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हौसले और हिम्मत से हम दुश्मन को हराते हैं

राजेंद्र रामराव निंभोरकर  परम विशिष्ट सेवा मेडल विजेता 

निंभोरकर का जन्म महाराष्ट्र के वाडला गांव में हुआ था। आजादी के आंदोलन में इस गांव की बड़ी भूमिका रही है। 1942 के आंदोलन में गांव के कई युवा शहीद हुए थे। ऐसे ही वीर सपूतों की कहानियां सुनते हुए वह बड़े हुए। सूखाग्रस्त इलाका होने के कारण किसान बदहाल थे, पर उनमें देशभक्ति का जज्बा हमेशा कायम रहा।
तब वह कक्षा चार में थे। स्कूल में बच्चों के लिए छात्रवृत्ति योजना आई। इसके लिए जिला स्तर की परीक्षा होनी थी। हेडमास्टर को यकीन था कि निंभोरकर परीक्षा पास कर लेंगे। मास्टरजी ने पिताजी से कहा कि अगर आपका बेटा पास हो गया, तो इसे सतारा के सैनिक स्कूल में दाखिला मिल जाएगा। सैनिक स्कूल की बात सुनकर किसान पिता को बहुत अच्छा लगा। उन्होंने निंभोरकर से कहा कि तुम्हें परीक्षा पास करनी है हर हाल में। नतीजा आया और बेटा पास हो गया। फिर सैनिक स्कूल का फॉर्म आया और उनका सैनिक स्कूल में भी दाखिला हो गया। परिवार की खुशी का ठिकाना न था। इससे पहले गांव का कोई बच्चा सैनिक स्कूल नहीं गया था। सतारा उनके गांव से काफी दूर था। पिताजी उन्हें स्कूल छोड़कर वापस गांव आ गए।
सैनिक स्कूल का माहौल गांव के स्कूल से बिल्कुल अलग था। तमाम सुविधाएं थीं, मगर अनुशासन बेहद कठोर। निंभोरकर कहते हैं, हम गांव में रहते थे। हमें कुछ नहीं पता था सैनिक स्कूल के बारे में। सब कुछ अचानक हुआ और मेरी जिंदगी बदल गई। पढ़ाई के बाद सेना में जाने का सपना साकार हुआ। 1979 में पंजाब रेजिमेंट में निंभोरकर की तैनाती हुई। यह उनकी पहली नियुक्ति थी। शुरुआत से उनका रिकॉर्ड बहुत बढ़िया रहा। हिम्मत और मेहनत के बूते निंभोरकर आगे बढ़ते रहे। पंजाब के बाद कश्मीर में लेह, कारगिल और पुंछ और राजौरी सेक्टर में उन्हें सेवा का मौका मिला। कश्मीर में सेना के कई बड़े अभियानों में वह शामिल हुए। 
साल 1988 में बतौर कंपनी कमांडर अपने घायल साथी को बचाने के क्रम में दुश्मन की गोली का शिकार बनने से बाल-बाल बचे। निंभोरकर बताते हैं, एक जवान के सिर में गोली लगी थी। सिर से बहुत खून बह रहा था। दुश्मन फौजी लगातार हमारी टुकड़ी पर फार्यंरग कर रहे थे। लेकिन घायल सैनिक को दूसरी चौकी तक जल्द पहुंचाना भी जरूरी था। मैंने हेलमेट पहना और फार्यंरग के बीच ही घायल सैनिक को लेकर भागा। बतौर टीम लीडर हमें खुद से ज्यादा अपने साथी के बारे में सोचना पड़ता है। इस बीच दुश्मन की एक गोली मेरे हेलमेट से टकराई, पर मैं बच गया। शुक्र है कि हम अपने उस सैनिक की जान बचाने में भी कामयाब रहे। 
निंभोरकर कुछ समय पूर्वोत्तर में भी तैनात रहे, पर उनका ज्यादातर समय कश्मीर में बीता। इस दौरान उन्होंने कई सैन्य अभियानों में हिस्सा लिया। ऑपरेशन विजय के दौरान वह राजौरी सेक्टर में बुरी तरह घायल हो गए थे। उनकी टीम ने द्रास सेक्टर में दुश्मन की चौकी पर कब्जा कर लिया था। वह भारत की एक यादगार जीत थी।   र्
ंहसाग्रस्त बारामूला जिले में सेना ने उनके नेतृत्व में बड़ी कामयाबी हासिल की। तब वह वहां बतौर मेजर तैनात थे। एक मुठभेड़ के दौरान सेना ने 22 आतंकियों को मार गिराया। दक्षिण कश्मीर में वह बतौर ऑफिसर कमांडिंग तैनात थे। उनकी टीम ने करीब 55 खूंखार आतंकियों को मार गिराया। उनकी गिनती बेहतरीन सैन्य अधिकारियों में होने लगी। जब भी घाटी में किसी मुश्किल ऑपरेशन की बात आती, तो निंभोरकर को आगे किया जाता। साल 2010 में उन्हें अमेरिका में एशिया पैसिफिक सेंटर फॉर सिक्यूरिटी स्टडीज के तहत टे्रनिंग के लिए भेजा गया। इसके अलावा, उन्हें नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी, वाशिंगटन से मिलिट्री कोर्स करने का मौका मिला। निंभोरकर को संयुक्त राष्ट्र मिशन के तहत हिंसाग्रस्त अंगोला में सैन्य पर्यवेक्षक बनाकर भेजा गया। उन्होंने कई मौकों पर वीरता की मिसाल कायम की, लेकिन अभी एक और बड़ी चुनौती उनका इंतजार कर रही थी। 
वाकया 18 सितंबर, 2016 का है। पाकिस्तान से आए आतंकियों ने उरी इलाके में सेना के कैंप पर हमला किया, जिसमें हमारे 19 सैनिक मारे गए। पूरा देश आक्रोश में था। सेना ने दुश्मनों को सबक सिखाने की तैयारी की। फैसला किया गया कि इस बार पाकिस्तान में घुसकर वार किया जाएगा। लेफ्टिनेंट जनरल निंभोरकर को सर्जिकल स्ट्राइक का अहम हिस्सा बनाया गया। उरी हमले के 10 दिनों बाद, यानी 28-29 सितंबर, 2016 को भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में घुसकर आतंकी ठिकानों को तहस-नहस कर दिया। इस सर्जिकल स्ट्राइक में करीब 55 आतंकी मारे गए। निंभोरकर कहते हैं, इस अभियान को बेहद गोपनीय रखा गया। इसके बारे में मैं ज्यादा कुछ नहीं बता सकता। हमने मुस्तैदी से अपना टास्क पूरा किया और सुरक्षित वापस आ गए। साल 2017 में निंभोरकर को उत्तम युद्ध सेवा मेडल से नवाजा गया। इसके अगले ही वर्ष यानी 2018 में देश ने उन्हें परम विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया।
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 17 february