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हिंदी न्यूज़ ओपिनियन जीना इसी का नाम हैमुलाजिम से मालिक बनने की कश्मीरी दास्तां

मुलाजिम से मालिक बनने की कश्मीरी दास्तां

उनके बहकने के सारे हालात वहां मौजूद थे। गुरबत थी, बेकारी थी, पड़ोसी मुल्क के गुमराह करने वाले एजेंट थे, मजहबी बातों की गलत तर्जुमानी करने वाले मौलवी थे, और बहुत आसानी से पैसे कमाने के लिए...

मुलाजिम से मालिक बनने की कश्मीरी दास्तां
Manish Mishraशेख आसिफ युवा उद्यमीSat, 23 Oct 2021 11:13 PM
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उनके बहकने के सारे हालात वहां मौजूद थे। गुरबत थी, बेकारी थी, पड़ोसी मुल्क के गुमराह करने वाले एजेंट थे, मजहबी बातों की गलत तर्जुमानी करने वाले मौलवी थे, और बहुत आसानी से पैसे कमाने के लिए ‘पत्थरबाज’ बनाने वाला रास्ता भी, पर शेख आसिफ ने अपने  मुल्क और ईमान से वफा करने का रास्ता चुना। कश्मीर घाटी के बाटमालू में 29 अगस्त, 1993 को एक कांस्टेबल के घर में आसिफ पैदा हुए। पिता की तनख्वाह ही परिवार के गुजर-बसर का इकलौता आधार थी। किसी तरह महीने निकलते थे। लेकिन वालिद जानते थे कि बेहतर तालीम के बगैर बेटे का भविष्य संवर नहीं पाएगा, इसलिए अपनी जरूरतों से समझौता करके उन्होंने आसिफ का दाखिला श्रीनगर के एक अच्छे स्कूल में कराया। 
आसिफ शुरू से एक जहीन विद्यार्थी रहे। छोटी उम्र में ही कंप्यूटर के प्रति उनमें जबर्दस्त आकर्षण पैदा हो गया था। एक दिन टीवी पर बिल गेट्स का इंटरव्यू आ रहा था। इस इंटरव्यू के दौरान बिल अपने विभिन्न उत्पादों की खूबियां बता रहे थे, इसी बीच उनके दफ्तर के फुटेज भी दिखाए गए। उस इंटरव्यू ने आसिफ को गहरे प्रभावित किया। हर लम्हा बस कंप्यूटर की बातें दिमाग में घूमती रहतीं।

