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काबुल वाली हजार बच्चों की मां

एक पाकिस्तानी पनाहगाह में 1978 में लैला हैदरी पैदा हुई थीं। लेकिन बाद में उनके परिवार ने वहां से भागकर ईरान में शरण ली। लैला का परिवार बेहद मजहबी था और ऊपर से शरणार्थी भी। तमाम पाबंदियों और बंदिशों के बीच पली-बढ़ी लैला की स्कूली तालीम ईरान में ही हुई। पर जब वह 12 साल की थीं, तभी परिवार ने उनसे 20 साल बड़े एक मौलवी के साथ उनकी शादी कर दी। उन दिनों को याद करते हुए लैला कहती हैं- ‘12 साल की उम्र से ही मैंने खुद को बॉक्सिंर्ग ंरग में महसूस किया। उस वक्त तो मुझे यह इलहाम भी न था कि बाल-विवाह एक अपराध है, हालांकि मुझे यह जरूर एहसास होता कि एक वयस्क मर्द हर रात मेरे साथ बलात्कार करता है और यह गलत है।’
लैला हैदरी को बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में काफी मन लगता था, सो उन्होंने तालीम जारी रखने की चाह अपने पति से जताई। मौलवी पति ने उनको मजहबी तालीम हासिल करने की इजाजत दे दी। उन्होंने धार्मिक शिक्षा में स्नातक की डिग्री अर्जित की। लेकिन लैला के ख्वाब तो कुछ और थे। उन्होंने अपने मियां से छिप-छिपाकर अन्य विषयों की पढ़ाई भी जारी रखी और आखिरकार ईरान की ही एक यूनिवर्सिटी से उन्होंने फिल्म निर्माण में डिग्री हासिल की। मौलवी को लैला के दीनी तालीम से बाहर जाना नागवार गुजरा। मगर लैला अब तक एक खुदमुख्तार औरत बन चुकी थीं। उन्हें अपनी जिंदगी दूसरों की शर्तों पर गुजारना और गवारा न था। लिहाजा, उन्होंने पति से तलाक मांगा, लेकिन इस्लामी कानून के तहत पति ने बच्चों को अपने पास रखने का हक हासिल कर लिया।
अपने स्कूली दिनों में शरणार्थी बच्चों की बेबसी जी चुकीं लैला ने 1999 में उन अफगानी बच्चों के लिए एक स्कूल खोला, जिन्हें ईरान के सरकारी स्कूलों में दाखिला नहीं दिया जाता था। बेहतर प्रबंधन और तालीम की बदौलत उनके स्कूल के बच्चों को ईरानी स्कूलों में दाखिला मिलने लगा, यहां तक कि यूनिवर्सिटी में भी उनके स्कूली बच्चों ने अवॉर्ड जीते। 
साल 2002 में शरणार्थियों के खिलाफ ईरान में कई जगहों पर हिंसा की घटनाएं घटी थीं। ऐसी ही एक घटना इस्फहान शहर में घटी। बलवाई भीड़ ने वहां कई अफगान शरणार्थियों के घर जला दिए। इस वारदात से विचलित लैला हैदरी और दूसरे तमाम लोगों ने ईरान स्थित संयुक्त राष्ट्र के दफ्तर के आगे शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। नाराज ईरानी प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की और सबके साथ लैला हैदरी को भी सलाखों के पीछे भेज दिया गया। परदेश की काल कोठरी में लैला को अपना वतन शिद्दत से याद आया। 
कैदखाने से निकलने के बाद लैला हैदरी ने अपने पुरखों की धरती का रुख किया। पहली बार वतन पहुंची लैला को काबुल पहुंचकर सदमा लगा, उनका भाई हाकिम हेरोइन का लती बन चुका था और वह उन्हें शहर के एक पुल के नीचे पड़ा हुआ मिला। भाई की तलाश के सिलसिले में ही उन्होंने काबुल के इस ‘पुल सोख्ता’ की दर्दनाक तस्वीर देखी, जहां सैकड़ों की तादाद में ड्रग्स के लती पड़े रहते हैं, नशा करते हैं, और फिर वहीं दम तोड़ देते हैं। लैला ने अपने खुदा से वादा किया कि अगर वह अपने भाई को बचाने में कामयाब हो सकीं, तो नशाखोरी के शिकार लोगों के इलाज और पुनर्वास के लिए एक उपचार केंद्र खोलेंगी। उन्होंने वाकई एक केंद्र खोला, जिसका नाम खुद उसमें इलाज के लिए जुटे लोगों ने रखा- ‘मदर्स कैंप’। इस अच्छी पहल को एक बेहतर मुकाम पर ले जाने के लिए उन्हें माली मदद की दरकार थी। अकरम गिजाबी नाम के पत्रकार ने इसमें उनकी काफी मदद की और वह पुल सोख्ता से 28 लोगों को अपने केंद्र में इलाज के लिए लेकर आईं। अब तक मदर्स कैंप में रहकर अलग-अलग उम्र व नस्ल के 4,000 लोग नशा मुक्त हो चुके हैं। यहां से निकले लोग रेस्तरां में काम करने, पेंटिंग बनाने से लेकर मुल्क की फौज में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। लैला ने हाल ही में नशाखोरी की आदी औरतों के इलाज के लिए अलग से एक केंद्र शुरू किया है।   
अफगानिस्तान आने के बाद लैला का सामना हमवतन औरतों के हालात से हुआ। वे हक-हुकूक से वंचित तो थीं ही, तहजीब और रवायतों के नाम पर उनकी आजादी रौंदी जाती थी। लैला ने इस हालात पर अपनी पहली फिल्म इमैजिनेशन  का निर्देशन किया। टोलो फिल्म फेस्टिवल में उन्हें इसके निर्देशन और अदाकारी के लिए अवॉर्ड मिला।
लैला हैदरी इन दिनों एक बात को लेकर चिंतित हैं कि अगर अमेरिका-तालिबान वार्ता कामयाब हुआ, तो अफगान औरतों ने जो खुले माहौल में सांस लेना अभी शुरू किया है, वह फिर से दुश्वार हो जाएगा। वह कहती हैं कि मुझे इस वार्ता से उम्मीद नहीं है। लैला के तीनों बच्चे अब 16 से 21 साल के हो गए हैं। वे ईरान से जर्मनी चले गए हैं। लैला उनसे नहीं मिल पाईं। सिर्फ वाट्सएप उन्हें मिलाता है, मगर काबुल में उन्हें हर कोई ‘नाना’ या ‘मॉम’ पुकारता है। यहां वह ‘हजार बच्चों की मां’ कही जाती हैं।
प्रस्तुति: चंद्रकांत सिंह

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  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 12 may