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महिलाओं के बिना लोकतंत्र संभव नहीं 

सूडान के एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी अला सलह ने बचपन से अपने मुल्क में नागरिक अधिकारों का हनन देखा। घर में सामाजिक मसलों पर चर्चा होती रहती थी। मम्मी-पापा की बातचीत से देश में वर्षों से कायम तानाशाही का दर्द समझा। उनके मन में यह धारणा घर कर गई कि यदि देश में लोकतंत्र कायम हो जाए, तो लोगों की जिंदगी आसान हो जाएगी। 
22 वर्षीय अला यूनिवर्सिटी में इंजीनिर्यंरग की पढ़ाई कर रही है। अला बताती है, मेरी मम्मी फैशन डिजाइनर हैं और पापा निर्माण बिजनेस में। वे खुले विचारों के हैं। उन्होंने मुझे पढ़ने और करियर चुनने की आजादी दी। स्कूली पढ़ाई के बाद खारतूम प्रांत की सूडान इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में उनका दाखिला हो गया। यूनिवर्सिटी में आने के बाद अला राजनीतिक और सामाजिक मसलों पर आयोजित होने वाली बहसों में हिस्सा लेने लगी। यूनिवर्सिटी में लड़कियों की समस्याओं, खासकर भेदभाव जैसे मुद्दों को लेकर वह काफी मुखर रही। कॉलेज के लड़के-लड़कियां उनकी बेबाकी के कायल थे। जब भी छात्रों से जुड़ी कोई समस्या आती, वे पहुंच जाते उनके पास। कई बार उन्होंने यूनिवर्सिटी प्रशासन से छात्र समस्याओं को लेकर बहस की और उसे हल कराया। अध्यापकों को भी लगने लगा था कि यह लड़की आने वाले समय में बड़ा काम करने वाली है। 
इस बीच देश में ओमर अल बशीर सरकार के खिलाफ आवाज उठने लगी। यूनिवर्सिटी कैंपस में भी इस पर चर्चा हुई। अला ने इस मसले पर छात्राओं की राय जानने के लिए उनसे बात की। शुरुआत में लड़कियों को लगा कि उन्हें इन मसलों से दूर रहना चाहिए। जाहिर है, उनके माता-पिता भी नहीं चाहते थे कि बेटियां सियासी मसलों में किसी तरह से हस्तक्षेप करें। कुछ लड़कियां, जो उनका साथ देना चाहती भी थीं, वे भी चुप रहीं, क्योंकि उन्हें डर था कि राजनीति के चक्कर में कहीं उनकी पढ़ाई न छूट जाए। 
हालांकि इस दौरान कैंपस में तानाशाही के खिलाफ माहौल बन चुका था। सभी को लगता था कि देश में सत्ता परिवर्तन होना चाहिए। लोगों को अपनी पसंद की सरकार चुनने का मौका मिलना चाहिए, लेकिन इस मुद्दे पर खुलेआम मांग उठाने की किसी में हिम्मत नहीं थी। 
बात पिछले साल दिसंबर की है। सूडान में अचानक सरकार-विरोधी आंदोलन शुरू हो गए। लोग आर्थिक सुधार की मांग करने लगे, ताकि आम जनता को महंगाई, गरीबी और बेरोजगारी से राहत मिल सके। सरकार ने जब उनकी ओर ध्यान नहीं दिया, तो सत्ता परिवर्तन की मांग बढ़ी। देश में जगह-जगह धरना-प्रदर्शन होने लगे। लोगों में खासकर ब्रेड के दाम बढ़ने को लेकर भयानक गुस्सा था। हालात बिगड़ते गए और आंदोलन तेज होता गया। तत्कालीन राष्ट्रपति ओमर अल बशीर ने फरवरी में आपातकाल घोषित कर दिया। इसके बाद तो जनता का गुस्सा और भड़क गया। 
अला के मन में बहुत बेचैनी थी। वह भी सरकार के खिलाफ आवाज उठाना चाहती थी, पर समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। वह महिलाओं को जगाना चाहती थी। अला का मानना है, बंदूक की गोली किसी की हत्या नहीं करती, बल्कि लोगों की चुप्पी करती है। इसलिए हमें अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना चाहिए। दरअसल, इस साल फरवरी तक सूडान में जारी आंदोलन में केवल पुरुष सक्रिय थे। महिलाओं की भागीदारी नहीं के बराबर थी। मार्च महीने में उन्होंने हिम्मत जुटाई और अपनी सहेलियों के संग प्रदर्शन करने चल पड़ी। 
हालांकि यह आसान नहीं था। आंदोलन के नाम पर लड़कियां उनके संग आने को राजी नहीं थीं। शुरुआत में उनके साथ केवल छह महिलाएं थीं। वह उनके संग क्रांति के गीत गाती हुई प्रदर्शन करने लगी। कारवां बढ़ता गया। जल्द ही सैकड़ों महिलाएं साथ आ गईं। 
अला के नेतृत्व में 7 और 8 अप्रैल को राष्ट्रपति महल के सामने महिलाओं ने बड़ा प्रदर्शन किया। इस दौरान उनकी एक तस्वीर वायरल हुई। तस्वीर में वह सफेद रंग का दुपट्टा ओढ़कर नारे लगाती नजर आ रही है। फोटो देखकर लोग उन्हें ‘लेडी लिबर्टी ऑफ सूडान’ कहने लगे। तमाम अखबारों और टीवी चैनलों पर उनके बारे में चर्चा होने लगी। इसके बाद सूडान में जनांदोलन ने रफ्तार पकड़ी। राष्ट्रपति अल बशीर को सत्ता से हटना पड़ा। बशीर की जगह अहमद अवाद इबन आउफ के नेतृत्व में ट्रांजिसनल कौंसिल गठित हो गई। गौरतलब है कि बशीर पर जनसंहार का आरोप है। उनके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में मामला चल रहा है। आंदोलनकारी अब इस मांग पर अड़े हैं कि सूडान में नागरिक परिषद् का गठन होना चाहिए। 
दिलचस्प बात यह है कि सूडान में जारी आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी 70 फीसदी  हो गई है। सोशल मीडिया पर फोटो वायरल होने के बाद अला को जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं। अला ने ट्विटर पर लिखा, धमकी देने वाले मुझे डराना बंद करें। मैं पीछे हटने वाली नहीं हूं। हमें लोकतंत्र चाहिए। हम महिलाओं का संघर्ष जारी रहेगा।
(प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी)

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