Hindustan Jeena Isi Ka Nam Hai Column on June 9 - मुझे फख्र है कि मैंने हार नहीं मानी DA Image

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मुझे फख्र है कि मैंने हार नहीं मानी

ravi v kalpna  cricketer

राजे-रजवाड़ों के मनोरंजन से निकलकर एक संभावनाशील करियर विकल्प के तौर पर उभरे क्रिकेट ने देश-दुनिया के कई गुदड़ी के लालों-लाड़लियों के सपनों को नई उड़ान दी है। इनमें एक रवि वेंकटश्वरलु कल्पना भी हैं। आंध्र के गुंटूर में रवि वी कल्पना पांच मई, 1996 को पैदा हुईं। ऑटो रिक्शा ड्राइवर पिता की कमाई पर पूरा परिवार आश्रित था। पिता खूब मेहनत करते, पर माली हालत कभी खुशगवार नहीं रही। उनके पास अपना घर तक नहीं था। कल्पना दो बहन हैं। हरेक मां-बाप की तरह कल्पना के पिता ने भी अपनी बेटियों के बेहतर भविष्य के लिए उनका दाखिला स्कूल में कराया। 

कल्पना पढ़ाई में अच्छी थीं। इस हवाले से उन्होंने कभी अपने घरवालों को निराश नहीं किया। कल्पना को बचपन में कबड्डी खेलना काफी पसंद था और वह खूब कबड्डी खेलती थीं। जब वह नौवीं कक्षा में थीं, तब दोस्तों ने क्रिकेट से उनका परिचय कराया। गली में लड़कों को क्रिकेट खेलते देखतीं, तो उनका भी मन बल्लेबाजी करने को मचल उठता। मगर जब कभी वह बल्ला उठातीं, उन्हें झिड़क दिया जाता- ‘लड़कियां क्रिकेट नहीं खेलतीं, यह लड़कों का खेल है।’ कल्पना के मन में इस खेल के प्रति अनुराग पैदा हो चुका था। वह गलियों और स्कूल में दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने लगीं। लेकिन उसमें करियर देखना उनके लिए एक बड़ी बात थी। एक तो तब महिला क्रिकेट की देश में कोई खास लोकप्रियता नहीं थी और फिर कल्पना के परिवार को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए ही भीषण संघर्ष करना पड़ रहा था। माता-पिता ने बेटी के क्रिकेट खेलने के बारे में सुना, तो उनकी प्रतिक्रिया काफी ठंडी रही। उन्होंने कल्पना से पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा। मगर बेटी ने तो इरादे बांध लिए थे। वह पढ़ाई और खेल, दोनों मोर्चों पर डटी रहीं।

कल्पना के क्रिकेट को एक अहम दिशा तब मिली, जब गुंटूर के जेकेसी कॉलेज मैदान में आयोजित प्रशिक्षण शिविर में उन्होंने हिस्सा लिया। आंध्र प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन ने यह शिविर खास तौर से लड़कियों के लिए लगाया था। कल्पना जब तक स्कूलों में खेलती रहीं, किसी ने खास ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब वह क्रिकेट एकेडेमी जाने लगीं, तो उन पर तंज कसे जाने लगे। नाते-रिश्तेदारों की टिप्पणियों ने कल्पना के माता-पिता को काफी आहत किया। कल्पना कहती हैं, ‘माता-पिता मेरे क्रिकेट खेलने को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे, और इस वजह से मुझे कुछ महीनों के लिए खेल छोड़ना भी पड़ा, जबकि मेरा प्रदर्शन काफी अच्छा था और मेरे कोच काफी खुश थे।’

कल्पना के हिस्से में परीक्षाएं अभी बाकी थीं। जैसे ही वह अठारह की हुईं, घरवाले और नाते-रिश्तेदारों ने उन पर शादी का दबाव बनाना शुरू कर दिया। पिता की बेबसी यह थी कि आर्थिक तंगी की वजह से वह बेटियों को बहुत सुविधाएं नहीं दे पा रहे थे, इसलिए उन्हें लगता था कि शायद शादी के बाद कल्पना को कुछ सहूलियतें नसीब हो जाएं। लेकिन कल्पना जानती थीं कि जब अभी ही उन्हेें क्रिकेट खेलने में इतनी दुश्वारियां पेश आ रही हैं, तो शादी के बाद उनके लिए क्रिकेट खेलना नामुमकिन हो जाएगा। उन्होंने अपनी दास्तान अपने कोच श्रीनिवास रेड्डी को सुनाई। कोच कल्पना की खेल प्रतिभा से अच्छी तरह वाकिफ थे। वह उनके माता-पिता के पास पहुंचे और उन्हें समझाया कि आपकी बेटी काफी आगे जाएगी। उन्होंने उन्हें यह भी यकीन दिलाया कि कल्पना क्रिकेट के साथ पढ़ाई को भी भरपूर तवज्जो देगी। कल्पना कहती हैं, ‘मेरे रिश्तेदारों ने मेरे क्रिकेट खेलने का काफी विरोध किया, मगर मैं बिल्कुल डटी रही। आज मैं जहां हूं, उसी दृढ़ता की बदौलत हूं। मुझे फख्र है कि मैंने हार नहीं मानी।’

कल्पना के पिता का रुख कुछ नरम तो हुआ, मगर वह एक शर्त पर राजी हुए कि अगर उनकी बेटी स्टेट टीम में खेलने लायक होगी, तभी वह उसे आगे क्रिकेट खेलने की इजाजत देेंगे। वह इस योग्य निकलीं। स्टेट टीम की खिलाड़ी के तौर पर कल्पना को आंध्र प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन से 4,000 रुपये का अनुदान मिलने लगा। इसी पैसे से वह अपनी क्रिकेट किट खरीद पाईं। कल्पना कहती हैं- ‘वे बड़े डरावने दिन थे मेरी जिंदगी के।... मेरी अब तक की सबसे यादगार जीत अपने परिवार को मेरी शादी रोकने के लिए मनाना है।’

साल 2015 कल्पना के जीवन में वह यादगार लम्हा लेकर आया, जिसको जीना हरेक क्रिकेटर का सपना होता है। न्यूजीलैंड के खिलाफ नेशनल टीम में उन्हें शामिल किया गया। 28 जून, 2015 को भारतीय टीम की सदस्य के तौर कल्पना ने मैदान में कदम रखा। इस बड़ी कामयाबी के बाद उनके माता-पिता को कुछ-कुछ भरोसा हुआ कि बेटी ने शायद सही फैसला किया है। इसी की बदौलत कल्पना को भारतीय रेलवे में नौकरी भी मिली। करीब तीन सालों के अंतराल के बाद कल्पना ने बतौर बल्लेबाज-विकेटकीपर फिर से नेशनल टीम में वापसी की है। महेंद्र सिंह धौनी उनके आदर्श हैं। देश को कल्पना से काफी आशाएं हैं।
(प्रस्तुति: चंद्रकांत सिंह)

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