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मौत नहीं, हालात से लड़ने का रास्ता चुना

तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले में एक शहर है नागरकोइल। कहा जाता है कि यहां के नागराज मंदिर से इस शहर का नाम प्रेरित है। जैसमीन और कॉफी की खुशबू इसकी फजाओं में हमेशा गमकती रहती है। इसी शहर के एक रूढ़िवादी ईसाई परिवार में पेट्रीशिया का जन्म हुआ। उनका बचपन काफी खुशहाल रहा, क्योंकि माता-पिता, दोनों सरकारी मुलाजिम थे। तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी पेट्रीशिया नाजों में पलीं।

साल-दर-साल उम्र और तालीम के पड़ावों को पार करती हुई पेट्रीशिया क्वीन मैरी कॉलेज पहुंचीं। यहीं पर उनकी मुलाकात नारायण से हुई। एक-दूसरे के प्रति आकर्षित युवा जोडे़ ने साथ-साथ जिंदगी बिताने का फैसला किया। पर यह आसान न था। नारायण हिंदू ब्राह्मण समुदाय से थे और पेट्रीशिया ईसाई। माता-पिता को भनक लगी, तो इसे एक कभी न पूरा हो सकने वाला ख्वाब बताकर पेट्रीशिया को सख्त हिदायत दी गई कि वह नारायण को भूल जाएं। उधर नारायण के परिवार की प्रतिक्रिया भी ऐसी ही थी, पर वे दोनों नहीं माने। उन्होंने छिपकर शादी कर ली।

शादी की खबर सुन पेट्रीशिया के पिता इतने नाराज हुए कि उन्होंने बेटी से सारे रिश्ते ही तोड़ लिए। नारायण के परिवार ने भी उनसे अपना नाता खत्म कर दिया। पेट्रीशिया और नारायण के लिए यह अप्रत्याशित स्थिति नहीं थी। शादी के शुरुआती कुछ महीने काफी हसीन रहे, मगर जल्द ही पेट्रीशिया उस हकीकत के रूबरू थीं कि नारायण ड्रग्स और शराब का लती इंसान है। असलियत जाहिर हो जाने के बाद नारायण ने भी लिहाज को दूर झटक दिया। अब तो तकरीबन रोज दोनों मियां-बीवी में तकरार होती और नारायण पेट्रीशिया के साथ गाली-गलौज व मार-पीट पर उतर आता।

पेट्रीशिया इस अपराध-बोध के साथ जीने को मजबूर थीं कि तमाम विरोधों के बावजूद उन्होंने खुद नारायण का इंतखाब किया था। 18 साल की पेट्रीशिया इस बीच दो बच्चों की मां भी बन चुकी थीं। पिता बनने के बाद भी नारायण के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया था। पेट्रीशिया अब और बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थीं। वह कहती हैं, ‘दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ मुझे निकाल दिया गया। तब दो ही विकल्प सूझ रहे थे- या तो मुझे मर जाना चाहिए या फिर हालात से लड़ना चाहिए। मैंने अकेले संघर्ष करने का रास्ता चुना।’

उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि शुरुआत कहां से करें। पिता बेहद नाराज थे, उन्होंने बेटी को माफ तो नहीं किया, मगर सिर छिपाने की जगह दे दी। पेट्रीशिया के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना जीने की पहली शर्त थी। उन्होंने सोचा कि जो काम उन्हें अच्छा आता है, उसी में हाथ आजमाना चाहिए। उन्होंने मां से कुछ सौ रुपये लिए और अचार, जैम और शरबत बनाना शुरू किया। तब दस रुपये का भी कुछ बिक जाता, तो वह उनके आत्मविश्वास के लिए सीमेंट का काम करता था। पेट्रीशिया के पिता के एक दोस्त दिव्यांग बच्चों के लिए स्कूल चलाते थे। वह दो दिव्यांग लोगों को काम पर रखने वालों को खोखे दिया करते थे। पेट्रीशिया को भी एक खोखा मुफ्त में दे दिया। पेट्रीशिया ने दिव्यांगों को कॉफी बनाने और उन्हें ग्राहकों को देने की ट्रेनिंग दी।

पेट्रीशिया चूंकि समुद्री तट के करीब ही रहती थीं, सो उन्हें लगा कि अगर खोखे को बीच पर ले जाया जाए, तो अच्छी बिक्री हो सकती है। प्रशासनिक अनुमति मिलने में एक साल लग गए। पर वह जून 1982 की उस रात को कभी नहीं भूलतीं, जब रिक्शे वालों की मदद से उन्होंने अपने खोखे को ठेलकर मरीना बीच पर जमाया था। ख्वाबों ने फिर परवाज भरी थी। चूंकि वहां के खोखे चाय-कॉफी और सिगरेट ही बेचते थे, पेट्रीशिया ने अपने खोखे में कटलेट्स, समोसा, भाजी, जूस और चाय-कॉफी बेचने का फैसला किया। मगर पहले दिन की बिक्री से भारी धक्का लगा। वह सिर्फ एक कप कॉफी बेच सकीं और महज 50 पैसे की कमाई हुई।

पेट्रीशिया घर आईं और फूट-फूटकर रो पड़ीं। मां ने ढाढ़स बंधाया- तुम कल जरूर बेहतर करोगी। अगले दिन उन्होंने 700 रुपये की चीजें बेचीं। उनके खोखे में व्यंजनों की संख्या बढ़ती गई। 1982 की 50 पैसे की कमाई 2003 में 25,000 रोजाना पर पहुंच गई थी। पेट्रीशिया के हुनर को देखते हुए 1984 में ही स्लम क्लीयरेंस बोर्ड ने उन्हें अपने दफ्तर में कैंटीन चलाने का प्रस्ताव दिया, फिर बैंक ऑफ मदुरई का प्रस्ताव मिला...। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

साल 2004 में नवब्याहता बेटी और दामाद की सड़क दुर्घटना में मौत के बाद बेटी संदीपा के नाम पर उन्होंनें रेस्तरां शुरू किया। आज उनके रेस्तरां शृंखला में 200 लोग काम करते हैं और उनकी कमाई रोजाना दो लाख के आंकड़े को पार कर चुकी है। उनकी उद्यमिता को फिक्की ने 2010 में वुमन इंटरप्रिन्योर ऑफ द ईयर से सम्मानित किया। साल 2016 में उन्हें इंडियन एक्सप्रेस देवी अवॉर्ड से नवाजा गया। पेट्रीशिया नारायण आज 14 रेस्तरां वाली ‘संदीपा चेन ऑफ रेस्टूरेंट्स’ की निदेशक हैं।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह

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  • Web Title:Hindustan Jeena Isi Ka Naam Hai Column on 28th July