल्क केन्या में रहते थे। मां गरीब परिवार की थीं, इसलिए उनके माता-पिता ने एक शादीशुदा आदमी से उनकी शादी कर दी। शादी के वक्त मां की उम्र मात्र 16 साल थी। शादी के अगले चार साल में ही वह तीन बच्चों की मां बन गईं। उनकी सेहत खराब रहने लगी। 

इस बीच पापा जंग में चले गए। इधर गांव पर विरोधी समुदाय के गुटों ने हमला कर दिया। भयानक तबाही का मंजर था। मैरी तब महज चार साल की थीं, छोटी बहन दो साल की। मां उस समय भी गर्भवती थीं। वह सुरक्षित जगह की तलाश में दोनों बेटियों के संग निकल पड़ीं। आसपास के इलाकों के तमाम लोग उनके साथ थे। वे सब जान बचाने के लिए भटक रहे थे। कई दिन पैदल चलना पड़ा। मां की हालत खराब थी। दो छोटी बेटियां और तीसरा बच्चा पेट में। भूख-प्यास के मारे बुरा हाल था। पर वे लगातार नंगे पांव चलती रहीं। कई दिनों की यात्रा के बाद सब केन्या की सीमा पर पहुंचे। सीमा पार करने के बाद काकुमा शरणार्थी कैंप में ठिकाना मिला। कैंप में सैकड़ों शरणार्थी पहले से थे। मैरी कहती हैं- कैंप में सबसे अच्छी बात यह लगी कि वहां शांति थी। बम धमाके या गोलियां चलने की आवाजें नहीं आ रही थीं। वहां हमें कई रिश्तेदार और गांव के लोग मिले।
मैरी तीन साल इस शरणार्थी कैंप में रहीं। इस बीच पापा कुछ दिनों की छुट्टी पर वहां आए। उन्होंने मैरी को अपने भाई के घर नाकूरू इलाके में भेज दिया। वहीं उनकी मुलाकात सौतेली मां से हुई। सौतेली मां का व्यवहार बहुत अच्छा था। मैरी अपने सौतेले भाई-बहनों के संग स्कूल जाने लगीं। उन्हें नई यूनीफॉर्म पहनने को मिली। क्लास का पहला दिन बहुत शानदार था। बच्चों के संग हंसने-खेलने का मौका मिला। पर चाचा को उनका स्कूल जाना पसंद न था। वह मानते थे कि लड़कियों की पढ़ाई पर पैसे खर्च करना बेकार है। उन्होंने स्कूल की फीस नहीं जमा की, इसलिए स्कूल से मैरी का नाम कट गया। जब पापा को यह बात पता लगी, तो उन्होंने बेटी को बोर्डिंग स्कूल भेज दिया। मैरी कहती हैं- पापा पढ़ाई की अहमियत समझते थे। उन्होंने मुझे समझाया कि मैं पढ़ाई के जरिए अपनी तकदीर बदल सकती हूं। 

इसी बीच मां ने शरणार्थी कैंप में दो और  बेटियों को जन्म दिया। परिवार में सब चाहते थे कि बेटा पैदा हो। पांचवीं बार बेटा पैदा हुआ, पर जश्न मनाने के लिए मां जिंदा नहीं बचीं। बाद में उस भाई की भी मौत हो गई। मैरी कहती हैं-  जब मैं 13 साल की थी, मां का निधन हो गया।  यह 2009 की बात है। मैं उन्हें अंतिम बार देखना चाहती थी, लेकिन इजाजत नहीं मिली। कुछ दिनों के बाद पापा स्कूल आए। उन्होंने कहा कि बहनों में तुम सबसे बड़ी हो, इसलिए अब उनकी जिम्मेदारी तुम पर है। 

परीक्षा के बाद मैरी बहनों से मिलने शरणार्थी कैंप पहुंचीं। तीनों बहनों से लिपटकर वह खूब रोईं। अब बहनों की परवरिश करने वाला कोई न था। पापा जंग के लिए जा चुके थे। मैरी कहती हैं- ईश्वर ने हम पर कृपा की। हमारी एक रिश्तेदार बहनों को पालने के लिए राजी हो गईं। मैं बोर्डिंग स्कूल वापस चली आई। लेकिन हमेशा उनकी फिक्र लगी रहती थी। 

मैरी अभी मां की मौत के गम से उबर भी नहीं पाई थीं कि खबर आई कि पापा नहीं रहे। यह  2012 की बात है। लगा सब कुछ खत्म हो गया। पढ़ाई से मन उचट गया। साल 2015 में हाईस्कूल की परीक्षा में उन्हें सी ग्रेड मिला। स्कूल की फीस जमा नहीं थी, इसलिए स्कूल जाना बंद हो गया। अपनी एक सहेली के सुझाव पर मैरी र्ने ंप्रसिपल से मिलने का फैसला किया। बारिश में तरबतर वर्ह ंप्रसिपल ऑफिस पहुंचीं। मैरी कहती हैं- मैं ठंड से कांप रही थी। मुझे देखकर्र ंप्रसिपल को दया आ गई। उन्होंने न सिर्फ मेरी फीस जमा की, बल्कि यूनीफार्म और खाने-पीने का इंतजाम भी करा दिया। इस बार उन्होंने खूब मेहनत की। 11वीं में अच्छे अंक आए। मैरी स्कूल की हेडगर्ल बन गईं। 

इस बीच रिश्तेदार उन पर शादी के लिए दबाव बनाने लगे। बहनों के लिए भी शादी के प्रस्ताव आने लगे, लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी। हाईस्कूल पास करने के बाद मैरी ने  अपनी तीनों बहनों को स्कूल भेजा। पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके पास कई विकल्प थे, पर उन्होंने टीचर बनने का फैसला किया। उन्होंने केन्या और सूडान में शरणार्थी बच्चों की शिक्षा का अभियान शुरू किया। साथ ही सामुदायिक नफरत खत्म के लिए लोगों को जागरूक करने लगीं। इन दिनों मैरी काकुमा इलाके में बच्चों को पढ़ाती हैं। मैरी कहती हैं- मेरी क्लास में 120 बच्चे हैं। ये सर्ब ंहसा प्रभावित इलाके के हैं। ये अलग-अलग समुदायों के हैं। साथ खेलते हैं, पढ़ते हैं और साथ में खाते हैं। हम शिक्षा के जरिए इनकी तकदीर बदलना चाहते हैं।
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 23 december