फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियन जीना इसी का नाम हैसिर्फ सरकारी नौकरियां बेरोजगारी का हल नहीं

सिर्फ सरकारी नौकरियां बेरोजगारी का हल नहीं

हिन्दुस्तान नौजवानों का देश है। इसकी 65 फीसदी से अधिक आबादी की उम्र 35 साल से कम है। ऐसे में, रोजगार देश का सबसे अहम मुद्दा होना चाहिए और है भी। ‘सेंटर फॉर दी स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज’, यानी...

सिर्फ सरकारी नौकरियां बेरोजगारी का हल नहीं
Pankaj Tomarभावेश चौधरी, किसान और उद्यमीSat, 04 May 2024 09:06 PM
ऐप पर पढ़ें

हिन्दुस्तान नौजवानों का देश है। इसकी 65 फीसदी से अधिक आबादी की उम्र 35 साल से कम है। ऐसे में, रोजगार देश का सबसे अहम मुद्दा होना चाहिए और है भी। ‘सेंटर फॉर दी स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज’, यानी सीएसडीएस ने अपने हालिया सर्वे में इस बात की पुष्टि भी की है। इस समस्या से जुड़ी एक कटु हकीकत यह भी है कि कोई सरकार इतनी विशाल युवा आबादी के लिए सरकारी नौकरियों का सृजन नहीं कर सकती, अलबत्ता उनकी आजीविका के उपाय करने का दायित्व उसी का है। मगर इस समस्या के हल का एक ठोस रास्ता भावेश चौधरी जैसे युवा दिखा रहे हैं, जो न सिर्फ तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद आज एक सफल उद्यमी हैं, बल्कि उन्होंने अपने आसपास के 150 से भी ज्यादा किसानों की जिंदगी पर सकारात्मक असर डाला है।
राजस्थान के झुंझुनू जिले में एक तहसील है सूरजगढ़। इसी के बेरला-आसलवास गांव में आज से करीब 25 साल पहले भावेश पैदा हुए। पिता शेर सिंह चौधरी सीमा सुरक्षा बल में जवान थे और गांव में अपनी खेती-बाड़ी भी थी, इसलिए भावेश का बचपन कभी किसी अभाव में नहीं गुजरा। गांव के तमाम बच्चों की तरह स्थानीय स्कूल में ही पढ़ाई-लिखाई हुई, पर स्कूल में कभी उनका दिल नहीं लगा। चार भाई-बहनों में दूसरे भावेश यही देखते हुए सयाने हुए कि उनके गांव के लड़कों, बल्कि अब तो लड़कियों का भी एक ही लक्ष्य होता है, फौज या पुलिस में कोई सरकारी नौकरी हासिल करना।
पिता शेर सिंह कभी-कभी बेटे को अपनी पोस्टिंग वाली जगहों पर ले जाया करते थे, जहां उनको तरह-तरह के आदेशों का पालन करते देख या काफी तनाव में भी ‘ड्यूटी’ निभाते देखकर भावेश का बालक मन नौकरी से विरक्त होता गया। हालांकि, परिवार और खुद पिता की यही अपेक्षा थी कि वह गांव के अन्य बच्चों की तरह फौज या पुलिस में अपना करियर बनाएं। मगर भावेश ने कोई लक्ष्य ही नहीं बनाया। वह बस कक्षाएं पास करते और बढ़ते चले आए। बारहवीं का इम्तिहान पास करने के बाद पहली बार लक्ष्य संबंधी सवाल ने उन्हें परेशान किया कि अब क्या? जाहिर है, जब शहरी इलाकों में ही किशोरों की अभिरुचि जांचने-परखने और उन्हें उनकी पसंद के क्षेत्र में दक्ष बनाने के प्रयास आधे-अधूरे हैं, तो बेरला-आसलवास के युवाओं की सुध कौन लेता?
आगे पढ़ने की बहुत इच्छा नहीं थी, पर परिवार के दबाव में उन्होंने बीएससी में दाखिला ले लिया। पढ़ाई करते हुए सरकारी नौकरियों की कई परीक्षाएं दीं, मगर किसी में कामयाबी हाथ नहीं आई। इस दौरान उनके कई दोस्त सरकारी मुलाजिम बन चुके थे। परिजनों व पड़ोसियों के व्यंग्य का सिलसिला शुरू हो गया था। मगर भावेश के दिमाग में यह साफ हो चुका था कि दूसरों के हुक्म मानने वाली नौकरी उनको करनी नहीं है, और आदेश देने वाली कोई नौकरी उनको मिलने से रही! लिहाजा, उन्होंने कॉलेज के सेकेंड ईयर में पढ़ाई छोड़ परिवार में एलान कर दिया कि वह अपना कोई काम करेंगे।
परिचितों ने मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। पिता तो खैर नाराज थे ही। भावेश को अब अक्सर सुनना पड़ता- यह किसी काम का नहीं है... इसे जायदाद से बेदखल कर दो, वरना घर-जमीन, सब बेच देगा... ऐसे निठल्ले को कौन अपनी बेटी देगा? हरियाणा-राजस्थान के इस इलाके की एक निर्मम सच्चाई यही है कि जिन युवाओं के पास सरकारी या मोटी पगार वाली निजी नौकरी नहीं या जिनके पास जमा-जमाया कारोबार नहीं, उनकी शादी नहीं होती। 
पिता के दबाव के आगे घुटने टेकते हुए भावेश ने पड़ोस के शहर लोहारू के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला तो ले लिया, मगर उनके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ रहा था, क्योंकि वहां अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई होती थी और भावेश की अब तक की पूरी पढ़ाई हिंदी माध्यम से हुई थी। एक महीने में ही उन्होंने इंजीनियरिंग कॉलेज को भी छोड़ दिया। सवाल था, अब क्या किया जाए? जो कुछ भी करना था, अपने तईं करना था। भावेश को याद आया कि जब वह हॉस्टल में रहते थे, तब उनके शहरी सहपाठी व कॉलेज शिक्षक उनसे मां के हाथों बना देसी घी लाने की बहुत फरमाइश किया करते और जब वह घी लेकर जाते, तो वे सभी स्थानीय भाव के अनुसार उन्हें भुगतान भी करते थे। भावेश ने देसी घी का अपना उद्यम शुरू करने का फैसला किया। साल 2019 की बात है। अपने दो-तीन दोस्तों से उन्होंने कर्ज के तौर पर 30,000 रुपये जुटाए और उस रकम से एक वेबसाइट बनवाई, मगर इस पर किस तरह से मार्केटिंग करनी है, यह तो उन्हें आता ही नहीं था! उनका सारा निवेश बेकार चला गया।
भावेश को थोड़ी निराशा हुई, पर उन्होंने हार नहीं मानी। यू-ट्यूब पर देशी घी खाने के फायदे के बारे में वीडियो देखे। उनमें नीचे टिप्पणी करने वालों से उन्होंने संवाद करना शुरू किया और फिर ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए मां से मिले 3,000 रुपये से नई शुरुआत की। सितंबर 2019 में वह मुबारक दिन आया, जब बिहार के भागलपुर से उन्हें पहला ऑर्डर मिला। 1,125 रुपये का वह भुगतान भावेश जीवन भर नहीं भूल सकेंगे। काम बढ़ा, कमाई बढ़ी, तो अपनों का भरोसा भी बहाल हुआ। फिर पिता के सहयोग से गायों की तादाद भी बढ़ी, गौशाला का भी विस्तार हुआ। फिर उन्होंने आस-पड़ोस के छोटे-छोटे 150 देसी गाय पालकों व दुग्ध उत्पादकों को जोड़ा। 
भावेश आज सालाना करीब आठ करोड़ रुपये का देसी घी का कारोबार कर रहे हैं। अपनी सरकारी मुलाजिम दोनों बहनों को वह मजाक में छेड़ते हैं- सरकार तुमको जितनी तनख्वाहें देती है, उससे ज्यादा तो हम उसे जीएसटी चुकाते हैं! बकौल भावेश, बेरोजगारी का हल सिर्फ सरकारी नौकरी नहीं, यह बात परिवारों को भी समझने की जरूरत है।  
प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह