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जज बनना चाहती थी मैं

नौरा हुसैन  पारिवारिक हिंसा पीड़ित

सूडान में नील नदी किनारे बसे एक गांव में नौरा का जन्म हुआ। यह इलाका दक्षिण खार्तूम से करीब 40 किलोमीटर की दूरी पर है। आठ भाई- बहनों में नौरा दूसरे नंबर पर थीं। उनके पापा की हार्डवेयर की दुकान थी। बच्चों की परवरिश के लिए उनकी कमाई काफी थी। नौरा स्कूल जाने लगीं। खानदान में बेटियों को ज्यादा पढ़ाने का रिवाज नहीं था। परिवार में कोई महिला नौकरी नहीं करती थी, पर नौरा ने तय कर लिया था कि वह पढ़-लिखकर जज बनेंगी। यह 2015 की बात है। तब 16 साल की नौरा कक्षा आठ में थीं। परिवार ने 32 के साल के चचेरे भाई अब्दुल रहमान से उनका निकाह तय कर दिया। 
नौरा बिफर गईं। उन्होंने लड़के से कह दिया, मैं पढ़ना चाहती हूं। शादी नहीं करूंगी। जब यह बात रिश्तेदारी में फैली, तो हंगामा हो गया। इससे पहले किसी लड़की ने ऐसी हिमाकत नहीं की थी। अचानक एक दिन लड़के वाले घर आ गए और निकाह की रस्में शुरू हो गईं। नौरा किसी तरह सबकी नजरों से बचते हुए भागकर मौसी के घर  पहुंच गईं। दो दिन बाद पापा खोजते हुए मौसी के घर पहुंचे और अपने साथ गांव ले आए। जबरन उनकी शादी कर दी गई, मगर वह ससुराल जाने को राजी नहीं हुईं। माहौल शांत करने के लिए घरवालों ने उन्हें मायके में रहकर पढ़ने की इजाजत दे दी। वह दोबारा स्कूल जाने लगीं। इस बीच उन्होंने दसवीं की परीक्षा दी। शादी के दो साल हो चुके थे। परिवार पर समाज का दबाव था कि बेटी को ससुराल भेजें। आखिर अप्रैल 2017 में उन्हें ससुराल भेज दिया गया। 
नौरा को पढ़ाई छोड़ ससुराल में रहना मंजूर न था। उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया। वह पति से किसी तरह का संबंध नहीं रखना चाहती थीं। एक रात उन्होंने घर से भागने की कोशिश की, लेकिन दरवाजे पर ताला लगा था। ससुराल में आए नौ दिन हो चुके थे। उस दिन अचानक पति उनके कमरे में घुसा। उसके साथ कुछ लड़के  भी थे। नौरा बताती हैं कि वे लड़के मेरे रिश्तेदार ही थे। उन्होंने मेरे कपडे़ फाड़े। मुझे जमीन पर पटक दिया। मुझे मारा। उनकी मदद से मेरे पति ने मेरा बलात्कार किया। मैं उस अपमान को कभी नहीं भूल सकती। 
नौरा का दिल अवसाद से भर गया। मन में आया कि खुद को खत्म कर लें। अगले दिन फिर पति ने उनसे जबरदस्ती करने की कोशिश की। नौरा ने उसे चेताया, अगर मेरे करीब आए, तो मैं खुद को खत्म कर लूंगी। पर वह पागल हो चुका था। उसने जैसे ही करीब आने की कोशिश की, नौरा भागकर  किचन से चाकू ले आईं। वह पति को डराना चाहती थीं, मगर वह नहीं माना। खुद को बचाने के लिए वार करना पड़ा। इसके बाद वह खून से सना चाकू लेकर अपने मायके की तरफ भागीं। माता-पिता बेटी को इस हालत में देखकर सन्न रह गए। पुलिस ने नौरा को गिरफ्तार कर लिया। पिता हुसैन कहते हैं, हमारे यहां बेटियों की कम उम्र में शादी आम बात है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि जबरन शादी करने  का इतना खतरनाक अंजाम होगा। 
नौरा की गिरफ्तारी की खबर सुर्खियों में थी। दरअसल इससे पहले सूडान में कभी किसी लड़की ने शादी का विरोध नहीं किया था। वहां दस साल की उम्र में ही लड़की के विवाह को कानूनी मान्यता प्राप्त है। मेरिटल रेप गैर-कानूनी नहीं है। इस साल 18 मई को कोर्ट ने पति की हत्या के जुर्म में नौरा की फांसी की सजा सुनाई। नौरा ने कोर्ट में कहा कि वह हत्या नहीं करना चाहती थीं। बस खुद को बलात्कार से बचाना चाहती थीं। पर इस संघर्ष में कोई नहीं था उनके साथ। रिश्तेदार, पड़ोसी, सब उन्हें कोस रहे थे। यहां तक कि उनके अपने माता-पिता भी उन्हें बचाने नहीं आए। पर कुछ गैर-सरकारी संगठनों ने उनकी मदद की। हैशटैग जस्टिस फॉर नौरा नाम से एक ऑनलाइन अभियान शुरू किया गया। हजारों लोग इस अभियान से जुड़े। लोगों ने सरकार से नौरा की सजा माफ करने की अपील की। कुछ ही दिनों में यह अभियान पूरी दुनिया में फैल गया। कई हॉलीवुड अभिनेत्रियों ने नौरा को माफी देने की वकालत की। यहां तक कि एमनेस्टी इंटरनेशनल भी उन्हें बचाने के लिए सक्रिय हो गया। इस संस्था ने सूडानियों से अपील की कि वे बहादुर नौरा को बचाने के लिए अपने कानून मंत्री को संदेश भेजें। हजारों लोगों ने मंत्री को ईमेल करके कहा कि हर लड़की को पढ़ने का हक मिलना चाहिए। उनकी जबरन शादी रोकी जाए। नौरा को माफी देकर समाज को एक अच्छा संदेश दिया जा सकता है। 
एमनेस्टी इंटरनेशनल अधिकारी जोआन न्यान्यूकी कहती हैं, सूडान में नौरा जैसी तमाम बच्चियां हैं, जिनकी जबरन शादी करा दी जाती है। ये बच्चियां रोजाना बलात्कार के दंश सहती हैं, पर आवाज उठाने की हिम्मत नहीं कर पातीं। नौरा ने हौसला दिखाया। हमें उसकी मदद करनी होगी। जस्टिस फॉर नौरा का अभियान रंग लाया। कोर्ट ने इसी सप्ताह उनकी फांसी पर रोक लगा दी। उम्मीद है, अब नौरा को पढ़ने और अपने सपने पूरे करने का मौका मिलेगा। साथ ही सूडान में बाल विवाह और मेरिटल रेप कानून में बदलाव होगा, ताकि बाकी लड़कियों को भी आजादी से जीने का मौका मिले सके। 
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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