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Hindi News ओपिनियन जीना इसी का नाम हैजमीनी बदलाव की वह राह जो राजावत ने दिखाई

जमीनी बदलाव की वह राह जो राजावत ने दिखाई

अपने गांव से कैसा प्रेम होना चाहिए, छवि ने अपने फौजी दादा से यह सीखा था। सेना में ऊंचे ओहदे से रिटायर होने के बाद ब्रिगेडियर साहब चाहते, तो जयपुर मेें एक पुरसुकून जिंदगी गुजार सकते थे, मगर उन्होंने...

जमीनी बदलाव की वह राह जो राजावत ने दिखाई
Monika Minalछवि सिंह राजावत, पहली एमबीए महिला सरपंचSat, 25 May 2024 11:35 PM
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एक ऐसे समय में, जब देश नए रहनुमाओं को चुन रहा है, जो आने वाले पांच वर्षों में लाखों गांवों पर असरंदाज होने वाली नीतियां बनाएंगे और मुल्क के भविष्य से जुडे़ फैसले करेंगे, तब एक नागरिक या मतदाता के मन में यह सवाल उठ सकता है कि अकेला सांसद या विधायक या पार्षद या सरपंच भला क्या कर सकता है? कितना ही बदलाव ला सकता है? छवि सिंह राजावत इन सवालों का जवाब हैं। राजस्थान के टोंक जिले में एक तहसील है मालपुरा, सोडा इसी का एक गांव है। इसी गांव से वाबस्ता एक संपन्न परिवार में 1977 में छवि का जन्म हुआ। हालांकि, वह पैदा जयपुर में हुईं, मगर अपनी जड़ों से खानदान के गहरे लगाव को देख उन्हें बचपन में ही सोडा का महत्व पता चल गया था। दादा ब्रिगेडियर रघुबीर सिंह राजावत भारत-पाक युद्ध में अपनी जांबाजी के लिए महावीर चक्र से नवाजे जा चुके थे। पूरे इलाकेमें उनकी बड़ी इज्जत थी। कारोबारी पिता नरेंद्र सिंह व मां हर्ष चौहान अपने सामाजिक कार्यों से उस प्रतिष्ठा को और विस्तार देते रहे। 
छवि का बचपन सुविधाओं से पोषित रहा। हालांकि, जब वह मिडिल स्कूल में ही थीं, तभी दादी ने रवायत के मुताबिक उनकी शादी की बात छेड़ी थी, तब ब्रिगेडियर साहब ने पूरे परिवार को हुक्म सुना दिया कि ‘छवि को तब तक शादी के लिए कोई परेशान नहीं करेगा, जब तक वह पढ़ना चाहती है।’ काश! ऐसी प्रगतिशील सोच हर दादा की होती। इसके बाद आंध्र की ऋषि वैली स्कूल से जो सफर शुरू हुआ, वह अजमेर के मेयो व दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज होते हुए पुणे के प्रबंधन संस्थान आईआईएमएम जाकर पूरा हुआ, जहां से साल 2003 में छवि ने एमबीए की डिग्री हासिल की।
स्कूल ने यह सीख देकर अपना सच्चा धर्म निभाया कि कोई इंसान चाहे किसी भी पृष्ठभूमि का हो, वह सम्मान का हकदार है, तो वहीं आईआईएमएम ने प्रगति के व्यवस्थित प्रयास का गहरा सबक सिखाया था। इसके बाद का रास्ता कॉरपोरेट दुनिया की ओर ले गया और छवि ने कई नामचीन कंपनियों में काम किया। मगर इस पूरे सफरनामे की सबसे खूबसूरत बात यही रही कि महानगरों की लकदक और चकाचौंध भरी दुनिया में भी सोडा गांव बराबर छवि के भीतर बना रहा। जब कभी भी पेशेवर दुनिया से मोहलत मिलती, वह भागकर बरास्ते जयपुर, सोडा पहुंच जाया करतीं। 
दरअसल, अपने गांव से कैसा प्रेम होना चाहिए, छवि ने अपने फौजी दादा से यह जाना था। सेना के ऊंचे मुकाम से रिटायर होने के बाद ब्रिगेडियर साहब चाहते, तो जयपुर में एक आरामदेह जिंदगी गुजार सकते थे, मगर उन्होंने अपने पुरखों की माटी की सेवा की राह चुनी। वह दो बार सोडा के सरपंच मुंतखब हुए। छवि इस विरासत की जिम्मेदारी से कभी गाफिल नहीं थीं। जयपुर से सोडा के रास्ते में दूसरे गांवों से गुजरते हुए और कई गांवों को तरक्की के नए नजरिये के साथ आगे बढ़ते देखकर उन्हें लगता कि उनका सोडा पिछड़ गया है। गांव वाले भी अक्सर दुखड़ा रोते और ब्रिगेडियर साहब की सरपंची में हुए कामों को याद करते। यह बात छवि के मर्म को छू लेती थी। हालांकि, तब भी सियासत में उतरने या चुनाव लड़ने का कोई ख्याल उनके मन में नहीं आया था। 
बात साल 2010 की है। राजस्थान सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू कर दिया। संयोग से उनमें सोडा भी आरक्षित हो गया। उसी दौरान छवि जयपुर आईं, तो गांव के करीब 50 बड़े-बुजुर्गों ने उनके घर आकर उनसे गुजारिश की कि वह सरपंच का चुनाव लडें़। एक तरफ, कॉरपोरेट जगत की अनुशासित, आकर्षक और आरामदेह जीवनशैली थी, तो दूसरी ओर गांव की श्रमसाध्य जिंदगी। अपनी माटी से मोहब्बत और गांवों में काम करने की भरपूर गुंजाइश ने छवि को सोचने के लिए बाध्य कर दिया। छवि मान गईं। नौकरी छोड़ सरपंच के चुनाव-मैदान में उतर पड़ीं और वह चुन भी ली गईं। देश की पहली एमबीए महिला सरपंच बनने के लिए राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी खूब चर्चा हुई। मगर चुनाव जीतना और जीतने के बाद जमीन पर बदलाव की बुनियाद रखना दो अलग-अलग चीजें हैं। जैसा कि अमूमन गांवों में होता है, सोडा में भी भू-अतिक्रमण की समस्या बहुत बड़ी थी। पहली ग्रामसभा में ही यह मुद्दा सामने आ गया। अनधिकृत रूप से दशकों से सरकारी भूमि पर काबिज लोगों को पीछे हटने के लिए राजी करना आसान काम नहीं था। इससे जुड़े महकमे तक हार मान चुके थे।
छवि ने अपने प्रबंधन कौशल का इस्तेमाल करते हुए कब्जेदारों को एक रोडमैप दिया कि आप जमीन खाली करेंगे, तो इससे गांव की सड़कें चौड़ी हो जाएंगी और कई सार्वजनिक निर्माण कार्य होंगे। इससे आप सबको ही नहीं, बल्कि आपके नाती-पोतों को भी सहूलियतें होंगी। नीयत नेक थी, योजनाएं जनहित की थीं, तो बात बन गई। छवि ने समझदारी से सहयोग की एक ऐसी इबारत लिखी कि साढ़े सात हजार की आबादी वाला सोडा गांव विकास की राह पर चल पड़ा।
साल 2010 से 2020 तक के दो कार्यकाल में छवि राजावत ने सोडा को कितना बदला, इसे इन आंकड़ों से आंकिए कि सरकारी व सामुदायिक सहयोग से ग्राम पंचायत के 800 घरों में शौचालय बने, इनमें पानी की पाइपलाइन पहंुचाई गई, कई सारे तालाबों को सूखने से बचाया गया और साल भर तक गांव के उपयोग योग्य वर्षा जल के संग्रहण की शुरुआत हुई। पंचायत की छोटी-बड़ी करीब सौ सड़कें बनीं। गांव की महिलाओं के बैंक खाते खुले, उनको छोटी बचत के लिए प्रोत्साहित किया गया। सैकड़ों लड़कियां अब स्कूल में हैं। छवि अब सरपंच नहीं हैं, मगर वह घूम-घूमकर देश भर में लड़कियों को प्रेरित करती रहती हैं। छवि के दिखाए रास्ते पर चलते हुए अब कई उच्च शिक्षित लड़कियां स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ने लगी हैं और कामयाब भी हो रही हैं।
प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह