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क्रिकेट खेलने पर पड़ती थी डांट 

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बुमराह अहमदाबाद में पले-बढे़। सात साल के थे, जब पापा को हेपेटाइटिस-बी हो गया। काफी दिन बीमार रहे और फिर उनका निधन हो गया। पापा का केमिकल का अच्छा-खासा बिजनेस था। उनके जाते ही बिजनेस भी बर्बाद हो गया। संयुक्त परिवार भी बिखर गया। फैक्टरी बंद हो गई। परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। 

पापा के जाने के बाद बच्चों को पालने की जिम्मेदारी मां पर आ गई। मां स्कूल टीचर थीं। बच्चे छोटे थे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। शुरुआती दिन काफी मुश्किल भरे रहे। हर पल पापा की कमी खलती थी, मगर मां ने हरसंभव कोशिश की कि हमारी परवरिश में कोई कमी न रह पाए। बुमराह उसी स्कूल में पढ़ते थे, जहां मां पढ़ाती थीं। परिवार में किसी को क्रिकेट का शौक नहीं था, पर न जाने कहां से बुमराह को यह शौक लग गया। स्कूल से लौटने के बाद वह मोहल्ले की सड़क पर पड़ोस के बच्चों के संग बैट-बॉल खेलने लगते। कई बार मां खूब डांट लगातीं। वह चाहती थीं कि बेटा पढ़ाई पर ध्यान दे। लेकिन बेटा कहां मानने वाला था? उसे तो क्रिकेट का बुखार लग चुका था। बुमराह अक्सर मां को बिना बताए खेलने निकल जाते। 
जब वह 14 साल के थे, उनको स्कूल टीम में खेलने का मौका मिला। पहले ही मैच में खेल टीचर को यकीन हो गया कि यह लड़का बहुत आगे जाएगा। जब मां को यह पता चला कि बेटा स्कूल की खेल टीम में चुन लिया गया है, तो उन्हें फिक्र हुई। उन्होंने बेटे को खेल छोड़ पढ़ाई पर ध्यान देने की हिदायत दी। यह बात बुमराह ने खेल टीचर को बताई। टीचर नहीं चाहते थे कि इस बच्चे को क्रिकेटर बनने से रोका जाए। इसलिए उन्होंने खुद बुमराह की मां से बात की और उन्हें समझाया कि आपके बेटे में बेहतरीन  क्रिकेटर बनने की असीम संभावनाएं हैं, उसे मत रोकिए। अब मां समझ चुकी थीं कि बेटा तो खिलाड़ी ही बनेगा। बुमराह कहते हैं- मेरी मां बहुत साहसी हैं। मुश्किल दिनों में भी उन्होंने कभी हमें हारने नहीं दिया। मुझे क्रिकेटर बनाने के लिए उन्होंने बड़े त्याग किए। 
मां की अनुमति मिल चुकी थी। ट्र्रेंनग के खर्च को लेकर दिक्कत आई, मगर मां ने सब संभाल लिया। ट्र्रेंनग के दौरान ही यह तय हो गया था कि यह लड़का तेज गेंदबाज बनेगा। कोच उसी हिसाब से उन्हें ट्र्रेंनग देने लगे। पढ़ाई के साथ-साथ क्रिकेट की ट्र्रेंनग जारी रही। सुबह चार बजे उठकर ट्र्रेंनग के लिए भागना, दिन में स्कूल में पढ़ाई और फिर शाम को ट्र्रेंनग के लिए एकेडमी जाना। काफी व्यस्त दिनचर्या थी। पर बुमराह को मजा आ रहा था। खेलते समय उन्हें कभी थकान नहीं महसूस हुई। साल 2013 में गुजरात में घरेलू क्रिकेट खेलना शुरू किया। 
पहली बार गुजरात से विदर्भ टीम के खिलाफ खेलने का मौका मिला। पहले ही मैच में बुमराह सात विकेट लेकर छा गए। हर तरफ इस नए गेंदबाज की चर्चा होने लगी। एक साल के अंदर वह गुजरात में र्लींडग विकेट टेकर के रूप में उभरे। उनकी तेज गेंदों के आगे अच्छे बल्लेबाजों के भी छक्के छूटने लगे। वर्ष 2013 में सैयद मुश्ताक अली टी-20  ट्रॉफी टूर्नामेंट में खेलने का मौका मिला। इसी दौरान कोच जॉन राइट की उन पर नजर पड़ी। उन्होंने बुमराह की खूबी को पहचाना और उनको आईपीएल टीम मुंबई इंडियन्स में लेने का फैसला किया। इस टीम से जुड़ने के बाद तो उनकी गेंदबाजी में और निखार आया। पहले ही आईपीएल मैच में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के बल्लेबाज विराट कोहली और मयंक अग्रवाल के विकेट लेकर वह छा गए। सचिन तेंदुलकर ने जमकर उनकी तारीफ की।  मां को भी तसल्ली हो चुकी थी कि उन्होंने बेटे को क्रिकेट खेलने की अनुमति देकर कोई गलती नहीं की।  
27 जनवरी, 2016 को पहली बार बुमराह  अंतरराष्ट्रीय मैच में ऑस्टे्रलिया के खिलाफ उतरे। उस समय तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी को ऑस्ट्रेलिया दौरे पर जाना था, पर वह चोटिल हो गए, इसलिए उन्हें टीम से बाहर रखा गया। शमी की जगह बुमराह को मौका मिल गया। उन्होंने पहले ही वनडे मैच में 10 ओवर में दो विकेट लेकर कमाल कर दिया। इस शानदार प्रदर्शन से सनसनी मच गई। तब टीम के कैप्टन महेंद्र्र ंसह धौनी ने कहा, हमने यह सीरीज जीत ली है, पर मैं यहां कुछ और भी देख रहा हूं। मैंने जसप्रीत बुमराह की गेंदबाजी देखी है। उनमें अद्भुत क्षमता है। 
ऑस्टे्रलिया दौरे के बाद बुमराह स्लॉग ओवर के मुख्य गेंदबाज बन गए। धौनी ने उन्हें कई अहम मौके पर गेंदबाजी के लिए मैदान में आजमाया। 2016 में बुमराह शीर्ष टी-20 गेंदबाजों में तीसरे नंबर पर रहे। अब उनकी तुलना श्रीलंका के तेज गेंदबाज लसिथ मलिंगा से होने लगी। बुमराह की मां दलजीत कहती हैं- बचपन से ही वह क्रिकेट का दीवाना था। जब देखो, गेंद हाथ में लिए फिरता था। जब उसकी गेंद दीवार पर लगती, तो बड़ी तेज आवाज होती थी। मैं अक्सर उसे डांटते हुए कहती थी कि शोर मत मचाओ। उसे क्रिकेट के अलावा और कोई शौक नहीं था। मेरे बच्चे ने बड़ी मेहतन की है, इस मुकाम को हासिल करने के लिए। 
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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