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काश! पिता आज मेरे साथ होते

कहते हैं कि वक्त आपके जख्मों को भरता नहीं, बस उनके साथ जीना सिखा देता है। हरियाणा में रोहतक के करीब चमरिया गांव में पैदा हुए दीपक निवास हूडा की जिंदगी पर यह बात पूरी तरह से लागू होती है। 10 जून, 1994 को एक गरीब किसान घर में जन्मे दीपक के साथ जिंदगी बड़ी बेरहमी से पेश आई। उनकी उम्र तब महज चार साल थी। मां चल बसीं। बिन मां के बच्चे अपना लड़कपन कहां जी पाते हैं, सो बड़ी बहन और पिता की देख-रेख में वह भी उम्र के पड़ाव पार करते रहे। 
दीपक पढ़ने में काफी अच्छेे थे।

अभावों में पलते हरेक बच्चे की तरह उनके भीतर भी यही भावना जोर मारती रही कि वह पढ़-लिखकर एक अच्छा मुकाम हासिल करेंगे और अपने घर में पैठ आई बेबसी व महरूमी को हमेशा-हमेशा के लिए झटक देंगे। उनका सपना इंजीनियर बनने का था, मगर घर के माली हालात सपनों का साथ देने को तैयार न थे। मां की मौत के कुछ साल बाद पिता रामनिवास हूडा भी बीमार रहने लगे थे। दीपक जब 12वीं में थे, तभी पिता ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया। जिम्मेदारियों का सारा बोझ अब उनके कंधे पर था। इसमें बहन और उसके दो छोटे बच्चों की देखभाल भी शामिल थी। पति से अलगाव के बाद वह पिता के घर ही रह रही थीं। घर में इतने पैसे भी न थे कि वह पैतृक खेतों में ही कुछ कर लेते, इसलिए खेती का ख्याल छोड़ फौरन कुछ कमाने की मजबूरी उनके सामने खड़ी थी।

पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी। इंजीनियर बनने के ख्वाब को सीने में दफ्न कर दीपक ने एक निजी स्कूल में शिक्षक की नौकरी पकड़ ली। इन्हीं मुश्किल दिनों में उन्हें कबड्डी में अपना करियर नजर आया। बकौल दीपक, ‘मैंने कबड्डी में इसलिए दिलचस्पी लेनी शुरू की, क्योंकि इसी के जरिए मैं अपनी बहन और उनके बच्चों के लिए कुछ पैसे कमा सकता था। मैंने सोचा कि यदि मुझे खेल से कोई नौकरी मिल जाएगी, तो उन्हें कुछ बेहतर जिंदगी दे सकूंगा।’

मगर इस खेल में भी पहचान बनाना कोई आसान काम नहीं था। वैसे भी, दीपक ने 12वीं  के बाद कबड्डी का दामन थामा था, जबकि  उनके साथी खिलाड़ियों के पास वर्षों का तजुर्बा था। इसके अलावा, उन्हें स्कूल की नौकरी के जरिए घर के लिए रोटी भी कमानी थी। बहुत मेहनत करनी पड़ी। कभी-कभी तो कबड्डी की प्रैक्टिस, स्कूल और खेतों में 20-20 घंटे तक गुजर जाते थे। थकान मिटाने को बमुश्किल चार-साढे़ चार घंटे का वक्त मिल पाता था। एक-डेढ़ वर्ष तक यह सिलसिला चलता रहा। इसी बीच दीपक ने बीए मेें दाखिला ले लिया और उन्हें ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी टूर्नामेंट में शिरकत करने का मौका मिल गया। इस टूर्नामेंट में दीपक को स्वर्ण पदक मिला। यह कामयाबी उनके लिए मील का पत्थर साबित हुई।

साल 2014 में क्रिकेट आईपीएल की तर्ज पर ‘प्रो कबड्डी लीग’ की शुरुआत हुई। कबड्डी को पेशेवर अंदाज में पेश करने वाले इस आयोजन ने कई प्रतिभाओं की जिंदगी बदल दी। उनमें से एक दीपक निवास हूडा भी हैं। वह 20 मई की तारीख थी। आठ टीमों के खिलाड़ियों के लिए फ्रेंचाइजी (संचालक) बोलियां लगा रहे थे। दीपक हूडा को तेलुगु टाइटंस ने 12.60 लाख रुपये में अपनी टीम के लिए अनुबंधित किया। सबसे अधिक बोली हासिल करने वालों में दीपक दूसरे पायदान पर थे, उनसे ज्यादा सिर्फ राष्ट्रीय कबड्डी टीम के कप्तान रमेश कुमार के नाम पर बोली लगी थी। दीपक ने इतनी बड़ी रकम के बारे में सपने में भी नहीं सोचा था। वह कहते हैं, ‘जब मुझे मेरा पहला चेक मिला, तो मैंने अपनी बहन और उनके बच्चों को पूरे रोहतक में घुमाया और उनके लिए ढेर सारे कपडे़ व खिलौने खरीदे।’ 

शुरू-शुरू में दीपक ने बतौर रेडर अपनी प्रतिभा दिखाई, लेकिन वास्तव में वह एक ऑल राउंडर हैं और कई खास मैचों में उन्होंने इसका मुजाहरा भी किया है। उनके खेल की एक बड़ी खूबी यह है कि मुश्किल हालात में भी शांत रहते हुए वह टीम को जीत की दहलीज पर पहुंचा देते हैं। उनका खेल कौशल उनकी कामयाबियों में बोलता है। साल 2016 में वह राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बने और उसी साल दक्षिण एशियाई खेलों और 2017 के एशियन कबड्डी चैंपियनशिप से स्वर्ण पदक लेकर लौटे। पिछले साल दुबई से लौटते वक्त भी उनके गले में सोने का तमगा था। वीवो प्रो कबड्डी लीग के सातवें सीजन में दीपक जयपुर पिंक पैंथर्स की कप्तानी कर रहे हैं। इस साल जिन खिलाड़ियों को उनकी टीमों ने रिटेन किया है, उनमें सबसे महंगे खिलाड़ी दीपक ही हैं। पिछले वर्ष जयपुर पिंक पैंथर्स ने उन्हें 1.15 करोड़ रुपये में खरीदा था।

आज दौलत और शोहरत की बुलंदियों पर खड़े दीपक को एक बात अक्सर कचोटती है। वह जब भी स्कूल जाने से पहले कबड्डी की प्रैक्टिस के लिए तड़के तीन बजे जगते, तो पिता उन्हें पढ़ाई पर फोकस करने के लिए टोकते थे। दीपक को मलाल है कि ‘आज जब मैंने खेल में नाम कमाया, तो मेरी कामयाबी का जश्न मनाने के लिए पिता नहीं हैैं।’

प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह

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  • Web Title:Hindustan Jeena Isi Ka Naam Hai Column on August 4th