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अबोध कदमों से मीलों की दूरी तक

आज वह 25 की हैं, तब महज पांच साल की थीं। उन्हें अपने परिवार के साथ देश छोड़ना पड़ा था। इतनी नन्ही उम्र में इस बात का इल्म भी उनको क्या होता कि ऐसा क्यों हो रहा है? वह भला क्या समझ पातीं कि हर चंद दिनों में पड़ोस से रोने-चीखने की जो आवाजें आती हैं, और फिर अचानक पूरे मुहल्ले में जो सन्नाटा पसर आता है, उसके पीछे की कहानी क्या है? गायब होते मर्दों और लुटी अस्मत वाली औरतों की बढ़ती संख्या ने इलाके के लोगों को बेचैन कर दिया था। मगर वे सब आक्रामक और ताकतवर फौज के आगे बेबस थे। वे बस इसी फिराक में रहते कि किसी तरह यहां से निकल भागा जाए।

शरीफा शकीरा के पिता ने भी यही रास्ता अपनाया और वह भागकर मलेशिया की राजधानी क्वालालंपुर पहुंच गए थे। उनको गए तीन साल बीत गए। म्यांमार के रखाईन सूबे में, जहां शरीफा पैदा हुईं, फौजी जुल्म बढ़ता ही जा रहा था। अंतत: शरीफा की मां ने भी बच्चों के साथ किसी तरह पति के पास पहुंचने का फैसला किया। यह आसान न था, पर कुछ पड़ोसियों और रिश्तेदारों की मदद से वे सब घर से निकल पड़े।

करीब तीन हफ्ते तक वे सभी कभी पैदल, तो कभी नाव के सहारे भागते रहे। म्यांमार और थाइलैंड के जंगलों के रास्ते छिप-छिपाकर वे मंजिल पर तो पहुंच गए, मगर वहां भी जिंदगी नई आजमाइशों के साथ खड़़ी मिली। मलेशिया में शरणार्थियों को कई बुनियादी हक हासिल नहीं हैं। चाहे वे ‘युनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजीज’ से मान्यता प्राप्त शरणार्थी हों या फिर बिना पंजीकृत शरणार्थी, उन्हें मलेशिया के सरकारी स्कूलों में पढ़ने, अस्पतालों में इलाज कराने, यहां तक कि कानूनी तौर पर काम करने का अधिकार हासिल नहीं है।

शरीफा पढ़ना चाहती थीं, मगर स्कूल नहीं जा सकती थीं। उन्हें उन तमाम कठिनाइयों से जूझना पड़ा, जिनसे शरणार्थी बच्चे जूझते हैं। मगर छह भाई-बहनों में सबसे बड़ी शरीफा किसी सूरत पढ़ना-लिखना चाहती थीं। उन्हें कोई रास्ता न सूझा, तो फिर टेलीविजन देख-देखकर ही पढ़ना शुरू कर दिया। जहां कहीं भी कुछ मिलता, वह उसे ही पढ़ डालतीं। मगर इससे किसी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं बंधती थी। मलेशिया में म्यांमार के मुकाबले जिंदगी तो महफूज थी, मगर पेट भरने का संकट यहां भी था। शरीफा कहती हैं, ‘जब कभी हम काम की तलाश में बाहर जाते, हमें बेइज्जत किए जाने का भय सताता रहता। पर परिवार का पेट तो पालना ही था, सो जो भी काम मिलता, हम कर लेते। ज्यादातर रोहिंग्या मर्द दिहाड़ी मजदूरी करते और औरतें साफ-सफाई के काम करती थीं। पर हर बार स्थानीय प्रशासन के लोग रोकते थे। जो लोग उनकी जेब में कुछ नहीं डालते, उन्हें काम करने नहीं दिया जाता। इस कारण कई रोहिंग्या शरणार्थियों को मैंने भिखारी बनते देखा।’

जिंदगी रफ्ता-रफ्ता यूं ही बढ़ती रही। हालात से नाखुश शरीफा को रोहिंग्या मुसलमानों के लिए अम्पांग में आयोजित एक एनजीओ कार्यक्रम में शिरकत करने का मौका मिला। वहां एक रोहिंग्या पुरुष लगातार दो घंटे तक शरीफा को इसलिए डांटता-धमकाता रहा कि आखिर उन्होंने अपने समुदाय की भलाई के लिए पुरुषों और महिलाओं को मिलकर काम करने की सलाह कैसे दे डाली? इस घटना से शरीफा काफी दुखी हुईं, मगर साथ ही उनका यह एहसास और मजबूत हो गया कि इन लोगों को शिक्षित किए जाने की बहुत जरूरत है।

शरीफा अपनी छोटी-सी जिंदगी के तल्ख अनुभवों से जान चुकी थीं कि किसी भी स्थिति में सबसे ज्यादा दर्द और तकलीफें औरतों के हिस्से ही आती हैं। उन्होंने शरणार्थी रोहिंग्या औरतों के सशक्तीकरण का फैसला किया और साल 2016 में ‘रोहिंग्या वुमेन्स डेवलपमेंट नेटवर्क’ (आरडब्ल्यूडीएन) नामक उनका संगठन वजूद में आया। क्वालालंपुर के शरणार्थी शिविरों में शरीफा इस संगठन के साये तले तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित करने लगीं, जिनमें औरतों की सेहत, बाल-विवाह और लैंगिक गैर-बराबरी के मसलों पर चर्चा की जाती थी। देखते-देखते उनके हर कार्यक्रम में सैकड़ों की तादाद में रोहिंग्या औरतें जुटने लगीं। शरीफा उनकी बुझी जिंदगी में उम्मीद की एक रोशनी लेकर आईं, क्योंकि उनका संगठन इन औरतों को यह भी बताता है कि उन्हें कहां नौकरी मिल सकती है या वे कैसे अपना कारोबार शुरू कर सकती हैं। संगठन की वेबसाइट के जरिए शरणार्थी औरतें अपने उत्पाद बेचकर हर महीने हजारों रुपये कमा रही हैं।

शरीफा को मलेशियाई पुलिस ने खूब परेशान किया। वह जब-तब उनके दरवाजे पर आ धमकती थी, इससे परेशान होकर उनके पति और उन्हें एक गेस्ट हाउस में पनाह लेनी पड़ी। दोनों खुद को सुर्खियों से दूर रखते हुए सामुदायिक कल्याण में जुटे रहे। शरीफा ने अब तक हजारों औरतों की जिंदगी बदल दी है। उन्हें हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने ‘इंटरनेशनल वुमन ऑफ करेज’ अवॉर्ड के लिए मनोनीत किया है। वह पहली गैर-मलेशियाई हैं, जिन्हें मलेशिया से इस सम्मान के लिए नामांकित किया गया है।
(प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह)

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  • Web Title:Hindustan Jeena Isi Ka Naam Hai Column 18th August