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Hindi News ओपिनियन जीना इसी का नाम हैआसानी से कहां मिलती यह शोहरत और बुलंदी

आसानी से कहां मिलती यह शोहरत और बुलंदी

एक बेहतर लोकतंत्र, तरक्कीपसंद समाज और परिपक्व परिवार को परखने की बुनियादी कसौटी क्या है? यह कसौटी है, उसके हरेक सदस्य को सभ्यता के दायरे में कटु से कटु बात भी कहने की आजादी! मगर दुर्योग से कमजोर...

आसानी से कहां मिलती  यह शोहरत और बुलंदी
Amitesh Pandeyवीर दास, अभिनेता, हास्य कलाकारSat, 25 Nov 2023 10:54 PM
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एक बेहतर लोकतंत्र, तरक्कीपसंद समाज और परिपक्व परिवार को परखने की बुनियादी कसौटी क्या है? यह कसौटी है, उसके हरेक सदस्य को सभ्यता के दायरे में कटु से कटु बात भी कहने की आजादी! मगर दुर्योग से कमजोर समाजों में इस पर हर समय खतरा मंडराता रहता है और इसके लिए हरेक दौर में आपको लड़ना पड़ता है। याद कीजिए, किस दशक में रघुवीर सहाय ने लिखा था- कुछ होगा, कुछ होगा अगर मैं बोलूंगा/ न टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता का मेरे अंदर एक कायर टूटेगा...। यह साहस हरेक युग को चाहिए। एक ऐसे ही साहसी कलाकार हैं वीर दास, जिन्हें हाल में प्रतिष्ठित एमी अवॉर्ड से नवाजा गया है।
साल 1979 की वह 31 मई थी, जिस दिन वीर ने इस दुनिया में पहली बार आंखें खोलीं। कुदरत ने उनके लिए देहरादून शहर और रानू व मधुर दास का आंगन चुना था। वीर से पहले उनकी जिंदगी में बेटी तृषा आ चुकी थी। संपन्न परिवार था। रानू दास एक बड़े पॉल्ट्री फार्म में मैनेजर थे और मां देहरादून में शिक्षिका थीं। ददिहाल और ननिहाल में तो सरकारी मुलाजिमों की लंबी-चौड़ी फौज थी। ऐसे में, पिता को जब लागोस (नाइजीरिया) की एक खाद्य एवं प्रसंस्करण कंपनी से नौकरी का प्रस्ताव मिला, तो वह इस रोमांचक मौके का मोह त्याग न सके और पूरे परिवार के साथ नाइजीरिया चले गए। वीर तब बमुश्किल एक साल के थे। 
वीर दास का बचपन नाइजीरिया में ही बीता। जब स्कूल जाने की उम्र हुई, तो लागोस स्थित ‘इंडियन लैंग्वेज स्कूल’ में दाखिला करा दिया गया। मगर मां चूंकि खुद एक शिक्षिका रह चुकी थीं, वहां की शिक्षा को लेकर वह बहुत मुत्मइन नहीं हो सकीं। लिहाजा, अभिभावकों ने फैसला किया कि वीर को अपने देश के ही किसी बोर्डिंग स्कूल में भेजा जाए। वीर तब नौ साल के थे। वह लॉरेंस स्कूल, सनावर (हिमाचल) आ गए। वीर का पढ़ाई में बहुत मन नहीं लगता था, अलबत्ता दूसरी सांस्कृतिक गतिविधियों में वह बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। ऐसे कार्यक्रमों में उनके चुटकुले लोगों की स्मृतियों में उन्हें हमेशा के लिए छोड़ जाते। वीर को यह आकर्षण बहुत लुभाता था। नाटक, वाद-विवाद प्रतियोगिता, खेल-कूद ने स्कूल में उनकी दिलचस्पी बनाए रखी। लॉरेंस स्कूल के बाद वह दिल्ली के डीपीएस आ गए। 
उन दिनों छुट्टियों में वह जब भी लागोस जाते, तो दोनों मुल्कों की फिजां का फर्क गहराई से महसूस करते। लागोस में भारतीय समुदाय के बडे़ ओहदेदारों और संपन्न लोगों की ठीक-ठाक संख्या थी, मगर वहां के राजनीतिक हालात दिन-ब-दिन खराब होते जा रहे थे। इसलिए भारतीयों को अमूमन घर के भीतर ही रहना पड़ता था। सोसायटी के बाहर गेट पर संगीनधारी गार्ड दिन-रात चौकस रहते थे। ऐसे में, वीर के वे दिन वीडियो लाइब्रेरी खंगालते और फिल्में देखते हुए बीतते।