बालमन में कंप्यूटर की जिद पलने लगी थी। अब वह क्या जानता था कि परिवार की माली हालत इसकी इजाजत नहीं देती। उन्हीं दिनों आसिफ को कोई वैक्सीन लगने वाली थी, उन्होंने हठ पकड़ लिया कि पहले कंप्यूटर दिलाओ, फिर टीके लगवाऊंगा। आखिरकार अम्मी ने कैलकुलेटर देकर बहलाया कि बच्चों को शुरू-शुरू में इसी ‘छोटे कंप्यूटर’ पर पै्रक्टिस करनी पड़ती है, फिर उन्हें बड़ा कंप्यूटर चलाने दिया जाता है। लेकिन आसिफ के मन में तो कंप्यूटर अटक चुका था। वह स्कूल में दूसरी कक्षाओं केकंप्यूटर प्रैक्टिकल में जाते थे। इस तरह, उससे लगाव गहराता गया। मगर जब वह आठवीं जमात में थे, उनके पिता बुरी तरह बीमार पड़ गए। थोड़ी-बहुत जो भी जमा-पूंजी थी, वह इलाज व रोजमर्रा की जरूरतों में खर्च होती गई। घर चलाना दुश्वार होने लगा था। फिर वह दिन भी आया, जब आसिफ की कलम-कॉपी के लिए अम्मी को घर के तांबे के बर्तन बेचने पड़े। 
किशोर मन को यह जानकर गहरा आघात लगा। मजबूरी में स्कूल छोड़ना पड़ा। और कोई विकल्प नहीं था। उस समय आसिफ महज 16 साल के थे। वह काम तलाशने लगे। आखिरकार टूरिज्म से जुड़े एक स्थानीय संस्थान में डाटा एंट्री ऑपरेटर की नौकरी मिली। आसिफ के लिए खुशी की बात यह थी कि उन्हें कंप्यूटर पर काम करना था। घाटी में कंप्यूटर की आमद तो पहले ही हो चुकी थी, मगर निर्बाध इंटरनेट कनेक्टिविटी की सुविधा नहीं थी। आतंकी गतिविधियों के मद्देनजर वहां कई तरह की पाबंदियां आयद थीं, उनमें इंटरनेट पर रोक भी शामिल थी। दहशतगर्दी का खामियाजा आम शहरियों को किस कदर भुगतना पड़ता है, इसका अंदाज सिर्फ इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि जब पूरा देश 4जी की सेवाओं का लाभ उठा रहा था, तब घाटी में 2जी सेवाएं ही उपलब्ध थीं।
आसिफ की तनख्वाह 1,500 रुपये तय हुई। किसी सूरत घर की कुछ मदद हो, यह ख्याल उन्हें हमेशा परेशान करने लगा था। जाहिर है, स्कूल छूट चुका था, तो उसके साथ अच्छी नौकरी की संभावनाएं भी खत्म हो गई थीं। बस एक ही रास्ता था- अपना कारोबार। उसके लिए पूंजी की दरकार थी। आसिफ ने कई तरह के काम किए। मेडिकल उपकरण बेचने से लेकर एयरटेल, वोडाफोन, एयरसेल में नौकरी करने तक वह खूब मेहनत करते रहे। इस क्रम में कंप्यूटर से जुड़ी तमाम संभावनाओं में खुद को मांजते भी रहे। 
साल 2014 में आसिफ ने सब कुछ छोड़कर अपना काम शुरू किया, लेकिन उसी साल सितंबर में आई भयानक बाढ़ में उनका सब कुछ बह गया। अचानक आई उस बाढ़ ने घाटी में भारी तबाही मचाई थी। आसिफ के घर में भी काफी टूट-फूट मची थी। एक बार फिर वह उसी मोड़ पर पहुंच गए थे, जहां से उन्होंने शुरुआत की थी। लेकिन संघर्षों ने उन्हें अब तक इतना मजबूत कर दिया था कि वह इस नुकसान से हताश नहीं हुए और इसे एक चुनौती के रूप में लिया। जो कुछ बचत थी, उससे उन्होंने घर की मरम्मत कराई और नई संभावनाएं तलाशने साल 2015 में दिल्ली आए। दिल्ली में उन्हें अवसरों का क्षितिज दिखा। उनके हौसले को नई उड़ान मिली और साल 2016 में एक प्रोजेक्ट के तहत आसिफ लंदन पहुंच गए। वहां पहला काम एक वेबसाइट डिजाइन करने का मिला। शर्त यह थी कि भुगतान उसी स्थिति में होगा, जब काम पसंद आएगा। जाहिर है, आसिफ कामयाब हुए। अगले काम के लिए तो उन्हें सात लाख रुपये का मेहनताना मिला। एक गैराज के डिजाइन का काम था।
आसिफ की गाड़ी चल निकली। उसी साल उन्होंने ‘टेम्स इन्फोटेक’ नाम से अपनी वेब डिजाइन कंपनी शुरू की। ब्रिटेन और श्रीनगर में इसके दो दफ्तर हैं, जिनमें दर्जनों लोग काम करते हैं। महामारी से पहले इनकी कंपनी का सालाना टर्नओवर ढाई करोड़ रुपये था। आसिफ ने 900 छात्रों और 40 कारोबारियों को मुफ्त में डिजिटल साक्षर बनाया है। ऐसे कश्मीरी नौजवान ही कश्मीरियत के मस्तूल हैं।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह

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