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कभी नहीं सोचा था धावक बनूंगी 

हिमा दास

हिमा का जन्म असम के एक साधारण किसान परिवार में हुआ। यह एक संयुक्त परिवार था, जिसमें कुल 16 सदस्य थे। वह धिंग गांव में पली-बढ़ीं, जो नौगांव जिले में है। जिले में ज्यादातर किसान धान की खेती करते हैं। उनके परिवार का गुजारा भी धान की खेती से होता था। 
हिमा ने बचपन से बाढ़ का दंश झेला। बारिश में अक्सर गांव और आसपास के इलाकों में बाढ़ आ जाती थी। तमाम बार फसल खराब हो जाती थी और परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता था। हालांकि इन दुश्वारियों के बीच किसान पिता ने कभी बच्चों को पढ़ने-लिखने से नहीं रोका। छह भाई-बहनों में सबसे छोटी हिमा को बचपन में फुटबॉल का शौक चढ़ गया। तब वह गली-मोहल्लों के लड़कों के संग फुटबॉल खेला करती थीं। उन्होंने बच्चों के संग मिलकर अपनी मोहल्ला टीम भी बना ली थी। जीतने पर बतौर इनाम पेन या टॉफी मिलती, जिसे पाकर वह बहुत खुश हो जाती थीं। बाद में जिला स्तर पर खेलने लगीं। इनाम में पहले सौ या दो सौ रुपये मिलने लगे। हिमा के लिए यह इनामी राशि बहुत बड़ी थी। वह फुटबॉलर बनने का सपना देखने लगीं। टीवी पर बड़े फुटबॉलरों को देखकर उनकी तरह खेलने की कोशिश करने लगीं। अच्छी बात यह थी कि घरवालों ने कभी उन्हें खेलने से नहीं रोका।
जिला स्तर के टूर्नामेंट के दौरान खेल टीचर ने देखा कि यह लड़की बहुत तेज दौड़ती है। उन्होंने हिमा को धावक बनने की सलाह दी। हिमा कहती हैं, फुटबॉल में काफी दौड़ना पड़ता है, इसलिए मेरा स्टेमिना बढ़ता गया। पर मुझे नहीं पता था कि मैं धावक बन सकती हूं। यह एहसास स्कूल टीचर ने कराया। इसके बाद वह राज्य स्तरीय 100 मीटर दौड़ में हिस्सा लेने लगीं। हालांकि तब तक वह तय नहीं कर पाई थीं कि उन्हें धावक बनना है या नहीं? मन में फुटबॉलर बनने का सपना अब भी कायम था। वह चाहती थीं कि नेशनल फुटबॉल टीम में उन्हें मौका मिले। 
पिछले साल जनवरी की बात है। हिमा गुवाहाटी में एक कैंप में ट्रेनिंग के लिए पहुंचीं। प्रैक्टिस के दौरान रोजाना सुबह ट्रैक पर भागना पड़ता था। एक दिन कोच निपुण दास ने उन्हें ट्रैक पर दौड़ते देखा। उन्हें लगा कि यह लड़की तो कमाल की धावक है। मौका मिला, तो यह पूरी दुनिया जीत लेगी। निपुण बताते हैं, मैंने हिमा को ट्रैक पर दौड़ते देखा। उसकी स्पीड बहुत ज्यादा थी। तब मैंने सोचा कि मैं इस लड़की को ट्रेनिंग दूंगा। प्रैक्टिस के बाद कोच ने उनसे बात की और गुवाहाटी में ट्रेनिंग लेने की सलाह दी। हिमा ने कहा, पापा इजाजत नहीं देंगे।
इसके बाद कोच उनके घर गए और माता-पिता से बात की। ट्रेनिंग सेंटर गांव से करीब 150 किमी दूर था। पापा बेटी को ट्रेनिंग दिलाने को राजी थे, पर समस्या खर्चे की थी। उन्होंने कोच से कहा कि वह हिमा के बाहर रहने-खाने का खर्च नहीं उठा सकते हैं। कोच को हिमा में असीम संभावनाएं दिख रही थीं। वह चाहते थे कि देश को एक बेहतरीन खिलाड़ी मिले, इसलिए वह उनका सारा खर्च उठाने को राजी हो गए। निपुण बताते हैं, मैंने घरवालों से कहा कि आपकी बेटी बहुत काबिल है। उसे आगे बढ़ने से मत रोकिए। उसकी ट्रेनिंग और रहने-खाने का खर्च मैं उठाऊंगा। आप बस गुवाहाटी जाने की उसे इजाजत दे दीजिए। यह सुनते ही घरवाले खुश हो गए। मां को बेटी से दूर रहने का मलाल तो था, पर वह जानती थीं कि बाहर जाकर वह कुछ कमाल करने वाली है। पिता ने उन्हें गुवाहाटी जाने की इजाजत दे दी। 
अब कड़ी ट्रेनिंग का वक्त था। ट्रेनिंग सेंटर में प्रैक्टिस के साथ खान-पान और व्यायाम के कड़े नियम पालन करने पड़े। कोच ने शुरुआत में उन्हें 100 मीटर की रेस कराई, जिसे हिमा ने रिकॉर्ड समय में पूरा किया। इसके बाद 200  मीटर रेस में हिस्सा लिया, यहां भी वह अव्वल रहीं। अब ट्रेनर को यकीन हो चला था कि यह लड़की 400 मीटर की दौड़ में हिस्सा लेने लायक बन चुकी है। नेशनल टीम में खेलने के बाद अप्रैल में गोल्ड कोस्ट में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा लेने का मौका मिला। यहां 400 मीटर स्पद्र्धा में वह छठे स्थान पर रहीं। इस टूर्नामेंट में उन्होंने 52:32 सेकंड में दौड़ पूरी की। एक साल के अंदर किस्मत बदल चुकी थी। उन्हें जूनियर एशियन चैंपियनशिप और वल्र्ड यूथ चैंपियनशिप में भी खेलने का मौका मिला। कामयाबी का सिलसिला चल पड़ा। 
इस हफ्ते हिमा ने बड़ा कमाल किया। उन्होंने गुरुवार को फिनलैंड में आईएएएफ वल्र्ड अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 400 मीटर दौड़ स्पद्र्धा में गोल्ड मेडल जीतकर रिकॉर्ड बना दिया। उन्होंने यह दौड़ मात्र 51: 45 सेकंड में पूरी की। 18 साल की उम्र में यह रिकॉर्ड बनाने वाली वह देश की पहली महिला धावक हैं। फिनलैंड में जब उन्हें तिरंगा पहनाकर गोल्ड मेडल दिया गया, तो उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। कोच निपुण दास कहते हैं, शुरुआत में वह पीछे चल रही थी। वह टॉप थ्री में भी नहीं नजर आ रही थी, पर मुझे विश्वास था, वह सोना जरूर जीतेगी। वह बहुत मेहनती लड़की है। अभी उसे बहुत आगे जाना है।

प्रस्तुति : मीना त्रिवेदी

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