फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियन जीना इसी का नाम हैदुख अगर सबको मांजता है, तो इस डॉक्टर सा मांजे

दुख अगर सबको मांजता है, तो इस डॉक्टर सा मांजे

जीवन में एक मोड़ ऐसा भी आया, जब सारी कोशिशों के बावजूद चीजें मुश्किल होने लगीं और बात उनकी झोंपड़ी से निकलकर गांव के चबूतरे पर आ गई। तब गांव के कुछ समर्थ लोगों ने बड़प्पन दिखाया और वजीफे के तौर पर...

दुख अगर सबको मांजता है, तो इस डॉक्टर सा मांजे
pradeep sethi
Pankaj Tomarप्रदीप सेठी, चिकित्सकSun, 28 Apr 2024 12:46 AM
ऐप पर पढ़ें

आजादी के साढे़ सात दशक में हिन्दुस्तान ने कितनी तरक्की की है, इसे देखना है, तो गांवों में जाइए और किसी स्मृति-समृद्ध बुजुर्ग के पास बैठिए, तब आपको सन् 1947 से 2024 तक का देश का सफर साफ-साफ दिखाई पड़ेगा। हिन्दुस्तान महानगरों और शहरों में ही नहीं, अपने साढे़ छह लाख से अधिक गांवों में भी खूब आबाद हुआ है। मगर इन गांवों की एक टीस पुरानी है। महानगरों और बड़े शहरों ने उनकी अनगिनत संतानों को अपने मोहपाश में यूं फांसा कि वे अपनी माटी का कर्ज उतारना भी भूल गईं। मगर प्रदीप सेठी ने जिस तरह से अपनी माटी का कर्ज अदा किया है, उनका गांव पुश्त-दर-पुश्त इसके लिए उन पर नाज करेगा!
ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से लगभग 150 किलोमीटर दूर एक गांव है बेरुनपदी। करीब 44 साल पहले इसी गांव के एक बेहद गरीब परिवार में प्रदीप पैदा हुए थे। तब ओडिशा देश के अति-पिछडे़ राज्यों में शामिल था। जाहिर है, बेरुनपदी भी सड़क-बिजली-अस्पताल-साफ पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर था। प्रदीप के परिवार की माली हालत ऐसी थी कि कई बार उन्हें फाकाकशी से गुजरना पड़ा। एक जोडे़ कपड़े में कई-कई हफ्ते निकालने पड़ते। मगर यह नियति अकेले उन्हीं के परिवार की नहीं थी। ऐसे में, सभी अभावग्रस्त परिवार एक-दूसरे को सब्र और उम्मीद की डोर थमाते रहते। राहत की बात बस इतनी थी कि 1955 से गांव में बच्चों के लिए एक स्कूल की सुविधा थी और प्रदीप के पिता ने घनघोर गरीबी के बावजूद बेटे को कभी पढ़ने-लिखने से नहीं रोका। अलबत्ता, उन्हें कई बार स्कूल से छुट्टी करनी पड़ती, क्योंकि मजदूर पिता कभी गाय चराने, तो कभी खेतों से घास छील लाने की जिम्मेदारी सौंप जाते थे। इन सब व्यवधानों के बावजूद प्रदीप की पढ़ने में रुचि गहराती गई थी। 

करीब बारह साल की उम्र में वह जिस सरकारी स्कूल में पढ़ने गए, वह अंग्रेजी-हिंदी माध्यम का स्कूल था। इससे पहले तो वह सिर्फ उड़िया सुनते-बोलते आए थे। पहली बार यहां उनका हिंदी और अंग्रेजी से परिचय हुआ। शुरू-शुरू में वह कुछ हिचके, थोड़े झेंपे; लेकिन सीखने और आगे बढ़ने की चाह ने उनका रास्ता आसान कर दिया। बहुत जल्द ही शिक्षकों की नजरों में प्रदीप की मेधा आ गई। उन्होंने उन्हें भरपूर प्रोत्साहन दिया। फिर क्या था, छात्र की लगन और शिक्षकों के सहयोग ने एक गरीब बच्चे के दिन बदल दिए। 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं में प्रदीप बहुत अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण हुए।
दसवीं के बाद से ही उनके मन में डॉक्टर बनने की इच्छा पलने लगी थी, मगर मेडिकल की पढ़ाई का खर्च उठाना उनके परिवार के लिए आसान न था। प्रदीप ने अपनी पढ़ाई-लिखाई से पिता को गौरव के कई पल दिए थे। इसलिए जो भी थोड़ी सी जमीन उनके पास थी, बेटे की मेडिकल फीस जुटाने के लिए उन्होंने उसे दांव पर लगा दिया। परिवार के इस त्याग से प्रदीप मर्माहत तो थे, पर अपने भविष्य को लेकर वह आशान्वित भी कम न थे। वह परिवार की तकलीफ और संघर्ष में बराबर शरीक रहे। उनके पास जो भी खाली वक्त होता, वह उसमें किसी न किसी किस्म की दैनिक मजदूरी करते।

