DA Image
रू-ब-रू

हमने बेटियों के लिए द्वार खोल दिए

हुस्ना जलील राजनेताPublished By: Manish Mishra
Sat, 05 Jun 2021 11:20 PM
हमने बेटियों के लिए द्वार खोल दिए

भारतीय उप-महाद्वीप के ज्यादातर देशों ने इतिहास के आधुनिक दौर में, खासकर 20वीं सदी के उत्तराद्र्ध से लगातार औरतों की आजादी और उनकी खुदमुख्तारी की नई-नई इबारतें गढ़ीं। मगर हमारे पड़ोस में एक मुल्क ऐसा भी है, जहां की औरतें 21वीं सदी के इस तीसरे दशक में भी अपने लिए इज्जत और आजादी की मुश्किल लड़ाई लड़ रही हैं। और इस लड़ाई की एक शिनाख्त हुस्ना जलील हैं। आज से तकरीबन 29 साल पहले पैदा हुईं हुस्ना अफगानिस्तान के गजनी में पली-बढ़ीं। तब इसके चप्पे-चप्पे पर तालिबान का निजाम कायम था। जाहिर है, बच्चियों के लिए स्कूल के दरवाजे बंद हो गए थे। पश्चिमी तर्ज की तालीम को उनके लिए हराम करार दिया जा चुका था। अब जिस समाज में ज्यादा पढ़ने-लिखने वाले लड़कों के काफिर बनने की कहानियां पीढ़ियों से बांची जाती रही हों, वहां बेटियों को पढ़ाने की हसरत भला कौन पालता? लेकिन हुस्ना इस मामले में खुशकिस्मत रहीं कि उनके वालिद का अपने कबीले व इलाके में ऊंचा वकार था और वह लड़कियों की तालीम के हामी थे। काम आसान न था, मगर उनकी कोशिशों की बदौलत कस्बे की बच्चियों को सख्त परदे में मदरसे जाने की इजाजत मिल गई। बेटियां इतने पर भी बहुत खुश थीं, उनकी अंधेरी दुनिया में आखिर एक रोशन दरवाजा जो खुला था। 

तालिबान का शासन उरुज पर था, हुस्ना के वे बचपन के दिन थे। मुल्क के हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे थे। चौतरफा हिंसा और औरतों पर आयद पाबंदियों का आलम यह था कि अफगानिस्तान को स्त्रियों के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक मुल्क कहा जाने लगा था। वक्त ने एक अजीबोगरीब करवट ली। न्यूयॉर्क के ट्विन टावर पर अल-कायदा के हमलों ने अमेरिका को मातम में डाल दिया था, वहीं बाकी दुनिया उस वारदात से थर्रा उठी थी। मगर उसके नतीजतन अफगानिस्तान में जो कुछ हुआ, उससे वहां के अमनपसंद लोगों, खासकर हुस्ना जैसी लड़कियों की जिंदगी बदल गई। साल 2001 में तालिबानी हुकूमत के अंत और हामिद करजई की ताजपोशी के बाद दुनिया भर की एजेंसियों ने अफगानी बच्चों की शिक्षा पर खासा जोर दिया। वहां काफी सारे सामुदायिक स्कूल खुले और उनमें से एक में हुस्ना को भी पढ़ने का मौका मिला। हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने भौतिकी में बैचलर की डिग्री ली और फिर ‘अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ अफगानिस्तान’ से एमबीए की। इसके बाद तो जैसे सारा आकाश हुस्ना का था। वह कई निजी-सरकारी कंपनियों के प्रबंधन बोर्ड की सदस्य रहीं। उन्होंने अपनी कंपनी भी शुरू की। हर जिम्मेदारी में हुस्ना को बस एक ही सोच प्रेरित करती रही- वह अफगानिस्तान की आने वाली नस्लों, खासकर बेटियों को अपनी किसी नाकामी से मायूस नहीं होने दे सकतीं। इसलिए हरेक काम को वह पूरी शिद्दत से करती रहीं।
वर्ष 2014 में अशरफ गनी अफगानिस्तान के सदर बने। उन दिनों वहां के सरकारी भ्रष्टाचार के किस्से खूब सुनने को मिलते थे। गनी अवाम को इससे छुटकारा दिलाने का वादा करके आए थे। उन्हें कुछ ऐसे कुशल नौजवानों की तलाश थी, जो पश्चिमी शिक्षा से लैस हों और जिनमें अपने मुल्क को लेकर कोई प्रतिबद्धता हो। ऐसे कई नौजवानों को उन्होंने मंत्रालयों में वरिष्ठ सलाहकार नियुक्त किया। खान एवं पेट्रोलियम मंत्रालय में हुस्ना को ‘पॉलिसी ऐंड रिसर्च डायरेक्टरेट’का प्रमुख बनाया गया। तालीम, तजुर्बे और काबिलियत ने हुस्ना को जल्द ही उस पद पर पहुंचा दिया, जिसके ख्वाब सियासतदां दशकों देखते हैं और चंद को ही यह नसीब हो पाता है। फिर हुस्ना तो तब महज 26 साल की थीं। 2018 में वह गृह मंत्रालय में उप-मंत्री बनाई गईं। पद संभालते वक्त वह वाकिफ थीं कि मर्दों के दबदबे वाले देश और समाज में उनकी यह हिमाकत आगे कई दुश्वारियां खड़ी करेगी। पर उनके सामने कहीं बड़ा मकसद था। बकौल हुस्ना- ‘मैंने तब बस यही सोचा कि अगर मैं कामयाब हुई, तो इसका मतलब औरतों के लिए दरवाजे का खुलना होगा।’आशंका के मुताबिक, हुस्ना जो भी बदलाव करना चाहती थीं, मर्द सहकर्मी उसकी राह में तरह-तरह की बाधाएं खड़ी कर देते। मगर जब बेकाबू पुलिस अफसरों को नियंत्रित करने की बात आई, तो उन्होंने कड़ा रवैया अपनाया। सख्ती, सुधार और पुलिस महकमे में महिला सशक्तीकरण की उनकी कोशिशें उनके लिए दुष्प्रचार लेकर आईं। उन्हें ‘वेश्या’ तक कहा गया। मगर इन सबसे बेपरवाह हुस्ना अपने मिशन में जुटी रहीं। तालिबान से उन्हें लगातार मार डालने की धमकियां मिलती रहीं, इसके बावजूद उन्होंने देश के 34 में से 26 प्रांतों का दौरा किया। ऐसा उनके पुरुष समकक्षों ने भी नहीं किया होगा। इस साल फरवरी में वह महिला मामलों की उप-मंत्री बनाई गई हैं। आज अफगानिस्तान के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में 40 फीसदी लड़कियां हैं। हुस्ना जलील जैसी चंद साहसी महिलाओं ने सचमुच उनके लिए दरवाजे खोल दिए हैं।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह

संबंधित खबरें