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उम्मीद नहीं थी दोबारा खेल पाऊंगी

जीना इसी का नाम है

मेहुली बचपन में रंग-बिरंगे गुब्बारों पर निशाना लगाया करती थीं। दूर दीवार पर लगे गुब्बारे जब उनकी पैलेट की चोट खाकर फूटते, तो उन्हें बड़ा मजा आता। उनके लिए सबसे रोमांचक खेल था यह। सात साल की उम्र में उन्होंने निशानेबाज अभिनव बिंद्रा को गोल्ड मेडल चूमते हुए देखा था। राइफल से निशाना लगाते बिंद्रा की फोटो देखकर उनके नन्हे मन में सवाल उठा- क्या निशाना लगाने पर मेडल मिलता है? बाद में पता चला कि निशानेबाजी एक प्रोफेशनल खेल है।   

कोलकाता से लगभग 30 किलोमीटर दूर सिरमपुर में रहने वाली मेहुली को टीवी सीरियल देखना पसंद था। खासकर वह सीरियल, जिसमें  कोई लड़की पुलिस इंस्पेक्टर हो और उसके हाथ में पिस्टल या राइफल हो। यहीं से उनके मन में निशानेबाजी के प्रति दिलचस्पी बढ़ी। पापा ने बेटी के मन की बात पढ़ ली। तय किया कि उसे निशानेबाज बनाऊंगा। वह एक सरकारी विभाग में अस्थाई कर्मचारी थे। खेल से उनका कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन मन में तमन्ना थी, बेटी खिलाड़ी बने। इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार थे। मेहुली कहती हैं- मुझे सीआईडी  सीरियल बहुत अच्छा लगता था। उसी से मुझे शूटर बनने की प्रेरणा मिली।   

पापा ने सिरमपुर राइफल क्लब में उनका दाखिला करा दिया। तब वह 14 साल की थीं। यह बात 2014 की है। मेहुली बहुत खुश थीं। शूटर बनने का सपना साकार होने जा रहा था। तभी एक ऐसी घटना हुई, जिसने उन्हें निराशा के गर्त में धकेल दिया। एक दिन प्रैक्टिस के दौरान उनका निशाना चूक गया। उनकी राइफल से निकली पैलेट एक व्यक्ति को लग गई। वह जमीन पर गिर पड़ा। उसे चोट लग गई। वहां मौजूद स्टाफ उसे लेकर अस्पताल भागे। पूरी एकेडमी में अफरा-तफरी मच गई। मेहुली सदमे में थीं। कोच ने भी डांट लगाई, यह क्या किया तुमने? उन्हें घर जाने को कहा गया।वह कई दिनों तक घर से नहीं निकलीं। एकेडमी प्रशासन ने इस मुद्दे पर बैठक बुलाई और उन्हें निलंबित करने का फैसला किया गया। 

निलंबन की बात सुनकर मेहुली बिखर गईं। यह सदमा इतना गहरा था कि वह डिप्रेशन में चली गईं। स्कूल जाना बंद हो गया। गुमसुम रहने लगीं। घर में कैद होकर रह गईं। मन में बार-बार यही सवाल गूंजता था कि अब मैं क्या करूंगी? वह खुद को कोसने लगीं। सबसे दुखद यह था कि साथी शूटर भी उनके खिलाफ हो गए। रिश्तेदार और पड़ोसियों की नजरों में वह लापरवाह व कुसूरवार बन गई थीं। उन्हें सरेआम अपमानित भी किया गया। इस मुश्किल वक्त में बस मम्मी-पापा उनके साथ थे। उन्होंने बेटी को टूटने नहीं दिया। डिप्रेशन से छुटकारा दिलाने के लिए मम्मी उन्हें मनोचिकित्सक के पास लेकर गईं। डॉक्टर ने उनकी काउंसिलिंग की। उन्हें एहसास दिलाया कि निशानेबाजी में चूक एक हादसा था। मम्मी मिताली घोष कहती हैं- हमारे लिए वह मुश्किल वक्त था। हमने उसे बार-बार समझाया कि उसने जान-बूझकर गलत निशाना नहीं लगाया। मगर वह खुद को कुसूरवार मान रही थी। उस अपराध बोध को उसके मन से निकालना वाकई बड़ा कठिन था। 

डिप्रेशन से बाहर आने में उन्हें करीब एक साल लग गया। बड़ी मशक्क्त के बाद उनका आत्मविश्वास जागा। तब मम्मी ने उनसे कहा, तुम्हारी जिंदगी खत्म नहीं हुई है। अब भी शूटर बन सकती हो। थोड़ी हिम्मत दिखाओ। आगे बढ़ो। राइफल तुम्हारा इंतजार कर रही है। साल 2015 में वह मम्मी-पापा के संग कोलकाता आईं। यहां पर उनकी मुलाकात पूर्व निशानेबाज और बेहतरीन कोच जयदीप करमाकर से हुई। कोच को हादसे के बारे में बताया गया। उन्होंने मेहुली से बात की और उसे ट्रेनिंग देने को राजी हो गए। जयदीप कहते हैं- मेहुली के लिए उस हादसे को भूलना आसान नहीं था। सबसे बड़ी चुनौती थी, उसे मानसिक रूप से जीत के लिए तैयार करना। यकीनन वह प्रतिभाशाली है। हमने उसे मानसिक रूप से मजबूत किया, ताकि वह सटीक निशाना लगा सके। 

कोलकाता में ट्रेनिंग के साथ उनकी कड़ी दिनचर्या शुरू हो गई। एकेडमी घर से करीब 40 किलोमीटर दूर थी। रोजाना बस में चार घंटे का सफर करके पहुंचना पड़ता था। मेहुली बताती हैं- सुबह घर से जल्दी निकल पड़ती। अक्सर रात में देर हो जाती। कई बार रात 11 बजे घर पहुंचती थी। थक जाती थी, पर फिर से अपने सपने को साकार होता देख सुकून मिलता था। 

घर के हालात अच्छे नहीं थे। सरकारी मदद के बिना बेटी को शूटर बनाना मुश्किल था। पर घर वाले नहीं चाहते थे, किसी भी हालत में बेटी का सपना टूटे। पापा ने नई राइफल खरीदने के लिए दो लाख रुपये का लोन लिया। वर्ष 2016 में उन्हें पुणे में आयोजित नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लेने का मौका मिला। यहां उन्होंने दो गोल्ड मेडल अपने नाम किए। इस जीत ने उनके हौसले बुलंद कर दिए। 2017 में उन्होंने राष्ट्रीय र्शूंटग चैंपियनशिप में आठ मेडल जीतकर सुर्खियां बटोरीं। इसने उन्हें पूरे देश में पहचान दिलाई। बीते सप्ताह कॉमनवेल्थ गेम में उन्होंने सिल्वर मेडल अपने नाम किया।

प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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