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Hindi News ओपिनियन जीना इसी का नाम हैऊंची तालीम के साथ इंसानियत तलाशती एक अमेरिकी

ऊंची तालीम के साथ इंसानियत तलाशती एक अमेरिकी

कैदी पिता की संतान होने के कारण यासमीन को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, उसने उनके भीतर एक गहरी टीस पैदा की थी। फिर जब पता चला, अमेरिका में 20 लाख नौजवानों के माता-पिता जेल में हैं, तब...

ऊंची तालीम के साथ इंसानियत तलाशती एक अमेरिकी
Pankaj Tomarयासमीन एरिंगटन, वक्ता, सामाजिक कार्यकर्ताSun, 10 Dec 2023 01:23 AM
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दुनिया में क्या कोई ऐसा इंसान होगा, जिसके हिस्से में गम न आए हों या जिसे कभी कोई पीड़ा न पहुंची हो? ऐसा होना नामुमकिन है, क्योंकि यह मनुष्य मात्र की नियति है। वह सुख-दुख से आबद्ध है। मगर सच यह भी है कि जो लोग भाग्यवादी बनने केबजाय कर्मवादी बनते हैं, वही बदलाव के वाहक बनते हैं। यासमीन एलेक्जेंड्रा एरिंगटन उन विरले लोगों में से हैं, जिन्होंने इस दुनिया को कुछ और बेहतर, कुछ और ज्यादा मानवीय बनाने का बीड़ा उठाया है। अमेरिकी समाज उनकी इस भूमिका को सराह भी रहा है। विश्व की प्रतिष्ठित मीडिया कंपनी सीएनएन  ने उन्हें इस साल के ‘हीरो’ सम्मान के लिए नामित किया है।
आज से करीब 30 साल पहले वाशिंगटन डीसी में यास्मीन पैदा हुईं। होश संभालते ही पता चला कि पिता टोनी रे एरिंगटन जेल में हैं। उनकेबाहर आने और फिर से सलाखों के पीछे भेजे जाने का सिलसिला पुराना है। नन्ही यासमीन को तो पिता की शक्ल भी याद नहीं थी। टोनी का ज्यादातर वक्त चोरी और इसी तरह के अन्य अपराधों की सजा काटने में सलाखों के पीछे बीता। मगर यासमीन तब क्या समझ पातीं कि चोरों की संतानों को समाज कैसी नजरों से देखता है? जिस उम्र में बच्चों के सुपर हीरो उनके माता-पिता होते हैं, उस आयु में यासमीन की आंखों ने ऐसा कोई ख्वाब देखा ही नहीं। मगर जैसे-जैसे वह बड़ी होती गईं, उपेक्षा भरी या तरस खाती निगाहों की तीक्ष्णता उन्हें अंदर तक वेधती रही।

जेल से पिता के इस रिश्ते ने परिजनों की जिंदगी को बेहद मुश्किल बना दिया था। घर की माली हालत खराब हुई, तो यासमीन की मां अपने बच्चों को लेकर मां वेरोनिका राइट के पास चली आईं। वे सब बिखरी हुई जिंदगी जी रहे थे। मां को पेट की गंभीर बीमारी थी और उस पर बच्चों के भविष्य की चिंता ने उन्हें गहरे अवसाद में धकेल दिया। यासमीन अपने छोटे भाइयों के साथ उन्हें बस दर्द से तड़पते या अवसाद में देखा करती थीं। तब वह महज आठ साल की थीं। पेटदर्द से राहत पाने के लिए यासमीन की मां ने दर्द-निवारक गोलियों की ऐसी लत पाल ली कि एक वक्त डॉक्टर ने साफ कह दिया, अब उनके उपचार का एकमात्र रास्ता ऑपरेशन है।
ऑपरेशन हुआ भी, मगर कुछ वर्षों बाद ही नई समस्याएं पैदा हो गईं और यासमीन जब अपने हाईस्कूल के प्रथम वर्ष में थीं, उनकी मां ने दुनिया को अलविदा कह दिया। यासमीन तब पंद्रह साल की थीं। उन्हें लगता कि पिता होते, तो नानी वेरोनिका समेत उन सबका ख्याल रखते, मगर वह चार साल की उम्र में जो छोड़ गए, तो फिर पलटकर नहीं आए। प्यार व स्नेह की भूखी यासमीन की मुलाकात उन्हीं दिनों एलोन यूनिवर्सिटी के टीनो मोनरो से हुई। वह भी फर्स्ट ईयर के छात्र थे। उनकी दोस्ती अंतत: प्यार में तब्दील हो गई। दोनों ने अपने-अपने विषय में इसी यूनिवर्सिटी से स्नातक किया।
मगर यासमीन के भीतर पिता को लेकर एक कसक बनी रही कि वह मिलते, तो पूछती कि उन्हें ऐसा बचपन क्यों गुजारना पड़ा? इसका संयोग बना भी। टोनी एरिंगटन जॉर्जिया जेल से रिहाई के बाद एलोन यूनिवर्सिटी के करीबी रेस्तरां में रसोइए का काम कर रहे थे। जब पिता और बेटी का आमना-सामना हुआ, तो मिनटों तक दोनों एक-दूसरे को पहचानने की ही कोशिश करते रह गए। पिता की नजरें चार साल की अपनी गुड़िया को तलाश रही थीं, जो अब युवा हो चली थी, तो वहीं पिता से मिलने के आह्लाद में बेटी अपना सवाल पूछना भी भूल गई। यासमीन को तो बस इस बात का इत्मीनान था कि उनके पिता सामने हैं, वह उनसे बातें कर सकती हैं।

किसी पुराने जुर्म की सजा में पिता फिर जेल भेज दिए गए, पर यासमीन उनसे नाराज नहीं हुईं। उन्होंने उन्हें माफ कर दिया था। वह पिता से फोन से बातें करती रहीं, बल्कि स्नातक की डिग्री लेते हुए उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि पिता उस वक्त मौजूद रहें, ताकि वह उन्हें खुशी और गौरव के कुछ पल दे सकें। हाईस्कूल में दाखिला लेते समय कैदी पिता की संतान होने के कारण यासमीन को जिन आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, उसने उनके भीतर एक गहरी टीस पैदा की थी। फिर जब यह पता चला कि उनकी ही तरह अमेरिका में 20 लाख किशोर-नौजवान हैं, जिनके माता-पिता जेल में हैं, तब यासमीन ने इस कलंक और शर्मिंदगी को ढो रहे छात्रों की मदद करने का फैसला किया।
अक्तूबर 2010 की बात है। उस समय यासमीन बमुश्किल 17 साल की रही होंगी। यह वह उम्र थी, जब उन्हें आगे की अपनी पढ़ाई मुकम्मल करनी थी और एक अच्छे करियर का रास्ता तलाशना था, उन्होंने समान स्थिति वाले विद्यार्थियों के लिए ‘स्कॉलरचिप्स’ नामक एक गैर-लाभकारी संस्था की शुरुआत की। उनकी इस पहल ने कई उद्यमियों, दानदाताओं, पत्रकारों को आकर्षित किया। साल 2012 से अब तक यासमीन को अनगिनत पुरस्कार मिले हैं, जिनमें मिली धनराशि उन्होंने इस संस्था को दे दिए। स्कॉलरचिप्स के जरिये वह अब तक अस्सी से ज्यादा छात्रों को वजीफे के तौर पर करीब चार करोड़ रुपये की सहायता कर चुकी हैं। 
एक पेशेवर मॉडल व प्रेरक वक्ता के रूप में यासमीन अमेरिका और उसके बाहर घूम-घूमकर लोगों का आह्वान करती हैं कि अभिभावकों के किए की सजा बच्चों को मत दीजिए। उन्हें हिकारत की नहीं, सामाजिक प्रोत्साहन की दरकार है। आज ही सीएनएन की जूरी इस साल के हीरो की घोषणा करेगी। यासमीन विजेता बनीं, तो उन्हें इनाम में एक लाख डॉलर की राशि मिलेगी। नामित होते ही वह पचास हजार डॉलर की हकदार हो चुकी हैं। जाहिर है, यह धन भी उनके बडे़ मकसद के लिए होगा। बकौल यासमीन, जीवन में अच्छे करियर के लिए यूनिवर्सिटी की डिग्री चाहिए, मगर इंसान होने की सार्थकता इससे कुछ और ज्यादा मांगती है।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह

 

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