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गुलामों से आजाद सिंध मेरा सपना

पाकिस्तान के सिंध सूबे में एक गांव है अल्लाहदीनो शाह। यहीं पर एक भूमिहीन परिवार में वीरू कोहली का जन्म हुआ था। वीरू के पिता खेतों में मजदूरी कर अपने परिवार का किसी तरह पेट पालते थे। वह पिता की चहेती थी। वीरू जब 16 साल की हुई, तो गांव की और लड़कियों की तरह पिता ने अपनी हैसियत के हिसाब से एक अच्छा घर देखकर बेटी के हाथ पीले कर दिए। 
पर नियति में कुछ और बदा था। वीरू के बाबा को पता ही न था कि उसके ससुराल वाले किसी जमींदार के यहां बंधुआ मजदूर हैं। परिवार ने मालिक से जो कर्ज लिया था, वह कभी अदा ही नहीं हुुआ। शुरू-शुरू में वीरू समझ ही नहीं पाती थी कि आखिर कर्ज खत्म क्यों नहीं होता, जबकि परिवार की पूरी कमाई उसे चुकाने में ही खप जाती है? वीरू के जब दो बच्चे हुए, तभी से उन्होंने खेतों में काम करना शुरू कर दिया था। उन्हें पैसों की सख्त दरकार थी। बच्चे भी उनके साथ-साथ घास काटते और मवेशियों के गोबर उठाते। वीरू उन दिनों को याद करके कुछ भावुक हो जाती हैं- ‘वह नरक भरी जिंदगी थी। हम जी-तोड़ मेहनत करते, पर हमारा कर्ज बढ़ता ही जाता। कोई किसी के प्रति जवाबदेह न था। मेरे बच्चों को कभी खाना मिलता और कभी वे भूखे ही सो जाते। कई बार तो हम जंगलों में कुदरती रूप से उगी सब्जियां ढूढ़कर लाते और उनको कच्चा खाकर ही अपना पेट भरते थे।’
करीब 17 साल तक वीरू का परिवार उस जमींदार की बेगारी-चाकरी में जुटा रहा, और आखिरकार उन्होंने रिश्तेदारों से कर्ज लेकर किसी तरह उससे छुटकारा पाया। इसके बाद उमरकोट के एक खेत मालिक के यहां उन्हें काम मिला। वीरू और परिवार को उम्मीद थी कि नया मालिक पुराने मालिक जितना जालिम नहीं होगा, पर जल्द ही उनका भरम टूट गया। यह नया मालिक भी गुलामी कराने वाला था। इसके यहां भी कर्ज कभी नहीं चुक पाते थे। वीरू और उन जैसे बदकिस्मत मजदूर परिवारों को दड़बेनुमा झोंपड़ियों में रखा गया था, जिनके चारों तरफ संगीनधारियों का सख्त पहरा होता। ये पहरेदार भी कम अत्याचारी न थे। खास तौर से औरतों और लड़कियों पर इनकी बुरी निगाह होती थी। औरतों को डराने के लिए वे उन्हें धमकाते या फिर उनके सामने ही पति की पिटाई कर देते थे।
कहने को तो पाकिस्तानी हुकूमत ने 1992 में ही बंधुआ मजदूरी को गैर-कानूनी बना दिया था, मगर हकीकत में अब भी ईंट भट्ठा, खेती, खनन व मछली पालन जैसे कारोबारों में इसकी पकड़ मजबूत है। इनकी बेबसी का आलम यह था कि जब भी मालिक को किसी गुलाम की बेटी पसंद आ गई, तो वे उसे बुला लेते और उसका जबरिया धर्म-परिवर्तन करा देते। वीरू मुश्किल से अपने जज्बात को काबू में करती हैं- ‘हम आठ परिवारों के करीब 45 लोग थे, जो दो साल तक उसकी कैद में रहे। वह मेरे बच्चों को तो मारता-पीटता था ही, उसने मुझे अपनी बेटियों की शादी तक नहीं करने दी। हम गुजारिश करते, मगर वह हमें आजाद करने को राजी न था।’
1998 में एक दिन वीरू अपने बेटे के साथ वहां से किसी तरह भागने में कामयाब हो गईं। भागकर वह अपने भाइयों के पास पहुंचीं। भाइयों ने जमींदार के कर्ज के 60 हजार रुपये जुटाए और जब वे उसके पास बाकी घरवालों को आजाद कराने के लिए पहुंचे, तो कर्ज आठ लाख बताकर उसने उन्हें छोड़ने से इनकार कर दिया। और धमकी दी कि वीरू की बेटियों को बेचकर वह अपनी कर्ज वसूलेगा। वीरू ने मानवाधिकार आयोग का नाम सुन रखा था। वह उसके अधिकारियों से मिलीं। अफसरों ने उसे उमरकोट के पुलिस अधिकारी के पास भेजा। मगर कुछ होता न देख, वह पुलिस मुख्यालय में तीन दिनों तक धरने पर बैठी रहीं, जब तक कि एक पुलिस कप्तान खुद उनके साथ गुलामों को आजाद कराने के लिए साथ चलने को तैयार न हुए। जाहिर है, तब जमींदार के गुर्गों ने उन सबको आजाद करने में ही अपनी भलाई समझी। 
इसके बाद वीरू और उनके पति की दुनिया ही बदल गई। वीरू को एक बहादुर औरत के रूप में देखा जाने लगा। वीरू कहती हैं, ‘आजाद होने के बाद मैंने महसूस किया कि हमारी असली जंग अब शुरू हुई है। मैंने इरादा किया कि हमने जिस दर्द को भोगा है, उससे औरों को भी निजात दिलाऊंगी।’ उन्होंने पूरे पाकिस्तान में घूम-घूमकर गुलामी प्रथा और बंधुआ मजदूरी के खिलाफ प्रचार शुरू कर दिया। साल 2009 में वीरू को इसके लिए प्रतिष्ठित ‘फ्रेडरिक डगलस फ्रीडम अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया। 
साल 2013 में वीरू ने सिंध असेंबली के लिए बतौर आजाद उम्मीदवार चुनाव भी लड़ा, मगर वह जीत न सकीं। उन्हें मैदान से हटने के लिए बलात्कार और जान से मारने तक की धमकियां मिलीं, मगर वह नहीं झुकीं। गुलामी और बंधुआ मजदूरी के खिलाफ वीरू की मुहिम जारी है। हाल ही में पाकिस्तान की 50 प्रेरक महिलाओं में एक वीरू कोहली को भी शामिल किया गया है। जमींदार और कुछ नेता उनकी मुहिम से बेहद खफा हैं, मगर वह कहती हैं कि मेरा सपना गुलामों से आजाद सिंध है और इसके लिए मैं हर कीमत देने को तैयार हूं। 
प्रस्तुति: चंद्रकांत सिंह

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  • Web Title:jina isi ka naam hai Hindustan column on 19 may