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5 अगस्त, 2020|6:37|IST

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हीरो मत कहिए, मैं बस जीना चाहता था

हादसे सिर्फ सबक नहीं देते, बल्कि अक्सर वे हमें असली नायकों से भी मिलाते हैं। एक ऐसे ही हीरो से अमेरिकी समाज दो साल पहले मिला। उस वक्त यह नौजवान 29 साल का था। प्रेम, जिंदादिली और दिलेरी से भरपूर। अपने शहर नैशविल को टूटकर चाहने वाला। बचपन से उसकी यही आदत रही कि बिखरी हुई चीजों को करीने से सजाया जाए। मगर जिंदगी इस आदत का ऐसा भयानक इम्तिहान लेगी, यह तो उसने सोचा भी नहीं होगा।
यह 22 अप्रैल, 2018 की भोर की बात है। पेशे से इलेक्ट्रिक इंजीनियर जेम्स जूनियर शॉ अपने करीबी दोस्त के साथ वैफ हाउस (रेस्तरां) में पहुंचे थे। बहुत ज्यादा भीड़ नहीं थी। यह देख दोनों ने कुछ राहत की सांस ली, क्योंकि इसके पहले वाला रेस्तरां खचाखच भरा मिला था। जेम्स और उनके दोस्त अभी अपनी सीट पर बैठे ही थे कि एक जोरदार आवाज आई। उन्हें लगा कि शायद रसोइए ने किसी गुस्से में बर्तन पटका है। पर अगले ही पल एक और तेज आवाज के साथ रेस्तरां के सामने का शीशा टूटकर बिखर गया। जेम्स और उनके दोस्त की निगाह रेस्तरां के मेन गेट पर पड़ी। एक नौजवान ढेर हो चुका था। वे दोनों समझ गए कि यह हमला है।
हमलावर एआर-15 राइफल से चारों तरफ गोलियां बरसाने लगा था। बदहवास लोग चीखते-चिल्लाते इधर-उधर भाग रहे थे। जेम्स ने उछलकर काउंटर के पीछे छिपने की कोशिश की, मगर वहां उनका बचना नामुमकिन था। कुछ लोगों को जख्मी और ढेर करने के बाद हमलावर काउंटर की तरफ बढ़ने लगा था। जेम्स ने एक लंबी छलांग मारी और पूरी तेजी के साथ वह शौचालय की तरफ भागे। इस बीच एक गोली उनके दाहिने हाथ को जख्मी कर गई थी। जेम्स को लगा कि अब चंद लम्हे रह गए हैं।
मौत जब सामने हो, तो जीने की चाहत और जोर मारती है। जेम्स ने सोचा, अब मरने ही वाला हूं, तो फिर जीने की एक  आखिरी कोशिश क्यों न कर लूं! उन्होंने रेस्तरां में बच्चों को भी देखा था। उन सबका चेहरा जेम्स की आंखों के आगे घूम गया। हाथ में भारी दर्द उठ रहा था, मगर उसे बर्दाश्त करना था, ताकि हमलावर को उनकी जगह का पता न चले। जेम्स ने खुद को शांत किया और खिड़की के पीछे से हत्यारे पर अपनी नजर टिकाए रखी।  
जेम्स अब तक समझ चुके थे कि हत्यारा अकेला है। लेकिन उन्हें नहीं मालूम था कि उसके पास और कौन-कौन से हथियार हैं। अचानक गोलियों की आवाज आनी बंद हो गई। जेम्स ने साहस बटोरकर खिड़की से बाहर झांका। हमलावर उस वक्त राइफल नीचे रख कारतूस लोड कर रहा था। यही मौका था। फैसले के लिए जेम्स के पास मिनट नहीं, कुछ सेकंड थे। बगैर कोई वक्त गंवाए जेम्स ने राइफल पर झपट्टा मारा। इतनी सारी गोलियां उगलकर बैरेल आग हो चुकी थी। मगर जेम्स ने पूरी मजबूती से उसे पकड़ लिया था। हाथ जल रहे थे, मगर उन्होंने राइफल को हमलावर से छीनकर काउंटर की तरफ उछाला और हमलावर को पूरी ताकत के साथ बाहर की तरफ धक्का दिया।
हमलावर उस वक्त वहां से भाग निकला, लेकिन चंद घंटों के भीतर पुलिस ने उसे दबोच लिया। जेम्स की सूझबूझ और साहस ने कई बेगुनाह लोगों की जान बचा दी थी। पर अपनी आंखों के सामने चार निर्दोष युवकों की मौत ने उन्हें बेहद मर्माहत किया। चारों मृतक 20 से 29 साल के थे। लोगों की निगाह में जेम्स का यह नायकत्व कितना बड़ा था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस वारदात में मारे गए नौजवानों के परिवार की मदद के लिए उन्होंने अगले ही दिन ‘गो फंड मी’ अभियान की शुरुआत की और महज एक महीने के भीतर ही इसमें लगभग दो करोड़ रुपये आ गए। इसकी ज्यादातर राशि उन्होंने चारों मृतकों के परिवारों में बांट दी।
हादसे के बाद अब लगभग रोज ही जेम्स की आंखों के आगे वह पूरा मंजर जिंदा हो आता था। इससे उबरने के लिए उन्होंने मनोवैज्ञानिकों के साथ-साथ अपनी नन्ही बच्ची के करीब ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताया। जेम्स की बहादुरी को सलाम करते हुए उनके देश के हजारों लोगों ने उनकी बेटी और उनके लिए डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा की।
अगस्त 2018 से जेम्स ने अमेरिका की कुख्यात बंदूक-हिंसा के खिलाफ एक मुहिम शुरू  की है। अब वह एक सेलिब्रिटी बन चुके हैं। उन्हें कई टीवी कार्यक्रमों में बुलाया जा चुका है। अनेक विश्वविद्यालयों और संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया है। लगभग सात लाख आबादी वाले नैशविल शहर के मेयर ने जेम्स को सम्मानित करते हुए कहा कि ‘आप सच्चे हीरो हैं, इसके जवाब में अपनी पूरी विनम्रता के साथ जेम्स शॉ जूनियर ने सिर्फ इतना कहा, ‘मुझे हीरो मत कहिए, मैं तो बस जीना चाहता था। मैंने जो किया, वह हरेक आम नागरिक को करना चाहिए।’ नौजवानों के एक हुजूम को संबोधित करते हुए उनके शब्द थे, ‘आपकी जिंदगी में जब भी कोई ऐसा पल आए, तो सबसे पहले अपने भीतर लड़ना, आप जरूर जीतेंगे।’
प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह

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  • Web Title:hindustan jeena isi ka naam hai column 12 july 2020