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31 मार्च, 2020|7:56|IST

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भूदान की सबसे कामयाब योद्धा

भारत की आजादी की उम्मीदें तब कुछ पुख्ता जमीन पकड़ चुकी थीं, मगर सामाजिक जड़ता का अंधेरा अब भी काफी घना था। सुखद कुछ था, तो बस इतना कि एक तरफ बाबा साहेब आंबेडकर अस्पृश्यता के खिलाफ सक्रिय थे, वहीं दूसरी तरफ महात्मा गांधी भी प्रतिबद्धता के साथ इस कुरीति से लड़ाई में मुखर थे। भारतीय समाज तब कई मोर्चों पर संघर्ष कर रहा था। उसी राजनीतिक-सामाजिक ऊहापोह भरे दौर में तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले में कृष्णामल का जन्म हुआ। वह साल 1926 था।

कृष्णामल के बचपन की तकलीफों का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि वह एक भूमिहीन दलित परिवार में पैदा हुईं। जिंदगी की तल्ख हकीकतों से ऐसे बच्चों की जान-पहचान शायद दुनिया में आने के पहले ही हो जाती है। कृष्णामल इस मामले में खुशकिस्मत थीं कि वह देश के उस इलाके में पैदा हुई थीं, जहां समाज के दबे-कुचले वर्गों में अपने अधिकारों के प्रति चेतना सबसे पहले पैदा हुई और तालीम की रोशनी से उसका परिचय भी सबसे पहले हुआ। उनके जन्म से दो साल पहले ही केरल के त्रावणकोर में दलितों ने मंदिर-प्रवेश करके सदियों पुरानी कुरीति को ध्वस्त कर दिया था।

मगर सामाजिक-आर्थिक गैर-बराबरी की पीड़ा का एहसास कृष्णामल को उस वक्त शिद्दत से हुआ, जब गर्भावस्था के आखिरी दिनों में उन्होंने अपनी मां को मेहनत-मशक्कत करते देखा। मां मजदूरी न करतीं, तो घर का चूल्हा भला कैसे जलता? मगर रोज-रोज जीने-मरने की उस जंग ने कृष्णामल के मन में सामाजिक समानता के लिए संघर्ष का जज्बा पैदा कर दिया। तमाम आर्थिक दुश्वारियों के बीच वह पढ़ाई करती रहीं और आगे बढ़ती रहीं। कृष्णामल जब कॉलेज में पहुंचीं, तब तक देश आजादी की लड़ाई के निर्णायक दौर में पहुंच चुका था। स्वतंत्रता संग्राम के नायकों के आह्वान पर छात्र-छात्राएं स्कूल-कॉलेज छोड़कर आंदोलन में शरीक हो रहे थे। कृष्णामल गांधीजी से काफी प्रभावित थीं, वह सर्वोदय आंदोलन से जुड़ गईं। उसी आंदोलन के दौरान उनकी मुलाकात शंकरलिंगम जगन्नाथन से हुई। शंकरलिंगम उनसे करीब 12 साल बड़े थे।

शंकरलिंगम एक धनी परिवार से आते थे, लेकिन गांधीजी के आह्वान पर वह पढ़ाई छोड़कर आजादी के आंदोलन में शामिल हो गए थे। कृष्णामल और शंकरलिंगम ने साथ जिंदगी बिताने का फैसला किया, मगर उनके बीच एक अनूठा करार हुआ कि वे शादी देश की आजादी मिलने के बाद ही करेंगे। शंकरलिंगम को ब्रिटिश हुकूमत का विरोध करने के लिए करीब साढे़ तीन साल जेल में बिताने पड़े थे। देश आजाद हुआ। इसके डेढ़ साल बाद दोनों ने शादी कर ली।

कृष्णामल और शंकरलिंगम ने शादी से पहले ही यह तय कर लिया था कि वे सुदूर ग्रामीण इलाकों के भूमिहीन गरीबों के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित करेंगे। 1950-52 के बीच शंकरलिंगम विनोबा भावे के नेतृत्व में उत्तर भारत में भूदान पदयात्रा के तहत घूम-घूमकर भूपतियों से उनकी जमीन का छठा हिस्सा मांगते रहे, तो इधर कृष्णामल ने मद्रास में टीचर ट्रेनिंग का कोर्स पूरा किया। उत्तर भारत की पदयात्रा से लौटने के बाद दोनों पति-पत्नी ने तमिलनाडु में भूदान आंदोलन शुरू किया। 1953 से 1967 के दौरान इस दंपति ने सत्याग्रह के जरिए भूमि पुनर्वितरण की दिशा में काफी महत्वपूर्ण काम किया। इस आंदोलन और सत्याग्रह के कारण शंकरलिंगम को कई बार जेल भी जाना पड़ा।

सन 1968 में तमिलनाडु के तंजावुर में एक बेहद दर्दनाक घटना घटी, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। वह क्रिसमस की रात थी। दस बज रहे थे। गुरबत ओढ़े गरीबों की बस्ती सोने लगी थी कि सौ की संख्या में बड़े किसानों के गुर्गों ने धावा बोल दिया। वहशत और दरिंदगी में डूबे हमलावरों ने न औरत-मर्द में फर्क किया, न बूढ़े-बच्चों में। देखते-देखते 40 से अधिक दलितों की हत्या हो चुकी थी। कुछ को तो जिंदा जला दिया गया। उनका ‘दुस्साहस’ यह था कि वे बेहतर मजदूरी के लिए आंदोलन कर रहे थे।

कृष्णामल और शंकरलिंगम ने तंजावुर जिले में भूमि सुधार के लिए मुहिम छेड़ी। साल 1981 में इस दंपति ने ‘लैंड फॉर द टिलर्स फ्रीडम’ नामक संगठन की नींव रखी। इसके पीछे उनका मुख्य मकसद था, भूपतियों और भूमिहीनों के बीच संवाद कायम करना और किफायती दर पर भूमिहीनों को जमीन खरीदने में मदद करना। यह अभियान काफी सफल रहा और करीब 13,000 परिवारों को इतनी ही एकड़ भूमि हस्तांतरित कराने में वे सफल रहे। साल 2004 की सुनामी के शिकार बने कई गरीब परिवारों को अपना आशियाना फिर से बनाने के लिए कृष्णामल की संस्था ने मदद मुहैया कराई। जब खेती-किसानी का मौसम नहीं होता, तब उनके नेतृत्व में यह संगठन गरीबों के लिए सिलाई-बुनाई की कार्यशालाएं आयोजित करता है। खासकर दलित लड़कियों के लिए यह कंप्यूटर प्रशिक्षण कक्षाएं आयोजित करता है। कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित कृष्णामल को इस साल पद्म भूषण से नवाजा गया है। 
(प्रस्तुति:  चंद्रकांत सिंह)

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  • Web Title:Hindustan Jeena Isi Ka Naam Hai Column 9th February 2020