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अब पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहती

जीना इसी का नाम है

श्रीनगर से ताल्लुक रखने वाली अफशां संयुक्त परिवार में पली-बढ़ीं। शुरू से परिवार पर परंपरागत सोच हावी थी। बेटियों को स्कूल जाने की इजाजत थी, लेकिन घर की बाकी महिलाओं की तरह उन्हें भी परदे में रहने की हिदायत थी। हालांकि बिजनेसमैन पिता का बच्चों के प्रति कभी सख्त रवैया नहीं रहा। 
अफशां ने बचपन से परिवार की बड़ी-बूढ़ी महिलाओं को परदे में देखा। घर के फैसलों में मर्दों की मर्जी का चलना आम बात थी। इसे लेकर कभी किसी महिला ने आवाज नहीं उठाई। पड़ोस, रिश्तेदारी में भी उन्होंने बेटियों को स्कूल जाते तो देखा, लेकिन उनमें से किसी को नौकरी करते नहीं पाया। बातचीत में कभी किसी लड़की ने उनसे करियर को लेकर बात नहीं की। लेकिन अफशां का मिजाज उनसे बिल्कुल जुदा था। स्कूल के दिनों से ही उन्हें फुटबॉल खेलने का शौक चढ़ गया। वह स्कूल की टीम में खेलने लगीं। घरवालों को पता चला, तो वे नाराज हुए। इससे पहले खानदान की किसी बेटी ने खेल में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। 
परिवारवाले चाहते थे कि बेटी पढ़-लिखकर शादी करे और अपना घर संभाले। सबसे ज्यादा उन्हें समाज का डर था। लोगों को पता चला, तो क्या कहेंगे! लोगों को इस बात पर घोर आपत्ति थी कि लड़कियां लड़कों की तरह कपड़े पहनकर बिंदास भागे-दौड़ें। पर अफशां कहां मानने वाली थीं। उन्होंने तय कर लिया कि वह तो फुटबॉलर ही बनेंगी। पापा बिल्कुल नहीं चाहते थे कि बेटी खिलाड़ी बने। भाई भी खुश नहीं थे। लेकिन अफशां की जिद पर उन्होंने बेमन से इजाजत दे दी। आगे वही हुआ, जिसका डर था। उन्होंने जब फुटबॉल खेलना शुरू किया, तो पड़ोसियों ने उनके पापा और भाइयों को ताने मारे। अफशां कहती हैं, जब मैंने खेलना शुरू किया, तो पड़ोसी मेरे भाई को चिढ़ाते थे। उन्हें शर्मिंदा किया जाता था। 
शुरुआत में काफी संघर्ष करना पड़ा। घरवाले उनसे नाराज थे। पर जब राज्य टीम में उनका चयन हुआ, तो परिवार का रवैया बदल गया। उन्होंने एक के बाद कई मैच जीते। कोच उनकी तारीफ करने लगे। यही नहीं, उन्हें राज्य फुटबॉल महिला टीम का कैप्टन चुना गया। अफशां कहती हैं, पहले घरवाले खुश नहीं थे। मगर जब मैं मेडल जीतने लगी और मेरी तारीफ होने लगी, तब परिवारवालों को लगा कि वाकई मैं कुछ अच्छा काम रही हूं। अब तो वे हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाते हैं। 
अब अफशां का करियर पटरी पर था। वह नेशनल टीम में जगह पाने के सपने संजो रही थीं, तभी एक घटना घटी। यह 24 अप्रैल, 2016 का वाकया है। तब वह कश्मीर वुमेन कॉलेज में बीए सेकेंड ईयर की छात्रा थीं। उस दिन वह कॉलेज से निकल स्पोट्र्स कॉम्प्लेक्स की तरफ जा रही थीं। कॉम्प्लेक्स कॉलेज से कुछ कदमों की दूरी पर ही था, इसलिए सभी लड़कियां पैदल निकल पड़ीं। रास्ते में उन्होंने देखा कि पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन चल रहा है। पुलिस भीड़ को हटाने की मशक्कत कर रही थी। अफशां ने दूसरे रास्ते से स्पोट्र्स कॉम्प्लेक्स जाने का फैसला किया। अचानक  प्रदर्शनकारी अनियंत्रित हो गए। पुलिस ने उन्हें नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े। 
इस बीच कुछ लोग पुलिसवालों पर पत्थर फेंकने लगे। चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई। प्रदर्शनकारियों को लगा कि पुलिस उन्हें रोकना चाहती है। गुस्से में अफशां समेत बाकी लड़कियों ने भी हाथ में पत्थर उठा लिए। अगले दिन सुबह अखबारों में पुलिस पर पत्थर से वार करती लड़कियों की तस्वीर छपी। इसमें प्रमुख रूप से अफशां की तस्वीर थी। अचानक जिंदगी बदल गई। लोग उन्हें फुटबॉलर की जगह पत्थरबाज कहने लगे। यह उनकी नई पहचान थी। लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। घरवाले परेशान थे। लोग उनकी बेटी को पत्थरबाज कह रहे हैं, यह सोचकर वे सिहर उठे। पर इस घटना का एक अलग पहलू भी सामने आया। पहले जम्मू-कश्मीर में महिला फुटबॉल टीम को लेकर कोई खास जागरूकता नहीं थी। बहुत कम लोग जानते थे कि इस टीम की कैप्टन अफशां हैं। मगर इस खबर के बाद पूरा राज्य उन्हें जान गया। प्रशासन के सामने अफशां समेत बाकी खिलाड़ियों ने अपना पक्ष रखा और बताया कि उनका मकसद पुलिस पर हमला करना कतई नहीं था। खुद को बचाने के लिए उन्होंने ऐसा किया था। अफशां कहती हैं, मैं पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहती। मैं ऐसा कुछ करना चाहती हूं, जिससे देश को मुझ पर गर्व हो। मैं अपने वतन के लिए मेडल जीतना चाहती हूं। 
मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने उनसे मुलाकात कर उन्हें खेल पर फोकस करने की सलाह दी। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने उनकी टीम को दिल्ली बुलाकर महिला खिलाड़ियों की समस्याओं पर बात की। अफशां कहती हैं, कश्मीर में प्रतिभाएं भरी पड़ी हैं। उन्हें बस एक मौका मिलने की देरी है। सरकार ने हमसे वादा किया है कि घाटी की महिला खिलाड़ियों को और सुविधाएं दी जाएंगी। बॉलीवुड के एक मशहूर डायरेक्टर उनके जीवन पर फिल्म बनाने जा रहे हैं।
(प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी)

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