सन् 1995 में वीर के माता-पिता ने भी भारत लौटने का फैसला किया, क्योंकि लागोस में स्थितियां खतरनाक मोड़ ले चुकी थीं। नाइजीरिया की आर्थिक स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही थी। दास परिवार ने दिल्ली में ही रहने का फैसला किया। इधर वीर की भी स्कूली पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और दिल्ली के श्री वेंकटेश्वर कॉलेज ने खेल कोटे से ग्रेजुएशन कोर्स के लिए उनका आवेदन मंजूर कर लिया था। उन्होंने दाखिला ले लिया, मगर स्कूल से ही वह अमेरिका में पढ़ने के सपने देखा करते थे। लिहाजा, मौका मिलते ही वह इलिनोयस (अमेरिका) चले गए, जहां नॉक्स कॉलेज में अर्थशास्त्र व थिएटर पाठ्यक्रम में उन्हें नामांकन मिल गया।
दाखिला तो मिल गया था, मगर फीस बहुत ज्यादा थी। वीर ने पिता से कहा था कि वह स्कॉलरशिप और दूसरे उपायों से अपनी फीस जुटा लेंगे। स्कॉलरशिप से फीस के बड़े हिस्से का जुगाड़ हो भी गया, फिर भी एक अच्छी-खासी रकम रह रही थी। इसे जुटाने के लिए वीर ने सड़कों पर गिटार बजाना शुरू किया। ऐसे में, उनकी पढ़ाई पिछड़ती चली गई और वह बहुत अच्छे ग्रेड नहीं ले पाए। साल 2002 में ग्रेजुएशन करने के बाद वीर को शिकागो के एक बैंक में नौकरी भी मिल गई, मगर उसमें उनका दिल नहीं लग पा रहा था। दिल ने कहा, एक ही जिंदगी है, क्या-क्या जिया जाए? लिहाजा, थिएटर में किस्मत आजमाने के लिए उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी।
मगर यह आसान फैसला नहीं था। बिना निश्चित आय के अमेरिका में किसी बाहरी की जिंदगी बहुत कठिन होती है। वीर ने सिक्युरिटी गार्ड, इमारतों में पेंट करने, होटलों में बर्तन धोने से लेकर बार में बीयर परोसने तक का काम किया। साथ ही, वह थिएटर और स्टैंडअप कॉमेडी में भी हाथ आजमाते रहे। साल 2003 में वह नई दिल्ली में एक बडे़ मीडिया हाउस में शो करने आए और फिर उसके साथ बतौर वीडियो जॉकी जुड़ गए। वीर ने कई कार्यक्रम किए। कॉरपोरेट वर्ल्ड से जुड़ा उनका देर रात का शो खासा चर्चा में रहा। 
साल 2007 में उन्होंने वीजे की नौकरी छोड़ स्टैंडअप कॉमेडी पर अपना ध्यान केंद्रित किया। अंगे्रजी जुबान पर शानदार पकड़, बेजोर हाजिर-जवाबी और बिंदास अंदाज के कारण कॉरपोरेट जगत ने इस विधा के साथ वीर को हाथोंहाथ लिया। शोहरत और दौलत के साथ अब बॉलीवुड का दरवाजा भी उनके लिए खुल गया। वीर ने नमस्ते लंदन, बदमाश कंपनी, डेल्ही बेली, गो गोवा गॉन, लव, 31 अक्तूबर  जैसी कई फिल्मों में काम किया है। 
स्टैंडअप कॉमेडी करते हुए दो साल पहले पढ़ी गई एक कविता के लिए उन्हें सोशल मीडिया पर ‘आतंकवादी’ तक कहा गया, हालांकि, वह एक विडंबना को अभिव्यक्ति दे रहे थे। शुक्र है, उनके भीतर कोई कायर नहीं बैठा था। उनकी ओटीटी फिल्म वीर दास लैंडिंग को मिला एमी सम्मान इसकी मुनादी कर रहा है- सच कहने से मत डरिए; तिलिस्म टूटता है। 
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह 

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