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हर पिता ऐसी बेटी पर नाज करेगा

पिछले इतवार को भारतीय महिला हॉकी टीम की परियों का एक वीडियो सोशल मीडिया और खबरिया चैनलों पर खूब वायरल हुआ। बस के अंदर जश्न में डूबी इन शहजादियों पर अपना स्नेह बरसाते असंख्य हिन्दुस्तानियों ने भी अपना सुर साधा- सुनो गौर से दुनिया वालो... सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी। यह खुशी हिरोशिमा में एफआईएच शृंखला में जीत के साथ महिला हॉकी टीम के अगले ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने से उपजी थी। मगर इसी टीम की एक लड़की अपने घर पहुंचने को बेताब थी। उसे अपनी मां के गले लगकर खूब रोना था। अपनी बहन की पेशानी चूम उसे हौसला देना था। वह खिलाड़ी थी- लालरेमसियामी। टीम की साथी लड़कियां उन्हें सियामी कहती हैं।
 

मिजोरम की राजधानी आइजोल से तकरीबन 80 किलोमीटर दूर है कोलासिब नगर। करीब 25,000 आबादी वाले इसी पहाड़ी नगर के छोटे-से घर में 30 मार्च, 2000 को सियामी पैदा हुईं। उनके घर तक पहुंचना आसान नहीं। वहां तक ले जाने वाली सड़क गड्ढों और कीचड़ से भरी हुई मिलती है। पिता ललथनसंगा खेतीबाड़ी करते थे और मां लाजरमावी गृहिणी हैं। परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी, लेकिन सियामी के साथ सुखद बात यह रही कि वह एक ऐसे प्रदेश में पैदा हुईं, जहां पर खेल-कूद की अच्छी संस्कृति है। जब वह 10 साल की थीं, तभी उन्हें इंटर-स्कूल खेल आयोजन में अपने स्कूल का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला और उसमें उन्हें सर्वश्रेष्ठ हॉकी खिलाड़ी चुना गया। इनाम के तौर पर 500 रुपये नगद मिले थे। 
 

सियामी के जीवन में अहम मोड़ 11 साल की उम्र में ही आ गया। थेंजवाल में राज्य सरकार द्वारा संचालित हॉकी एकेडमी में उनका चयन हो गया। जब यह खबर उन्होंने पिता को सुनाई, तो उनका पहला सवाल था- क्या यह फ्री में है? दरअसल, वह किसी एकेडमी की फीस भरने की स्थिति में नहीं थे। सियामी के माता-पिता तो अपनी बेटी से मिलने थेंजवाल भी नहीं जा सकते थे, क्योंकि वहां तक जाने-आने के लिए उन्हें 300 रुपये टैक्सी के चुकाने पड़ते। लाजरमावी बताती हैं, ‘जब सियामी स्टेट एकेडमी के लिए घर से निकल रही थी, तब उसने मुझसे कहा कि देखना, एक दिन मैं देश के लिए खेलूंगी। उस समय हम उसकी इस बात पर हंस पडे़ थे।’
 

माएं बच्चों की उड़ान पर हर्षित तो होती हैं, मगर उनके अंदेशे भी कम नहीं होते। और फिर एक ऐसी मां, जिसने खेती की दुनिया से परे कुछ जाना-समझा नहीं, वह बेटी के इतने बडे़ ख्वाब पर बस मुस्करा ही सकती थी। मगर सियामी का संकल्प पूरा हुआ। साल 2016 में उनका चयन नेशनल हॉकी एकेडमी के लिए हो गया। 2017 के एशिया कप की स्वर्ण पदक विजेता टीम में भी सियामी शामिल थीं। इसके अगले ही साल विश्व कप में देश का प्रतिनिधित्व करने वाली टीम में भी उनको जगह मिली। तब उनकी उम्र 18 वर्ष थी। वह टीम की सबसे कम उम्र खिलाड़ी थीं। 2018 में जब एशियन गेम्स में महिला हॉकी टीम पदक लेकर लौटी, तो पूरा कोलासिब अपनी बेटी की पालकी उठाने को सड़क पर उमड़ आया था। मिजो-परंपरा में यह सबसे बड़ा सम्मान होता है।
पिछले साल एक इंटरव्यू के दौरान एक वाकये का जिक्र करते हुए ललथनसंगा भावुक हो उठे थे- ‘मेरी बेटी ने एक रात मुझे फोन पर बताया कि उसकी जेब में महज दो रुपये रह गए हैं। मुझे बड़ी पीड़ा हुई कि मैं कैसा पिता हूं कि अपनी बेटी की जरूरतों के लिए कुछ नहीं कर सका। मैंने उसकी एक रूममेट से बात की, जिसे वह दीदी कहती है। उनसे अनुरोध किया कि वह मेरी बेटी को कुछ रुपये उधार दे दें। वह बड़ी मददगार हैं। उन्होंने हमेशा मेरी सियामी की मदद की। मैं तो अक्सर बाद में ही रुपये की व्यवस्था कर पाता था।’ 

 

सियामी के लिए नेशनल हॉकी एकेडमी में सबसे बड़ी चुनौती भाषा की थी। जब वह दिल्ली आईं, तब हिंदी का एक शब्द भी नहीं बोल सकती थीं। उन्होंने मिजो-हिंदी डिक्शनरी की मदद ली। टीम की कप्तान रानी रामपाल (जिनको वह दीदी कहती हैं) ने भाषा से इस संघर्ष में सियामी का खूब साथ दिया। वह कहती हैं, ‘अब मैं कुछ-कुछ हिंदी बोल लेती हूं।’ 
 

जिंदगी ने इसी 21 जून को महज 19 साल की सियामी की एक कड़ी परीक्षा ली। एक तरफ देश के प्रति फर्ज था, दूसरी तरफ बेटी का धर्म। चयन आसान न था। एफआईएच शृंखला के तहत शनिवार को खेला जाने वाला सेमीफाइनल भारत को ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कराने वाला था; और शुक्रवार की सुबह दिल का दौरा पड़ने से ललथनसंगा दुनिया छोड़ गए। कोच ने कहा- सियामी, चाहो तो पिता के अंतिम दर्शन के लिए फ्लाइट ले सकती हो। बेटी का जवाब था, ‘सर, पिता अब जहां भी हैं, मैं उन्हें गर्व का एहसास कराना चाहती हूं। मैं खेलूंगी और अपने देश को ओलंपिक में लेकर जाऊंगी।’ वह खेली, देश जीता, और सवा अरब देशवासियों ने अपनी इस बेटी, बहन, भगिनी पर नाज किया।
 

प्रस्तुति:  चंद्रकांत सिंह

 

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  • Web Title:Hindustan Jeena Isi Ka Naam Hai Column on June 30