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सबको साथ लेकर बढ़ने सी खुशी अकेले में कहां?

राजेश के आगे उन आदिवासी स्त्रियों के संयम का उदाहरण था, जो न जाने कितने वर्षों से 100 रुपये कमाने की खातिर 15 किलोमीटर पैदल आती-जाती रहीं। जाहिर है, राजेश का वक्त आया, उन आदिवासी ्त्रिरयों के भी...

सबको साथ लेकर बढ़ने सी खुशी अकेले में कहां?
Pankaj Tomarराजेश ओझा, युवा उद्यमीSat, 14 Oct 2023 10:16 PM
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तकनीक और सूचनाओं के प्रवाह ने एक इंसान के तौर पर हमारा बड़ा नुकसान किया है। इसने हमसे हमारी संवेदनाएं छीन ली है। कभी किसी दुश्मन की मौत पर भी खामोश हो जाने वाला समाज अब जश्न मनाते दिखने लगा है। ऐसे में, जब कोई नौजवान अपनी जिंदगी की कठिनाइयों से लड़ते हुए भी दूसरों के बारे में सोचता है, और हाशिये के लोगों के जीवन में आसानी पैदा करते दिखता है, तो लगता है, कुदरत ने अच्छे लोगों को धरती पर भेजना अभी बंद नहीं किया है। राजेश ओझा एक ऐसे ही नौजवान हैं।
पाली जिले (राजस्थान) के बेड़ा गांव में जन्मे राजेश अत्यंत साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं। स्थानीय स्कूलों में ही उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई और जैसा कि ग्रामीण पृष्ठभूमि के ऐसे किशोरों के साथ होता है, 12वीं की पढ़ाई करते हुए ही उन्हें लगा कि मुझे अब अपने परिवार के लिए कुछ करना चाहिए, राजेश मुंबई की ओर निकल पडे़। मगर बिना किसी डिग्री के कहीं ढंग की नौकरी कहां मिलने वाली थी? राजेश को दफ्तर-दर-दफ्तर निराशा हाथ लगती। कुछ छोटे-मोटे मौके मिले भी, तो जल्द ही उनसे मन उचट गया। कहीं दफ्तर के लोगों के रवैये, तो कहीं भविष्य की आशंकाओं ने मन रमने न दिया। साल-पर-साल निकलते जा रहे थे, और कुछ बेहतर करने की बेचैनी भी गहराने लगी थी। 
नौकरियों से निराश राजेश ने आखिरकार अपना काम शुरू करने का फैसला किया। जमा-पूंजी लगाकर काम शुरू भी किया, मगर मुंबई कोई खास उम्मीद नहीं दे रही थी। हालांकि, महानगरों की एक बड़ी खूबी यह है कि वे आपके सपने साकार भले न करें, तब भी वे आपको खाली हाथ नहीं लौटाते, तजुर्बे की शक्ल में कीमती दौलत आपको सौंपते हैं। राजेश ने गांव लौटने का इरादा कर लिया था। अब सवाल यह था कि वहां करेंगे क्या? मुंबई में एक लंबा अरसा गुजर चुका था, इसलिए गांव-इलाके की तब्दीलियों को लेकर वह बहुत वाकिफ नहीं थे। मगर वह उनके पुरखों की माटी थी, वहीं पर कुछ बनने-मिटने का भाव लिए राजेश बेड़ा लौट आए।
साल 2017 उनकी जिंदगी में एक अहम मोड़ बनकर आया। शादी के बाद उनके जीवन में पूजा की आमद तो हुई ही, राजेश ने ‘जोवाकी एग्रोफूड’ नाम से एक ऐसे काम की शुरुआत की, जो उनके सपनों को साकार करने के साथ-साथ हाशिये पर जी रहे अनेक आदिवासी परिवारों की बेहतरी से प्रेरित था। दरअसल, मुंबई से लौटने के बाद राजेश ने देखा कि उनके इलाके की आदिवासी महिलाएं जंगल से पके जामुन व सीताफल चुनकर लाती हैं और 14-15 किलोमीटर पैदल चलकर उन्हें बेचने जाती हैं, मगर बमुश्किल सौ रुपये कमा पाती हैं। यह उनका शोषण था।