एक ऐसा मोड़ भी आया, जब सारी कोशिशों के बावजूद चीजें मुश्किल होने लगीं और बात उनकी झोंपड़ी से निकलकर गांव के चबूतरे पर आ गई। तब गांव के कुछ समर्थ लोगों ने बड़प्पन दिखाया और वजीफे के तौर पर उन्होंने प्रदीप की लगातार मदद की। प्रदीप को हर महीने एक तय राशि मिलने लगी थी, जिनसे वह अपनी किताबें खरीदते और हॉस्टल मेस की फीस चुकाते। अब लक्ष्य सिर्फ एमबीबीएस की डिग्री थी। वह जी-जान से जुट गए। साल 2004 में एमबीबीएस की डिग्री लेने के बाद उन्हें मास्टर्स कोर्स के लिए देश के प्रतिष्ठित ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान’ में दाखिला मिल गया, जहां से उन्होंने ‘हेयर ट्रांसप्लांट सर्जरी’ के गुर सीखे। जाहिर है, यह ऐसा चिकित्सा क्षेत्र है, जो अकादमिक शोध या अपने सौंदर्य को लेकर सजग दौलतमंदों से ज्यादा जुड़ा है। लिहाजा, प्रदीप के पास प्रस्तावों और मरीजों की कोई कमी नहीं रही। पैसे तो खैर आने ही थे। उनके पास दुबई में क्लिनिक खोलने तक का बेहद रोचक प्रस्ताव आया, मगर उसी समय उन्हें आध्यात्मिक गुरु परमहंस योगानंद जी की यह पंक्ति याद आ गई- ‘हर मनुष्य के जीवन का एक बड़ा मकसद होता है।’
नौजवान प्रदीप के जीवन का मकसद सिर्फ दौलत कमाना नहीं था। वह अपनी जड़ों की ओर मुडे़। कैंसरग्रस्त पिता की दिली तमन्ना थी कि गांव में उनका एक घर होना चाहिए। प्रदीप ने घर की तामीर कराई, मगर उसके बनने के चंद महीनों बाद ही वह इस दुनिया से कूच कर गए। उनके जाने के बाद प्रदीप ने साल 2016 में उस घर को एक कोचिंग सेंटर में तब्दील कर दिया, ताकि गांव व आस-पास के बच्चे वहां आकर गणित और अंग्रेजी सीख सकें। इसके लिए बाकायदा प्रशिक्षित शिक्षक रखे गए थे।

सैकड़ों बच्चों की जिंदगी में इस एक कोचिंग सेंटर से आई तब्दीली देख डॉ. प्रदीप को गहरा सुकून मिला। अब उन्होंने गांव में एक ऐसा स्कूल खोलने का फैसला किया, जो गरीब बच्चों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा नि:श्ुाल्क दे सके। उन्होंने गांव की उसी जमीन पर स्कूल बनाने की शुरुआत की, जहां कभी दैनिक मजदूरी की थी। गांव वालों ने अपने सपूत का बढ़-चढ़कर साथ दिया। कई लोगों ने स्कूल के लिए अपनी-अपनी जमीनें दान में दीं। करीब दस एकड़ में पिछले साल अप्रैल में उत्कल गौरव इंटरनेशनल स्कूल वजूद में आ गया। फिलहाल इसमें 450 बच्चे पढ़ रहे हैं, मगर इसकी क्षमता 2,500 बच्चों को 12वीं तक उच्च-स्तरीय शिक्षा देने की है।
डॉ प्रदीप सेठी आगे अन्य इलाकों में भी स्कूल खोलेंगे, मगर बेरुनपदी का कर्ज उन्होंने अदा कर दिया!
प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह