Jina isi ka naam hai column in hindustan on 18 march - अब चुप न रहें महिलाएं DA Image
14 नबम्बर, 2019|5:15|IST

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अब चुप न रहें महिलाएं

ली उन-यू, सामाजिक कार्यकर्ता

दक्षिण कोरिया की ली उन-यू ने 1998 में एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनी में करियर की शुरुआत की। आत्मविश्वास से भरपूर इस लड़की ने अपनी मेहनत और काबिलियत के बल पर दफ्तर में पुरुष सहकर्मियों के बीच अपनी खास जगह बनाई। ट्रेनी पद से शुरू होकर उनका प्रोफेशनल ग्राफ लगातार आगे बढ़ता गया। 

बॉस के आदेश का पालन करना और आगे बढ़कर जिम्मेदारी लेना उनकी आदत थी। इसका उन्हें इनाम भी मिला। साल 2003 में कंपनी ने उन्हें इलेक्ट्रिकल अपलायंस की सेल्स टीम में बड़ी जिम्मेदारी दी। उन्हें अमेरिका व यूरोप में कंपनी के कारोबार को बढ़ाने का लक्ष्य दिया गया। ली ने यह चुनौती उत्साह के साथ स्वीकार की। उनका पूरा फोकस कंपनी के बिक्री लक्ष्य (सेल्स टारगेट) पर था, जिसे वह शिद्दत से पूरा करने में जुटी थीं। उन दिनों वह काम के सिलसिले में टूर पर थीं। एक सीनियर अफसर उनके साथ थे। यह वाकया साल 2005 का है। एक दिन अचानक दफ्तर में काम के बहाने वह अफसर उनके करीब आया। पहले उसने ली के बालों को छुआ और फिर आपत्तिजनक हरकतें करने लगा। वह अंदर से कांप उठीं। उन्होंने उसे दूर हटने की चेतावनी दी, पर वह नहीं माना। ली बताती हैं, वह बहुत बेशर्म था। उसने मुझसे कहा कि तुम्हें अपने सीनियर की हर बात माननी चाहिए। मैं अवाक थी, क्या करूं? 

उन्होंने अपने एचआर विभाग में उस अधिकारी की शिकायत की। उन्हें उम्मीद थी कि कंपनी आरोपी को सजा देगी, पर यह तो उल्टा हो गया। उन्हें ही जबरन सात महीने की छुट्टी पर भेज दिया गया। ली की एक नहीं सुनी गई। छुट्टी के बाद उन्होंने दोबारा काम शुरू किया। अब कंपनी ने उन्हें सेल्स विभाग से हटाकर समाज कल्याण विभाग में ट्रांसफर कर दिया। ली कहती हैं, मैं यूरोप और अमेरिका में कंपनी के सेल्स की जिम्मेदारी संभालती थी। मगर सेक्स उत्पीड़न की शिकायत करने पर मेरा विभाग बदल दिया गया। इस बीच मेरे तमाम साथियों का प्रमोशन कर दिया गया, जबकि मुझे सी ग्रुप में डाल दिया गया। 

साल 2007 में उन्होंने मानवाधिकार आयोग से मामले की शिकायत की, पर कंपनी का रवैया नहीं बदला। फिर 2008 में उन्होंने कोर्ट में केस दायर किया। कोई वकील उनका केस लेने को तैयार नहीं था। ली बताती हैं, कंपनी इतनी ताकतवर थी कि कोई वकील उसके खिलाफ केस लड़ने को राजी नहीं हुआ। लिहाजा मैंने अपना केस खुद लड़ा। इस केस ने मुझे वकील बना दिया। इस बीच उन पर केस वापस लेने के दबाव बनाए गए। कंपनी ने दावा किया कि ली के साथ किसी तरह का सेक्स उत्पीड़न नहीं हुआ। ली बताती हैं, मेरे साथ किसी ने सहानुभूति नहीं जताई। उल्टे मुझे धमकी दी गई कि अगर मैंने कहीं शिकायत की, तो कंपनी मेरे खिलाफ केस कर देगी। यह सब काफी डरावना था। मुझे गहरा सदमा पहुंचा। 
इस लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान वह पूरी तरह अकेली पड़ गईं। पिता की मृत्यु हो गई। खुद डिप्रेशन का शिकार हो गईं। मानसिक दबाव के कारण उनकी बोलने की क्षमता पर भी असर हुआ। ली कहती हैं, दफ्तर के लोग, पड़ोसी और तमाम दोस्त, सब दूर हो गए। भारी मानसिक दबाव था मुझ पर। मेरे दिमाग पर इतना बुरा असर पड़ा कि मेरी आवाज बंद हो गई। मुझे अस्पताल में भर्ती किया गया। मेरा करियर बरबाद हो गया। 

आखिरकार 2010 में संघर्ष की जीत हुई। कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने आदेश में कहा, कंपनी ने सेक्स उत्पीड़न पर कार्रवाई की बजाय पीड़िता को परेशान किया। इसकी वजह से उसे भारी मानसिक पीड़ा सहनी पड़ी। जिस समय यह आदेश सुनाया जा रहा था, कोर्ट रूम में खड़ी ली रोने लगीं। कोर्ट के आदेश पर आरोपी अफसर और कंपनी ने ली को भारी मुआवजा दिया। ली कहती हैं, मुआवजे में मुझे बड़ी राशि मिली, पर बात पैसे की नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि कोर्ट ने मेरे पक्ष को सही माना। इस फैसले से देश की तमाम औरतों को हिम्मत मिली। दफ्तर में चुपचाप ज्यादती सहने वाली महिलाओं ने अपनी शिकायतें दर्ज कराईं।

कोर्ट के फैसले के बाद सैकड़ों लोगों ने ली को बधाई दी। दूसरी कंपनियों में उनकी तरह सेक्स उत्पीड़न का दंश झेल रही महिलाओं ने उनसे संपर्क किया। सरकार पर भी इसका असर हुआ। उसने सेक्स उत्पीड़न के मामले में कानून को सख्त बनाने का एलान किया। ली कहती हैं, जिन लोगों ने मुझसे दूरी बना ली थी, वे मेरे पास आए और कहा तुम सही थी। कई महिलाओं ने मुझसे पूछा कि उन्हें दफ्तर में शोषण से छुटकारा पाने के लिए क्या करना चाहिए? 

केस जीतने के बाद भी ली चुप नहीं हैं। उनका संघर्ष जारी है। सेक्स उत्पीड़न के खिलाफ अमेरिका से शुरू हुए ‘मी-टू’ अभियान का असर दक्षिण कोरिया में भी देखने को मिल रहा है। ली का केस देश की महिलाओं के लिए नजीर बन गया। ली आजकल अपने देश में सेक्स उत्पीड़न के खिलाफ चलाए जा रहे सरकारी कार्यक्रम के तहत पीड़ित महिलाओं को नि:शुल्क कानूनी सहायता दे रही हैं। प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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