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चाहती हूं कि रिफ्यूजी मुझ पर गर्व करें

yusra mardini  twitter

हर जंग बेहिसाब जख्मों के बीच जज्बे की कहानियां भी पैदा करती है। युसरा मर्दिनी की कहानी ऐसी ही है। मार्च 1998 में सीरिया की राजधानी दमिश्क में एक तैराक के घर वह पैदा हुईं। उनके पिता नेशनल तैराकी टीम के सदस्य थे। मगर फौजी सर्विस की बाध्यता ने उनसे उनके सारे ख्वाब छीन लिए। फिर तो अपनी बेटियों में वह उस शौक को जीने लगे। युसरा बहुत छोटी थीं, तभी उनके पिता ने बड़ी बहन सारा के साथ उन्हें स्विमिंग पूल में उतार दिया। वह जुनूनी हद तक बेटियों को तैराकी की प्रैक्टिस के लिए मजबूर करते थे। सारा के कंधे में खिंचाव आए या युसरा के कानों में इन्फेक्शन हो, बेटियों को कोई रियायत नहीं मिलती। वह चाहते थे कि उनकी बेटियां दुनिया की सर्वश्रेष्ठ तैराक बनें। सख्त-मिजाज पिता की डरी-सहमी बेटियों के दो-दो घंटे रोजाना स्विमिंग पूल में बीतते रहे। सारा ने तो पैन-अरब गेम्स में मेडल भी जीता।

मगर सीरिया के हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे थे। एक दिन घर लौटते वक्त दोनों बहनें जैसे ही अपनी गली में मुड़ीं, उन्होंने तीन टैंकों को दूसरे मुहाने पर पाया। एक फौजी ने सीधे उनकी कार को निशाना बनाया। युसरा समझ गईं कि अब उन सबकी जिंदगी खतरें में आ गई है। इस घटना के चंद रोज बाद ही उनके पिता को गलत पहचान देने के एक मामले में हिरासत में ले लिया गया और छत से उल्टा लटकाकर बुरी तरह पीटा गया। इतना ही नहीं, बुल्डोजर से उनका घर जमींदोज कर दिया गया। वे किराये के मकान में आ गए, जहां मकान मालिक उनकी मजबूरियों के फायदे उठाने की फिराक में हरदम रहता। सारा और युसरा ने सीरिया से किसी तरह भागने का इरादा किया।

साल 2015 की गरमियों में अपनी मां और छोटी बहन को दमिश्क में छोड़कर वे तुर्की के रास्ते ग्रीस के लिए निकल पड़ीं। मगर उनकी पहली कोशिश नाकाम हो गई, क्योंकि तुर्की के तटरक्षकों ने उनकी नाव को लौटने को विवश कर दिया। उन्होंने फिर कोशिश की, मगर मुसीबतें आसानी से उनका पीछा कहां छोड़ने वाली थीं। अबकी बार उनकी नाव में क्षमता से कई गुना ज्यादा लोग सवार थे। उसे समुुद्र में तैरते हुए बमुश्किल 15 मिनट हुए होंगे कि नाव का इंजन फेल हो गया। पहले तो उन लोगों ने अपने कम जरूरी सामान समुद्र में फेंके, ताकि नाव का भार कुछ कम हो सके, मगर बात नहीं बनी। फिर एक शख्स ने नाव को बचाने की पहल शुरू की, हालांकि वह तैरना नहीं जानता था। शाम होने वाली थी और समुद्र में लहरें भी हिलोरें लेने लगी थीं। सभी मौत को करीब आता देख रहे थे।

युसरा और सारा पेशेवर तैराक थीं। उन्हें यूं सबको डूबते देखना गवारा न हुआ। उन्होंने नाव को पार लगाने का इरादा बांधा। वे लहरों के बीच कूद पड़़ीं। उन्हें देख दो और सवारों ने छलांग लगाई, वे भी थोड़ा-बहुत तैरना जानते थे। मगर पानी काफी ठंडा था और लहरें भी ऊंची होने लगी थीं। कुछ ही देर में इन सबके हौसले चूकने लगे। मगर युसरा ने होश नहीं खोया और करीब साढ़े तीन घंटे तक समुद्री लहरों से लड़ते हुए वे सब नाव को खींचते रहे। नियति ने साथ दिया। दोबारा इंजन ने काम करना शुरू कर दिया और नाव में सवार 20 लोगों की जिंदगी बच गई। उस वाकये को याद करके युसरा ने कहा- ‘मुझे उस घटना के बाद दरिया से नफरत-सी हो गई। वह वाकई बेहद खौफनाक अनुभव था।’

लेकिन इसके आगे की मुश्किलें भी कोई कम न थीं। दोनों बहनों के पास न तो गरम कपड़े थे और न जूते। फिर यूरोप में शरणार्थियों को लेकर माहौल भी गरमाने लगा था। किसी तरह सितंबर 2015 में दोनों बहनें बर्लिन (जर्मनी) पहुुंचीं। युसरा के भीतर का तैराक ठांठें मारने लगा था। शरणार्थी शिविर में ही उन्हें एक आदमी मिला, जो ग्रीस और जर्मनी, दोनों की भाषाएं कुछ-कुछ जानता था। उसके सहारे वह स्थानीय स्विमिंग क्लब तक पहुंच गईं। वहां के कोच ने जब उनकी प्रतिभा देखी, तो उसने खुशी-खुशी उन्हें अपनी टीम में शामिल कर लिया। करीब एक साल की आजमाइश के बाद युसरा ने रियो के समर ओलंपिक के लिए 100 मीटर फ्री स्टाइल और 100 मीटर बटरफ्लाई के लिए क्वालिफाई कर लिया।

इसके बाद तो युसरा मर्दिनी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें गुडविल एंबेसडर के रूप में चुना। जनवरी 2017 में वह दावोस में आयोजित वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम की बैठक को संबोधित करने वाली सबसे युवा प्रतिनिधि थीं। उन्होंने दुनिया भर के शरणार्थियों और उनके बच्चों के दर्द को आवाज दी- ‘हमारे पेट में दाने होंगे, तो हम जिंदा रह सकेंगे, मगर हमारी आत्मा को खुराक मिलेगी, तभी हम एक इंसान के तौर पर उन्नति करने लायक बन पाएंगे।’ युसरा ने विश्व भर की सरकारों से अपील की कि दर-बदर लोगों की जिंदगी को अधर में मत छोड़िए। संयुक्त राष्ट्र की गुडविल एंबेसडर के रूप में वह पोप और बराक ओबामा से भी मिलीं। इस बीच सीरिया में छूट गया उनका बाकी परिवार भी बर्लिन आ गया। इन दिनों वह बर्लिन में रहती  हैं और अगले साल जापान में होने वाले ओलंपिक की तैयारियों में जुटी हैं। 
(प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह)

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  • Web Title:Hindustan Jeena Isi Ka Naam Hai Column on June 23