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Hindi News ओपिनियन जीना इसी का नाम हैअफ्रीका के सबसे बड़े स्लम में हीरे तराशता एक जौहरी

अफ्रीका के सबसे बड़े स्लम में हीरे तराशता एक जौहरी

महानगरों के भूगोल के साथ-साथ लोकतांत्रिक चेतना के विस्तार ने आज भले उनको बीचोबीच समेटने को मजबूर किया हो, पर तथाकथित भद्र समाज ने तो उनके लिए हमेशा हाशिये का टुकड़ा ही तय किया और उसे नाम दिया- स्लम...

अफ्रीका के सबसे बड़े स्लम में हीरे तराशता एक जौहरी
Monika Minalकेनेडी ओडेडे, सामाजिक कार्यकर्ताSat, 11 May 2024 08:53 PM
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महानगरों के भूगोल के साथ-साथ लोकतांत्रिक चेतना के विस्तार ने आज भले उनको बीचोबीच समेटने को मजबूर किया हो, पर तथाकथित भद्र समाज ने तो उनके लिए हमेशा हाशिये का टुकड़ा ही तय किया और उसे नाम दिया- स्लम, यानी मलिन बस्ती! देश-काल कोई हो, बुनियादी सुविधाओं से वंचित इन बस्तियों में जीने वालों को अक्सर बाकी शहर ने हिकारत भरी नजरों से ही देखा, यह और बात है कि कथित भद्रलोक का जीवन इनके बिना एक दिन भी नहीं चल सकता। केन्या की राजधानी नैरोबी में एक ऐसी ही विशाल मलिन बस्ती है, किबेरा। केनेडी ओडेडे की कर्मस्थली।
करीब चालीस साल पहले केन्या के एक छोटे से गांव में पैदा हुए केनेडी ओडेडे जब दो साल के थे, तभी उनके परिवार को गांव छोड़ना पड़ा, क्योंकि अकाल के कारण लोग तेजी से भुखमरी के शिकार बनने लगे थे। जान बच सकने की उम्मीद उन्हें राजधानी नैरोबी ले आई थी, जहां अफ्रीका की सबसे बड़ी झोंपड़पट्टी किबेरा में उन सबको पनाह मिली। केनेडी ने इसी बस्ती में होश संभाला। अब जिस बस्ती में पानी, बिजली और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं न हों, वहां के बच्चों के लिए स्कूल और पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था भला कौन करता? किबेरा में गरीबी और भूख का आलम यह था कि पड़ोस में जिस किसी घर में भी मांस पकता, उसे धनी समझ लिया जाता, और भूख से जब केनेडी के होंठ खुश्क दिखने लगते, तो मां कहतीं- ‘बेटे, पानी से अपने होंठ तर कर लो, ताकि लगे कि तुमने कुछ खाया है और कोई तुम्हारी हालत पर तरस न खाए।’ मां ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था, पर अभावग्रस्त जिंदगी जीते हुए भी उन्होंने अपने बेटे को हमेशा प्रोत्साहित ही किया। मगर बालक मन कब तक अपनी भूख और लालसाओं को बांधे रख सकता था?
ऐसा अब अक्सर होने लगा था कि घर में खाने को कुछ भी नहीं होता। दस साल की उम्र रही होगी, जब केनेडी दोस्तों के साथ घर से भाग गए। सड़क ही अब उनका ठिकाना थी। कूडे़ से खाना चुनने से लेकर चोरी करने और नशीली चीजें बेचने वाले समूह तक के लिए किशोर केनेडी ने काम किया। पैसे बनाने के लिए नहीं, बस किसी तरह अपनी भूख मिटाने के लिए। इस जिंदगी ने केनेडी से उनकी गरिमा छीन ली थी। लावारिस बच्चों से दुर्व्यहार वैसे ही उन्हें समाज के प्रति बागी बना देता है, केनेडी भी सभी पर संदेह करने लगे थे। 
एक दिन भूख से जब पेट में दर्द उठने लगा और जेब में कुछ भी बाकी न था, तो उन्होंने फल की दुकान से एक आम चुराने की कोशिश की। केनेडी चोरी करते पकडे़ गए। भीड़ ने उन्हें इतनी बेरहमी से पीटना शुरू किया, जैसे वह जान लेकर ही मानेगी। मगर तभी एक शख्स अवतारी बनकर आया। उसने न सिर्फ केनेडी को हिंसक भीड़ से बचाया, बल्कि दुकानदार को उसके आम की कीमत भी चुकाई और फिर उन्हें अपने साथ ले जाकर भरपेट भोजन कराया। न वह व्यक्ति उन्हें जानता था और न केनेडी ने उसे पहले कभी देखा था। मगर अपनी उदारता से वह करुणा व दयालुता जैसे उच्च मानवीय मूल्यों से केनेडी का परिचय करा गया था। 
इस वाकये ने किशोर केनेडी का नजरिया ही बदल दिया। भीतर से मानो आवाज आई- तुम्हें ऐसा ही इंसान बनना था, मगर तुम गलत राह पर बढ़ गए! केनेडी ने उस गरिमाहीन जीवन को त्यागने का फैसला किया। मगर यह इतना आसान भी नहीं था। लोग जब भी उन्हें ‘जज’ करते, तो मन करता कि इसी क्षण मौत को गले लगा लें। फिर फादर अल्बर्टो मिले। उन्होंने केनेडी का दाखिला एक स्कूल में करा दिया। बाद में केनेडी को एक फैक्टरी में नौकरी भी मिल गई। दस घंटे की शिफ्ट थी, जिसके बदले 100 शिलिंग (केन्याई मुद्रा) मिलने लगी थी। इसी दौरान उन्हें मार्टिन लूथर किंग (जू) के बारे में पढ़ने को मिला। इससे वह चमत्कारिक रूप से प्रभावित हुए।  
पंद्रह साल के केनेडी की आंखों में किबेरा का डॉ किंग बनने का सपना उतर आया था। आगे की जिंदगी एक खुली किताब की तरह उनके सामने थी। वह जान चुके थे कि उनके जैसे किशोर महज 20 शिलिंग के लिए क्यों मरने को तैयार रहते हैं? दरअसल, वे सब गहरी नाउम्मीदी के शिकार थे। केनेडी ने उन सबको निराशा के गर्त से निकालने का प्रण लिया। अपनी कमाई से वह थोड़े-थोड़े पैसे बचाने लगे। उन पैसों से उन्होंने एक गेंद (फुटबॉल) खरीदी और समुदाय के बच्चों को जोड़ना शुरू कर दिया। केनेडी अपने दोस्त जॉर्ज के साथ मिलकर इसे एक आंदोलन का रूप देने लगे। 
साल 2004 से शुरू ‘शाइनिंग होप फॉर कम्युनिटीज’ ने किबेरा के हजारों नौजवानों को जिंदगी को देखने नया का नजरिया दिया। इसने साफ-सफाई, बागवानी, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल संचालन, स्त्री-सुरक्षा जैसे विभिन्न सामाजिक कार्यों से उन्हें जोड़ा। उनमें उम्मीदों के नए बीज डाले। इसी दौरान इंटरनेट के जरिये केनेडी की मुलाकात अमेरिकी युवती जेसिका से हुई। वह केन्या एक अध्ययन के सिलसिले में आने वाली थीं। जेसिका आईं, तो उसी मलिन बस्ती में रुकीं और केनेडी व किबेरा के सपनों पर हमेशा के लिए न्योछावर हो गईं। अमेरिका की वेस्लेयन यूनिवर्सिटी ने केनेडी को पूर्ण छात्रवृत्ति के साथ अपने यहां से ग्रेजुएशन करने का प्रस्ताव दिया। डिग्री के बाद केनेडी ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
फिर ऐसे मोड़ भी आए, जब किबेरा ने केनेडी को अपना मेयर निर्वाचित किया। अपने संगठन ‘शाइनिंग होप फॉर कम्युनिटीज’ के जरिये केनेडी ने अब तक इस मलिन बस्ती की हजारों जिंदगियों को एक नया अर्थ दिया है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने साल 2022 में उन्हें ‘यंग ग्लोबल हीरो’ चुना था। हाल ही में प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम ने उन्हें 2024 की सौ प्रभावशाली हस्तियों में शामिल किया है, केनेडी अफ्रीका के करोड़ों युवाओं के आज रोल मॉडल हैं।  
प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह