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इस गौरव का कभी सपना भी नहीं देखा था

लोकतंत्र हाशिए पर पड़ी जातियों और जिल्लत भरी जिंदगी जी रहे लोगों को समाज की मुख्यधारा से किस तरह जोड़ता है, नेपाल का बादी समुदाय इसका जीवंत उदाहरण है। वहां की जाति-व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर जो जातियां गिनी जाती हैं, उनमें एक बादी भी है। अस्पृश्यता कानूनन अपराध है, पर कथित सवर्ण जातियां इसे अस्पृश्य मानती रहीं। इसी समुदाय से ताल्लुक रखती हैं उमा देवी बादी। 
सालयान जिले के थापागांव में सन् 1965 में उमा का जन्म हुआ। जिस समुदाय में वह पैदा हुईं, वह सदियों से शोषित रहा और नाचने-गाने व वेश्यावृत्ति के सहारे अपने जिंदा रहने के साधन जुटाता रहा। मर्द गाते-बजाते रहे और ज्यादातर औरतें अपने जिस्म का सौदा कर रुपये कमाती रहीं। इस कारण ये लोग एक जगह टिक नहीं पाते थे और इनकी पहुंच के दायरे से बहुत कुछ बाहर था। उमा को स्कूल जाने का मौका तो मिला, मगर खानाबदोश जिंदगी ने उन्हें किसी एक स्कूल में दो महीने से ज्यादा ठहरने न दिया। फिर जिन स्कूलों में वह पढ़ने जातीं, वहां क्लास में उन्हें सबसे पीछे बैठना पड़ता, क्योंकि भेदभाव के रोग ने किसी बच्चे को उनके पास बैठने ही नहीं दिया। मंदिरों में भी बादियों के प्रवेश को लेकर कई तरह की पाबंदियां थीं। 
जाहिर है, इस समुदाय की बेटियां अपना बचपन नहीं जी पाती थीं। उमा लड़कपन-अल्हड़पन से गुजरतीं, इसके पहले ही समाज की तल्ख हकीकतों को वह जान चुकी थीं। जब वह 21 साल की थीं, एक शख्स से उनका गहरा प्यार हुआ और फिर दोनों ने शादी कर ली। मगर उमा के पति ब्राह्मण जाति के थे। जब यह बात आम हुई, तो खूब हंगामा बरपा। जातिवादी समाज-व्यवस्था को यह किसी सूरत मंजूर न था। दोनों पर तरह-तरह के दबाव डाले जाने लगे। स्थानीय पुलिस, प्रशासन ने उनका काफी मानसिक उत्पीड़न किया। आरोप लगाया गया कि उमा अपने पति को बादी बनाना चाहती हैं। अंतत: आजिज आकर उन्हें गांव छोड़ना पड़ा। वे कैलाली जिले के टीकापुर गांव में आकर बसे। 
जिंदगी ने नई करवट तो ले ली थी, लेकिन अपने समुदाय, खासकर औरतों के साथ होने वाला अपमानजनक व्यवहार उमा के भीतर सालों से खदबदाता आ रहा था। वह नहीं चाहती थीं कि जो कुछ उन्होंने भोगा, वही सब कुछ बादी समुदाय की आने वाली पीढ़ियां भी भोगें। वह अपनी नई नस्लों को इज्जत और बराबरी के अधिकार के साथ जीते-बढ़ते देखना चाहती थीं। यह एक बड़ा सपना था, क्योंकि जिस जाति के बच्चों को यह तक न पता हो कि उनका असली पिता कौन है, वे कैसे प्रशासन से जन्म प्रमाणपत्र हासिल करते और बैंकों में खाते खुलवाते या बराबरी का अपना हक मांगते? बहरहाल, उमा ने अपने समुदाय के लोगों को उनके नागरिक अधिकारों के बारे में जागरूक करना शुरू किया। बकौल उमा, ‘शुरू-शुरू में मुश्किलें आईं। मेरी बात सुनने को कोई तैयार नहीं था। वे सोच भी नहीं सकते थे कि समाज में हमें बराबरी का दर्जा मिल सकता है, क्योंकि हमारे पेशे के कारण लोग हमें हिकारत भरी नजरों से देखते थे। हमारी जाति इस तिरस्कार की आदी हो चली थी।’
मगर उमा ने अपनी जिंदगी का मकसद चुन लिया था। ‘एक्शनएड’ नाम की गैर-सरकारी संस्था की मदद से उन्होंने टीकापुर में किराये के एक मकान में 25 बादी लड़के-लड़़कियों का एक हॉस्टल शुरू किया। इस छात्रावास के लिए उन्होंने आस-पास के गांवों के ज्यादातर उन बच्चियों-बच्चों को चुना, जो यौनकर्मियों की संतानें थीं और जिनके पिता के बारे में कोई जानकारी न थी। उन्होंने इन बच्चों का दाखिला पास के स्कूल में कराया। उमा का यह कदम काफी प्रभावकारी साबित हुआ। बाद में तो 
बादी औरतों ने बाकायदा अपना बड़ा हॉस्टल बनाने के लिए धन जुटाया और अब उनका अपना हॉस्टल है। 
इस कामयाबी के बाद उमा ने अपने समूह को संगठित करने और समाज व शासन-प्रशासन से उसे सम्मान दिलाने की राजनीतिक मुहिम छेड़ी। साल 2007 में देश के 23 जिलों के सैकड़ों बादी कार्यकर्ताओं ने उनके नेतृत्व में ‘सिंह दरबार’ तक पदयात्रा की। उनके प्रतिरोध के आक्रामक तरीके को देखते हुए प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने उमा व अन्य बादी प्रदर्शनकारियों को बातचीत के लिए बुलाया। अंतत: शेर बहादुर देउबा के कार्यकाल में सरकार को बादी महिलाओं की कई मांगें माननी पड़ीं, जिनमें स्थाई निवास के साथ, मां के दस्तावेजों के आधार पर बच्चों को नागरिकता देने की शर्तें शामिल हैं।
इस जुझारू महिला की नेतृत्व क्षमता को देखते हुए नेपाली कांग्रेस ने साल 2017 में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत सुदूरपश्चिम प्रांत में उमा देवी बादी को अपना प्रत्याशी घोषित किया। वह विधायक चुन ली गईं। पिछले साल बीबीसी  ने दुनिया की जिन 100 प्रेरक महिलाओं की सूची जारी की, उसमें उमा को उसने दसवें पायदान की इज्जत बख्शी। भावुक उमा के शब्द थे, ‘ऐसे गौरव का तो कभी सपना भी नहीं देखा था।’   
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह

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  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 14 july