राजेश और पूजा ने दो लाख रुपये की जमापूंजी से ‘जोवाकी एग्रोफूड इंडिया’ नामक कंपनी की नींव रखी, ताकि कारोबार के साथ-साथ इन आदिवासी महिलाओं का आर्थिक शोषण रुक सके। हालांकि, तब तक राजेश का खेती-किसानी से कोई नाता नहीं था, लेकिन  उन्हें इतना पता चल चुका था कि पाली जिले में कृषि संबंधी भरपूर संभावनाएं हैं और अकुशल प्रक्रिया या खरीदार न होने के कारण यहां की काफी उपज बर्बाद हो जाती है। राजेश उदयपुर कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों से मिले, वहां से प्रशिक्षण प्राप्त किया। अब अगला चरण आदिवासी महिलाओं को जोड़ने का था। यह काम आसान न था। आखिर वे कैसे एक अनजान शख्स पर यकीन कर लेतीं? मगर राजेश के साथ पूजा भी उन्हें आश्वस्त करने में जुटीं। आहिस्ता-आहिस्ता आदिवासी ्त्रिरयों और इस दंपति का रिश्ता बन ही गया। करीब एक दर्जन गांवों की महिलाओं का उन्होंने एक समूह बनाया और उन्हें प्रशिक्षित किया कि फलों को कब और कैसे तोड़ना है। कई ्त्रिरयों को सीताफल का पल्प बनाने का प्रशिक्षण दिया गया।
हर कारोबार वक्त मांगता है। शुरू-शुरू में काफी धीमी प्रगति हुई, तो लोग ताने देने लगे कि कहां आ फंसे इस क्षेत्र में, किसी और व्यापार में उतरना था। मगर राजेश ने इस बार धैर्य नहीं खोया, उनके आगे उन आदिवासी ्त्रिरयों के संयम का उदाहरण था, जो न जाने कितने वर्षों से 100 रुपये कमाने की खातिर 15 किलोमीटर पैदल आती-जाती रहीं। जाहिर है, राजेश का वक्त आया, उन आदिवासी ्त्रिरयों के भी दिन बहुरे। इनके उत्पादों की मांग देश-दुनिया तक होने लगी। इलाके के 1,000 से भी अधिक आदिवासी परिवारों में जोवाकी एग्रोफूड की बदौलत खुशहाली आई है। इन परिवारों की ्त्रिरयों की मासिक आय 15,000 रुपये तक पहुंच चुकी है। पिछले छह वर्षों में यह 20 करोड़ से अधिक की कंपनी बन चुकी है और इसकी कमाई का लगभग साठ प्रतिशत आदिवासी ्त्रिरयों पर खर्च होता है।
राजेश की कारोबारी दुनिया का एक आदर्श पहलू न सिर्फ पेड़ लगाना है, बल्कि जो पहले से फल दे रहे हैं, उनका संरक्षण करना भी है। उन्होंने पूरे समुदाय को इसके लिए प्रेरित किया है। अलग-अलग इलाकों में उन्होंने सीताफल और जामुन के हजारों पेड़ पौधे लगाए हैं। तेजी से बदलती कारोबारी दुनिया में नवाचार की कितनी अहमियत है, इससे भी वह बखूबी वाकिफ हैं। इसलिए अब उनकी कंपनी जामुन से उत्पाद तैयार करने लगी है। चूंकि जामुन को डायबिटीज में काफी फायदेमंद माना जाता है, इसलिए उसके पप्प से जूस और गुठलियों के पाउडर की मांग दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।
अक्तूबर 2021 में राजेश ने अपने क्षेत्र के उन किसानों की मदद के इरादे से ‘ट्राइबलवेदा’ नामक कंपनी की शुरुआत की, जो जल्द खराब हो जाने की डर से औने-पौने दाम पर अपनी फसल बेच देते हैं। इस उद्यम के जरिये उन्होंने बेड़ा गांव के किसानों को अच्छे दाम दिलाए हैं। बकौल राजेश, सबको साथ लेकर आगे बढ़ने में जो खुशी है, वह अकेले में कहां! 
प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह