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बदनसीब बच्चों की तकदीर संवारती धाय मां

हाजरा को ठीक-ठीक नहीं पता कि उनका जन्म किस जगह, किस तारीख को और किस दिन हुआ था। जो उन्हें यह सब बता सकती थी, वह उनके होश संभालने के पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह गई, और पिता? जो शख्स अपने बच्चों का पेट नहीं भर सकता था, उसमें उनके जन्मदिन को याद रखने का शऊर क्या होता?

तब उनकी उम्र आठ वर्ष रही होगी। सौतेली मां की गालियों और पिटाई ने हाजरा को इस कदर दुखी किया कि वह घर से भाग निकलीं। कुछ पता नहीं, किसके पास और कहां जाना है, वह एक बस में सवार हो गईं। सुबह जब आंखें खुलीं, तो वह ढाका के बेहद व्यस्त इलाके गुलिस्तान में फुटपाथ पर थीं। उन्हें क्या पता था कि जिस जहन्नुम से भागकर वह यहां आई हैं, उससे कहीं ज्यादा जालिम  दुनिया उनका इंतजार कर रही है। भूखी-प्यासी हाजरा को कुछ नहीं सूझ रहा था। चंद लम्हों में अपने आस-पास उन्हें कई हमउम्र लावारिस बच्चे मिल गए। दर्द साझा था। उनके साथ ही हाजरा भी अखबार बेचने लगीं। अब वह एक बिल्कुल नई दुनिया में थीं।

फिर वह दिन आया, जब एक अजनबी अपनी कार में अगवा कर उन्हें अपने दोस्त के घर नारायणगंज ले गया, ताकि वह उसके यहां घरेलू नौकरानी का काम कर सकें। इतनी छोटी उम्र में घर का कामकाज उनसे क्या होता, वह वहां से भाग निकलीं। कुछ दिनों बाद उन्हेें एक सरकारी पुनरोद्धार टीम ने पकड़ लिया। उन्हें एक पुनर्वास केंद्र भेज दिया गया। कुछ दिनों के बाद उसी केंद्र के एक अफसर के घर घरेलू नौकरानी का काम करने के लिए उन्हें भेजा गया। उस अफसर के घर वाले बात-बात पर हाजरा को पीटते। एक दिन मौका देख वह वहां से भी निकल भागीं।

राजधानी ढाका के एक चकलाघर में हाजरा को जब बेचा गया, तब उनकी उम्र महज 11 साल थी। वह कहती हैं, ‘मैं इस धंधे से हर सूरत आजाद होना चाहती थी। मैंने कई बार पुलिस वालों से गुहार भी लगाई कि मुझे मुक्ति दिला दें, मगर नतीजे में सिर्फ पिटाई मिली। मेरे पास और कोई चारा न था।’ हाजरा एक दिन वहां से भी भाग निकलीं, ताकि कोई इज्जत का काम कर सकें। पर उन्हें कहीं कोई ऐसा काम नहीं मिला। मजबूरन फिर जिस्मफरोशी के धंधे में उतरना पड़ा। कुछ दिनों तक तो वह सड़क से ही यह सब कुछ करती रहीं, पर बाद में वहां की सबसे बड़ी वेश्या मंडी ‘तनबाजार’ चली गईं।

करीब तीन साल तक हाजरा तनबाजार में ही रहीं। इसी बीच उनकी मुलाकात एक गैर-सरकारी संगठन के लोगों से हुई। इन लोगों ने हाजरा को अक्षर-ज्ञान कराया। फिर उन्होंने दस्तकारी के काम सीखे और एक कपड़े की फैक्टरी में उन्हें नौकरी भी मिल गई। पगार कम थी, पर हाजरा उसमें भी बहुत खुश थीं, क्योंकि उन्हें एक ऐसी जिंदगी नसीब हुई थी, जिसकी उम्मीद भी उन्होंने छोड़ दी थी। मगर तकदीर ने फिर पलटी मारी। वह जिस सरकारी पुनर्वास केंद्र में रह रही थीं, उनके अधिकारियों को यह बात पता चल गई कि हाजरा एक स्थाई नौकरी कर रही हैं। अत: नियम के मुताबिक उन्होंने उन्हें केंद्र से बाहर कर दिया। वह फिर दरबदर हो गईं।

हाजरा ने अपनी जिंदगी से शिकायत पालने की बजाय अब उसे बदलने का फैसला किया। चंद रुपये की ही सही, नौकरी ने उनके हौसले को एक उड़ान दे दी थी। वेश्याओं के बीच काम करने वाले संगठन ‘दुर्जय नारी संघ’ से हाजरा पहले से ही जुड़ चुकी थीं। वह उसके ही एक प्रोजेक्ट के तहत वेश्याओं के बच्चों की देखभाल करने लगीं। कुछ बाहरी लोगों की माली मदद से यह प्रोजेक्ट चल रहा था, और वित्तीय संकट के कारण एक दिन वह सेंटर बंद हो गया। पर हाजरा यह इरादा बांध चुकी थीं कि ऐसे बच्चों को इस नारकीय दलदल में नहीं फंसने देंगी। उन्होंने इनके लिए एक शेल्टर होम खोलने का फैसला किया। 

जून 2010 की बात है। हाजरा को शेल्टर खोलने के लिए हर तरह की मदद की दरकार थी। उन्होंने दुजर्य नारी संघ के अलावा जहांगीरनगर के छात्र स्वयंसेवकों से बात की। हाजरा ने अपनी पूरी जमा-पूंजी, जो तकरीबन नौ लाख टका थी, लगाकर ‘शिशुदेर जोन्नो आमरा’ नाम से एक शेल्टर होम की शुरुआत की। शुरू में कुछ प्रशासनिक परेशानियां पैदा की गईं, मगर अंतत: वह इसे समाज कल्याण विभाग से पंजीकृत कराने में कामयाब हो गईं। इस वक्त इसमें चार से 16 साल के 40 से अधिक बच्चे पल रहे हैं।

स्कूल मेें इन बच्चों का दाखिला कराने में भी काफी दिक्कतें आईं, क्योंकि इसके लिए बांग्लादेश में पिता का नाम जरूरी है। पर हाजरा के कदमों से प्रभावित विश्वविद्यालय के छात्रों ने इन बच्चों को बतौर पिता अपना नाम दिया। हाजरा ने खुद कभी किसी बच्चे को जन्म नहीं दिया, ताकि उनकी ममता में कोई फर्क न आए। करीब 50 साल की जिंदगी में हाजरा ने खुद ही इतना पढ़ना-लिखना सीखा कि आज वह बांग्ला और अंग्रेजी पढ़ सकती हैं। शरद चंद्र व टैगोर को पढ़ना उन्हें बेहद पसंद है। इसी साल मार्च में हाजरा बेगम को बांग्लादेश के प्रतिष्ठित सम्मान ‘नेशन बिल्डर्स अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया है। अब वह 40 बच्चों की मां हैं।
प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह

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