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Hindi News ओपिनियन जीना इसी का नाम हैउन्होंने मुझे कभी ‘संध्या’ की तरह नहीं देखा

उन्होंने मुझे कभी ‘संध्या’ की तरह नहीं देखा

संध्या के पास आज ‘सफेदपोश नौकरी’ के अवसरों की कोई कमी नहीं, मगर वह बदलाव की प्रेरणा बनकर न सिर्फ कमाठीपुरा जैसी बदनाम बस्तियों की बेटियों को, बल्कि दुनिया भर की रेडलाइट एरिया की लड़कियों को अपने भीतर..

उन्होंने मुझे कभी ‘संध्या’ की तरह नहीं देखा
Monika Minalसंध्या नायर, रंगकर्मी, मोटिवेशनल स्पीकरSat, 01 Jun 2024 09:22 PM
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अपनी वर्जनाओं के पीछे हमारा समाज कितने सारे पाखंड को जीता है, इसे बेपरदा करती एक बहादुर बेटी की कहानी आज सुनिए। वह एक ऐसे इलाके में पैदा हुईं, जिसकी सीमा पर पहुंचकर तमाम शरीफ लोग अपनी शराफत का लबादा उतार फेंकते हैं। विडंबना देखिए, तमाम पुराने शहरों में ऐसे इलाके तथाकथित भद्र लोगों की बदौलत ही आबाद हुए। मगर शहराती दुनिया ने सबसे अधिक नफरत इन्हीं इलाकों के बाशिंदों से पाली। बंगाल की परंपरा में तो देवी प्रतिमा के लिए मिट्टी भी इन्हीं बस्तियों की आंगन की चाहिए, मगर स्नेह और सम्मान पर उनका कोई हक नहीं! मुंबई का कमाठीपुरा एक ऐसा ही इलाका है, जहां संध्या नायर पैदा हुईं।  
जी हां! संध्या एक यौनकर्मी मां की बेटी हैं और उन्हें इस पहचान से अब कोई गिला नहीं है, शिकायत बस समाज से है, जो इन इलाकों में पैदा हुए बच्चों को नफरत व हिकारत की निगाहों से देखता है और उनसे उनका बुनियादी हक छीनने वालों को पारसा समझता है। बहरहाल, दुनिया की हरेक समझदार मां की तरह संध्या की माता भी उन्हें एक तालीमयाफ्ता, काबिल, खुदमुख्तार लड़की के रूप में देखना चाहती थीं। मगर मां की यह हसरत नन्ही संध्या को कितनी भारी पडे़गी, उन्होंने कभी सोचा न होगा। छह-सात साल तक बाहरी दुनिया से संध्या का कोई साबका नहीं पड़ा था, इसलिए उसके तेवर से वह पूरी तरह अनजान थीं। अपनी पहचान छिपाकर मां ने एक निजी स्कूल में उनका दाखिला करा दिया।
संध्या बेहद खुश थीं। एक बिल्कुल नया फलक उनके आगे खुला था। नए-नए दोस्त मिले थे, स्कूल यूनिफॉर्म में होने का एहसास ही कुछ अलग था। मगर यह खुशी बहुत दिनों तक नहीं टिक सकी। पहले तो उनकी त्वचा के रंग को सहपाठियों ने निशाना बनाया। कभी ‘काली’, तो कभी ‘कौआ’ कहकर संध्या को पुकारा जाता। इसे वह फिर भी झेल लेती थीं, मगर जब उनकी मां के पेशे के बारे में साथियों को पता चला, तो रातोंरात सबका नजरिया ही बदल गया। सबने उनसे बात करना बंद कर दिया। यहां तक कि दोपहर का खाना भी संध्या अकेली ही खातीं।
कई बार बेमतलब ही सहपाठी थप्पड़ जड़ दिया करते और शिकायत करने पर शिक्षकों का रवैया उपेक्षा भरा होता। क्लास के एक कोने में उन्हें टूटी बेंच पर बैठना पड़ता। चूंकि स्कूल प्रशासन उन्हें निकालकर मीडिया में नहीं आना चाहता था, लिहाजा उसने हर मुमकिन कोशिश की कि संध्या खुद ही स्कूल छोड़कर चली जाएं। आखिरकार उन्होंने अपने साथ दुर्व्यवहार की शिकायत करनी छोड़ दी, क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि आरोपियों पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। संध्या को कमाठीपुरा अपने लिए सबसे सुरक्षित जगह लगता, जहां किसी की नजर में उनके लिए दया या नफरत नहीं होती थी। स्कूल का माहौल बर्दाश्त करना बहुत कठिन था, पर काफी मुश्किल से मिले स्कूल में दाखिले को वह गंवा नहीं सकती थीं।
संध्या की मां को घरेलू सहायक का काम मिला, तो उन्होंने मजबूरी का पुराना पेशा छोड़ दिया, मगर यह समाज उनकी बेटी को कहां बख्शने जा रहा था! दस से सोलह साल तक स्कूल में संध्या का यौन उत्पीड़न और बलात्कार होता रहा। जिस शख्स ने पहली बार उनके साथ ज्यादती की, उसने उनकी गरदन पर पांव रखकर कहा- ‘तुम पढ़-लिखकर क्या करेगी? ...की बेटी हो, ...ही बनोगी!’ मगर संध्या ने इस मान-मर्दन को सहते हुए भी स्कूल न छोड़ने का फैसला किया। साल 2013 में दसवीं करने के बाद संध्या अपनी मां के साथ केरल चली आईं, क्योंकि उनके पिता बहुत बीमार थे। यहां पहली बार उन्हें आजादी का एहसास हुआ, क्योंकि इस शहर में उनकी मां की पृष्ठभूमि को कोई नहीं जानता था।
मां ने सिलाई का काम शुरू कर दिया था, मगर उससे घर की सारी जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही थीं, लिहाजा संध्या ने भी घरेलू सहायिका का काम पकड़ लिया, ताकि अपने कॉलेज व ट्यूशन की फीस वह चुका सकें। साल 2015 की बात है, संध्या को एक अखबार की कतरन मिली, जिसमें श्वेता कट्टी की कहानी छपी थी। श्वेता ‘रेडलाइट एरिया’ से स्कॉलरशिप पर विदेश जाकर पढ़ने वाली पहली भारतीय लड़की हैं। उन्होंने न्यूयॉर्क के बार्ड कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है। संध्या को भी आगे पढ़ने का बहुत शौक था। साइबर कैफे के जरिये उन्होंने श्वेता से संपर्क साधा, तो श्वेता ने उन्हें ‘क्रांति’ (गैर-सरकारी संस्था) की मुखिया रॉबिन चौरसिया से बात करने को कहा। यह संस्था यौनकर्मियों की बेटियों को रिहाइश, शिक्षा व अन्य अवसर मुहैया कराने में सहयोग करती है।
रॉबिन ने संध्या की आपबीती सुन उन्हें फौरन मुंबई बुलाया और अपने ‘शेल्टर होम’ में रहने की जगह दी। इस होम में 24 और लड़कियां रह रही थीं। सबका अतीत बेहद दर्दनाक था। रॉबिन ने उन सबकी जिंदगी को मानीखेज बना दिया। ‘लालबत्ती एक्सप्रेस’ नामक थियेटर ग्रुप के जरिये ये पूरी दुनिया में घूम-घूमकर अपनी दास्तान सुनाने लगीं। इसी संस्था की मदद से संध्या को प्रतिष्ठित अशोका विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में ग्रेजुएशन करने का अवसर मिला और आगे की उच्च शिक्षा के लिए वह कोस्टारिका की यूनिवर्सिटी फॉर पीस जा सकीं। उन्होंने अपने सफरनामे को एक किताब की भी शक्ल दी है- बियोंड द ओसन्स व्यू।
संध्या के पास आज ‘सफेदपोश नौकरी’ के अवसरों की कोई कमी नहीं, मगर वह बदलाव की प्रेरणा बनकर न सिर्फ कमाठीपुरा जैसी बदनाम बस्तियों की बेटियों को, बल्कि दुनिया भर की रेडलाइट एरिया की लड़कियों को अपने भीतर यकीन पैदा करना सिखा रही हैं। बकौल संध्या, इसी की बदौलत वे नैतिकता के ठेकेदारों की आंखों में आंखें डालकर एक इंसान की हैसियत से बात कर सकेंगी, बल्कि अपनी पहचान की शर्मिंदगी से भी मुक्ति पा सकेंगी।
प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह