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अब्बा को बचाने के लिए आतंकियों से भिड़े

irfan ramzan sheikh

इरफान का जन्म जम्मू-कश्मीर के शोपियां जिले में हुआ। शोपियां लंबे समय से अशांत इलाका रहा है। अमन-पसंद लोग हमेशा से आतंकियों के निशाने पर थे। आतंकवादी कभी नहीं चाहते थे कि इलाके का विकास हो और लोग खुशहाल जिंदगी जिएं। इरफान का बचपन ऐसे ही माहौल में बीता। उनके अब्बा मोहम्मद रमजान शेख अमन-पसंद इंसान थे। तमाम मुश्किलों के बावजूद उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल पढ़ने भेजा। परिवार में तीन-भाई बहन थे। इरफान सबसे बड़े बेटे थे। अब्बा चाहते थे कि घाटी में अमन कायम हो, बच्चों को तालीम मिले और लोगों को सम्मान से जीने का मौका। पर दहशतगर्दों को यह कतई मंजूर नहीं था। वे तो नई पीढ़ी को भी दहशतगर्दी का पाठ पढ़ाना चाहते थे। रमजान शेख को सामाजिक और सियासी मसलों में गहरी दिलचस्पी थी। वह महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट से जुड़ गए। इस दौरान उनका इलाके के लोगों से मिलना-जुलना बढ़ता गया। वह स्थानीय लोगों को लोकतंत्र और तालीम का महत्व समझाने लगे। आतंकवादी नहीं चाहते थे कि लोग लोकतंत्र का हिस्सा बनें। पर अब्बा ने आतंकियों की धमकी के बावजूद पंचायत चुनाव में हिस्सा लिया और जीता भी। 

सरपंच बनने के बाद वह स्थानीय समस्याओं के समाधान में जुट गए। बतौर सरपंच उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। गांव के लोग उनकी बड़ी इज्जत करते थे। पर आतंकवादियों को यह कतई पसंद नहीं था।  वे चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों और वोट देने वाले नागरिकों से बहुत नाराज थे। अब्बा को कई बार धमकियां मिलीं, पर उन्होंने परवाह नहीं की। वर्ष 2013 में उनके ऊपर हमला हुआ था, पर वह बाल-बाल बच गए। आतंकवादी उन्हें सबक सिखाने को आमादा थे।

सबसे बड़ा बेटा होने के कारण इरफान शुरू से अब्बा के करीब थे। वह उनकी जिम्मेदारियों और चुनौतियों से वाकिफ थे। उन्हें एहसास था कि अब्बा किन मुश्किलों से जूझ रहे हैं। यह वाकया 16 अक्तूबर, 2017 का है। तब वह 14 साल के थे। रात का समय था। खाना खाने के बाद परिवार के लोग सोने चले गए। इस बीच तीन आतंकवादियों ने अचानक उनके घर को घेर लिया। घर के बाहर शोर सुनकर उन्होंने दरवाजा खोला। तीन आतंकी सामने खड़े थे। उनके हाथों में बंदूकें थीं। आंखों में नफरत और गुस्सा साफ झलक रहा था। इरफान समझ चुके थे कि आतंकी अब्बा को मारने आए हैं।

आतंकवादियों ने अब्बा का नाम पुकारते हुए उन्हें बाहर आने को कहा। आतंकियों के पास हथियार थे और इरफान निहत्थे। पर अब्बा को बचाने के लिए वह बिना वक्त जाया किए आतंकियों पर अकेले ही टूट पड़े। वह नहीं चाहते थे कि आतंकी घर के अंदर घुस पाएं। वह आतंकियों से बंदूक छीनने की कोशिश करने लगे। वह जानते थे कि यदि आतंकी घर के अंदर घुस आए, तो पूरे परिवार को खत्म कर डालेंगे।

आतंकियों ने इरफान को डराने के लिए  गोलियां चलाईं, पर वह वहां से नहीं भागे। दहशतगर्द 14 साल के इस बच्चे का हौसला देखकर दंग थे। इस बीच फार्यंरग की आवाज सुनकर परिवार के बाकी लोगों की नींद भी टूट गई। अब्बा भागते हुए बाहर निकले। सामने बेटे को आतंकियों से भिड़ते देख उनके तो होश ही उड़ गए। उन्होंने इरफान को वहां से भाग जाने की सलाह दी, पर इरफान ने जवाब दिया, मैं आपको छोड़कर नहीं जाऊंगा। इसी दौरान आतंकियों ने जबर्दस्त फार्यंरग शुरू कर दी। उनके निशाने पर अब्बा थे। गोलियों से छलनी होकर वह जमीन पर गिर पड़े। इरफान ने एक बार फिर आतंकियों से बंदूक छीनने की कोशिश की। आतंकियों ने दहशत फैलाने के लिए कई राउंड फार्यंरग की। इस दौरान एक आंतकी को भी गोली लग गई और वह मारा गया। साथी को मरा देखकर बाकी आतंकी भाग खड़े हुए।

गोलियों की आवाज सुनकर गांव के लोग भी जाग गए। बेहद खौफनाक मंजर था। अब्बा खून से लथपथ जमीन पर पड़े थे। घर के लोग दहशत से कांप रहे थे। गांव के कुछ लोग अब्बा को लेकर अस्पताल की ओर भागे। इस दौरान इरफान ने भाई-बहन को संभालते हुए अब्बा के ठीक होने का भरोसा दिलाया। पर अस्पताल पहुंचने से पहले ही अब्बा ने दम तोड़ दिया। पूरे गांव में इरफान के बुलंद हौसले की तारीफ होने लगी। उनकी वजह से ही आतंकी घर के अंदर नहीं घुस पाए। इरफान की ललकार से आतंकी इतने सहम गए थे कि वे अपने साथी का शव ले जाने की हिम्मत भी नहीं कर पाए।

इरफान इस समय दसवीं कक्षा में पढ़ रहे हैं। वह पुलिस अफसर बनकर देश की सेवा करना चाहते हैं। अब उनका मकसद दहशतगर्दों को सबक सिखाना है। हालांकि आज भी उनके मन में यह मलाल है कि वह अपने अब्बा की जान नहीं बचा सके। केंद्र सरकार ने 17 साल के इरफान को उनकी बहादुरी के लिए  शौर्य चक्र से सम्मानित करने का फैसला किया। पिछले सप्ताह राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें एक भव्य समारोह में मेडल देकर सम्मानित किया।
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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