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मेरे पास खोने के लिए था ही क्या

lewis howes us handball player

वह एक ऐसे दंपति की संतान हैं, जिनका ख्वाब रेजा-रेजा बिखर चुका था, और वे अपनी जिंदगी समझौतों के सहारे जीने को विवश थे। लेविस हॉवेस के माता-पिता कॉलेज के दिनों में एक-दूसरे से मिले। दोनों पेशेवर गायक-गायिका बनना चाहते थे। मगर छोटी उम्र में दांपत्य जीवन की शुरुआत के कारण उनकी उम्मीदों को उड़ान नहीं मिली। हॉवेस 16 मार्च, 1983 को ओहायो के डेलवेयर में पैदा हुए। चार भाई-बहन में हॉवेस सबसे छोटे हैं। बचपन से ही उन्होंने माता-पिता को आपस में झगड़ते देखा। वात्सल्य की छांव से वंचित हॉवेस का बचपन मायूसी और तल्खी के साये तले बीता।

हॉवेस के माता-पिता खुश नहीं थे, क्योंकि जो उनकी चाहत थी, उस गायकी से उनकी अच्छी कमाई नहीं हो पा रही थी। कुढ़न, तनाव और आर्थिक तंगी से वर्षों तक जूझते हॉवेस के पिता ने कई नौकरियां कीं और अंतत: बीमा करोबार के क्षेत्र में उन्हें स्थाई ठिकाना मिला। हॉवेस उस दौर को याद करते हुए कहते हैं, ‘वे बड़े तकलीफ भरे दिन थे। हमारे घर में हमेशा तनाव पसरा रहता था, उसने हम बच्चों पर बड़ा असर डाला।’

हॉवेस का परिवार दिशा भटक चुका था। उनका बड़ा भाई ड्रग्स बेचने के अपराध में जेल जा चुका था, तो बहन शराब की आदी हो चुकी थी। हॉवेस भी हताशा के शिकार बन चुके थे। सभी चीजों से उनका मन उचट गया था। पढ़ने-लिखने में उनका मन नहीं लगता। स्कूल में जब भी कुछ पढ़ने की उनकी बारी आती, वह पसीने से तर-बतर हो उठते।  स्कूल और घर में वह एक लंबे और भोंदू बच्चे के रूप में देखे जाते थे। कोई उनसे दोस्ती नहीं करना चाहता था। हॉवेस भी सबसे कटे-कटे रहते थे।

हर साल गरमी की छुट्टियों में हॉवेस के माता-पिता अपने बच्चों को एक क्रिश्चियन समर कैंप में भेजा करते थे। एक साल इसी कैंप में हॉवेस की मुलाकात एक बोर्डिंग स्कूल के कुछ लड़कों से हुई। लगा, जैसे इन्हीं दोस्तों का उन्हें इंतजार था। हॉवेस कहते हैं, ‘वे बेहद मिलनसार, खुशमिजाज और ऊर्जा से लबरेज थे। किसी के बारे में फौरन अपनी राय जाहिर करना उनकी फितरत में नहीं था। मैं अपने इर्द-गिर्द ऐसे ही दोस्तों को देखना चाहता था।’

हॉवेस अपने छोटे शहर में खुश नहीं थे। वह अपने भाई की तरह सलाखों के पीछे जिंदगी गर्क करना नहीं चाहते थे। उनमें बदलाव की तड़प उठ चुकी थी। कैंप से लौटने के बाद उन्होंने  माता-पिता से जिरह की और उसी बोर्डिंग स्कूल में आठवें दर्जे में शामिल होने पहुंचे, जहां के बच्चे उन्हें समर कैंप में मिले थे। हॉवेस को दूसरे दर्जे की पढ़ाई के लायक पाया गया, पर फुटबॉल में उनका प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ था। अंतत: उनका स्कूल टीम में चयन हो गया। वह एक एकाकी जिंदगी से मुख्यधारा में शामिल होने के हर कष्ट को उठाने को तैयार थे। हॉवेस कहते हैं- ‘मेरे पास खोने के लिए था ही क्या?’

इसके बाद तो वह कॉलेज की टीम में भी चुने गए और आगे पेशेवर एरीना लीग में खेलने का भी उन्हें मौका मिला। इस लीग में खेलने के बदले उन्हें हर हफ्ते 250 डॉलर की कमाई हुई, लेकिन किस्मत ने एक बार फिर पलटी खाई। साल 2007 में उनकी कलाई टूट गई और उनके पास जो कुछ जमा-पूंजी थी, वह भी खत्म हो गई। हॉवेस अपनी बहन के पास ओहायो लौट आए। उनके पास ऐसा कोई हुनर नहीं था, जिसके सहारे वह कोई नौकरी तलाश पाते। वैसे भी, अमेरिका आर्थिक मंदी की चपेट में था।

वह एक बार फिर हताशा और दिशाहीनता के घेरे में थे। एक दिन वह टीवी पर बीजिंग ओलंपिक का हैंडबॉल मैच देख रहे थे। इसे देख वह मुग्ध हो गए और मन ही मन सोचा कि यह मेरा खेल हो सकता है। हॉवेस को पता चला कि इसका सर्वश्रेष्ठ क्लब न्यूयॉर्क में है। वह कहते हैं, ‘मैंने तभी फैसला कि मैं पैसे कमाऊंगा, ताकि न्यूयॉर्क की उस टीम के साथ प्रैक्टिस कर सकूं।’

वह एक ऐसे बिजनेस की तलाश में जुट गए, जो उन्हें कम समय में इतना पैसा दिला दे कि वह न्यूयॉर्क जा सकें। हॉवेस रोजाना अपनी बहन के घर घंटों-घंटों तक इंटरनेट पर बिजनेस मॉडल के वीडियो देखने लगे, जानकारियां जुटाने लगे। एक मेंटोर ने उन्हें बताया कि लिंक्डइन पर उन्हें यह कामयाबी मिल सकती है। वह रोज लिंक्डइन पर आठ-आठ घंटे तक वक्त गुजारने लगे, और अंतत: स्पोट्र्स एग्जिक्यूटिव्स के लिए एक लिंक्डइन गु्रप शुरू किया। एक ही साल में 10,000 सदस्य बन गए। सदस्य उन्हें बिजनेस में लिंक्डइन के इस्तेमाल को लेकर कोचिंग देने से लेकर सोशल मीडिया के अनुभवों पर आधारित कारोबार शुरू करने का सुझाव देने-मांगने लगे। फिर क्या था, अगले दो साल में उनकी ऑनलाइन कंपनी पच्चीस लाख डॉलर की कमाई कर चुकी थी।

साल 2012 में वह अपना सपना पूरा करने न्यूयॉर्क आ गए और हैंडबॉल क्लब में प्रैक्टिस करने लगे। कामयाबी उनके लिए नए-नए मुकाम गढ़ती चली गई। हॉवेस अब अमेरिका की नेशनल हैंडबॉल टीम के सदस्य हैं और इन दिनों ओलंपिक की तैयारी कर रहे हैं।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह

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  • Web Title:Hindustan Jeena Isi Ka Nam Hai Column on June 16