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अब मैं किसी से नहीं डरती 

जमुना टुडू  सामाजिक कार्यकर्ता

जमुना का जन्म ओडिशा के एक छोटे से गांव में हुआ। पिता किसान थे। परिवार में छह बहनें और एक भाई था। वर्ष 1998 में उनकी शादी हुई। तब वह 18 साल की थीं और 10वीं में पढ़  रही थीं। शादी के बाद वह झारखंड आ गईं। उनका ससुराल जमशेदपुर के चाकुलिया गांव में था। यह गांव उनके ओडिशा वाले गांव से बिल्कुल अलग था। जमुना बताती हैं, मायके में जहां हम रहते थे, वहां ज्यादा पेड़-पौधे नहीं थे, पर पिताजी को हरियाली से प्यार था। उन्होंने खेत में बहुत सारे पौधे लगा रखे थे। मैं पौधों की देखभाल में उनकी मदद करती थी। ससुराल आकर मैंने पहली बार घने जंगल देखे। 
शुरुआत में गांव की बाकी महिलाओं की तरह वह भी जंगल में लकड़ी काटने जाया करतीं। घना जंगल उन्हें बड़ा अच्छा लगता। पति मजदूरी करते थे। बहुत मुश्किल से दो वक्त के खाने का इंतजाम हो पाता था। जमुना को  जंगल की लकड़ी काटने में बड़ा दुख होता, पर मजबूरी थी। खाना बनाने के लिए लकड़ी ही एकमात्र ईंधन था। लिहाजा उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा। लेकिन बाद में उनका ध्यान गांव में लकड़ी ढोते ट्रकों पर गया। कई बार उन्होंने गांव में अनजान लोगों को पेड़ काटते देखा। पूछने पर पता चला कि वन माफिया बिना किसी अनुमति के जंगल काटते हैं और शहर में लकड़ी बेचकर मोटा पैसा कमाते हैं। जमुना को बहुत बुरा लगता था यह सब देखकर। उन्होंने घरवालों से पूछा, कोई माफिया को रोकता क्यों नहीं है? सबने कहा कि वह बड़ा शक्तिशाली है। हम उसे नहीं रोक सकते। फिर उन्होंने गांव की औरतों से कहा कि क्यों न हम सब मिलकर माफिया को रोकें। पहले तो महिलाओं ने मना किया, पर बाद में राजी हो गईं। हालांकि भय की वजह से गांव के मर्द चुप रहे। 
जमुना कहती हैं, महिलाओं के मन में पहले से माफियाओं के प्रति गुस्सा था। पर वे कभी जाहिर नहीं कर पाईं। जब मैंने उनसे विरोध करने को कहा, तो उनका गुस्सा बाहर आ गया। यहां तक कि मेरी सास व ननद ने भी मेरा साथ दिया।  
बात साल 2004 की है। जमुना ने गांव की चार महिलाओं को एकत्र किया। अगली सुबह हाथ में मोटे डंडे लेकर निकल पड़ीं जंगल की ओर। रोजाना की तरह यहां लकड़ी काटी जा रही थी। महिलाओं ने ललकारते हुए माफिया के गुर्गों को भगा दिया। यह सिलसिला चल पड़ा। अब रोज सुबह चार बजे उठकर उनकी टीम जंगल में निगरानी करने लगी। माफिया से लड़ने के लिए उनके पास केवल डंडे थे। कुछ दिन तो लकड़ी काटना बंद रहा, मगर फिर शुरू हो गया। उनकी टीम ने उन्हें ललकारा, पर अब वे सजग हो चुके थे। उन्होंने महिलाओं पर वार किया। उन्हें धमकाया और वहां से भाग जाने को कहा।    
जब यह बात गांव के मर्दों को पता लगी, तो वे भी महिलाओं के संग खड़े हो गए। अब पुरुष भी महिलाओं की टीम के संग जंगल की निगरानी के लिए जाने लगे। जमुना कहती हैं, हमने लंबा संघर्ष किया। माफिया हमारा दुश्मन बन गया। हम पर हमले किए गए। मगर गांव के लोगों ने हमारा साथ दिया। एक बार तो हद हो गई। जमुना सुबह अपनी टीम के साथ जंगल की रखवाली के लिए निकलीं, तो कुछ अज्ञात लोग उनके घर में घुस आए और सारा सामान लूटकर ले गए। जमुना कहती हैं, माफिया ने हमें रोकने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए। मेरे घर पर डकैती दिलवाई। मेरे पति पर हमला करवाया। 
जमुना के किस्से दूसरे गांवों तक पहुंचने लगे। वे भी उनकी तरह जंगल की रखवाली करने लगे। अब गांववाले जमुना को ‘लेडी टार्जन’ के नाम से पुकारने लगे। उनके पास तीन सौ महिलाओं की टीम है। जमुना कहती हैं, आज भी मैं सुबह चार बजे अपनी साथियों को साथ लेकर जंगल जाती हूं। अगर कोई लकड़ी काटते दिखता है, तो हम डंडे से वार करते हैं। हमारे डंडे बहुत मजबूत हैं। जंगल की सुरक्षा के साथ उन्होंने गांववालों को बेटियों की शिक्षा के प्रति भी जागरूक किया। उनके गांव में बेटी पैदा होने पर 18 पौधे लगाए जाते हैं। जब बेटी की शादी होती है, तो 10 पौधे उसके ससुरालवालों को भेंट किए जाते हैं। 
उनकी पहल से गांव में स्कूल खोला गया। गांव के बच्चे पढ़ सकें, इसके लिए उन्होंने अपनी जमीन दान दे दी। पेड़ बचाने के लिए  उन्होंने अनोखा अभियान शुरू किया। हर रक्षाबंधन पर वह पेड़ों को राखी बांधने लगीं। धीरे-धीरे यह परंपरा आसपास के गांवों में फैल गई। गांव के लोग पेड़ों को राखी बांधकर उनकी सुरक्षा का संकल्प लेते हैं। जमुना वन प्रबंधन सह संरक्षण महासमिति बनाकर पूरे कोल्हान में जंगल बचाने के लिए काम कर रही हैं। 
जंगल बचाने के अभियान में योगदान के लिए राष्ट्रपति द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया।  उनके जीवन पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बन चुकी है। 2014 में उन्हें स्त्री शक्ति अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इस साल उन्हें पद्मश्री अवॉर्ड दिया गया। जमुना कहती हैं, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे इतना बड़ा सम्मान मिलेगा। इससे मेरा हौसला बढ़ा है। मैं अपना अभियान जारी रखूंगी।
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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  • Web Title:jina isi ka naam hai hindustan column on 10 february