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Hindi News ओपिनियन जीना इसी का नाम हैउनका क्या कसूर कि वे सलाखों के पीछे पलें

उनका क्या कसूर कि वे सलाखों के पीछे पलें

शताब्दियों पहले दार्शनिकों ने यह स्थापना दी थी कि गुणों के एक तल पर मनुष्य ईश्वर के समतुल्य आ सकता है, और वह गुण है- करुणा! शायद यही कारण है कि सज्जन लोग अक्सर यह दोहराते रहते हैं- परमार्थियों के...

उनका क्या कसूर कि वे सलाखों के पीछे पलें
Amitesh Pandeyपुष्पा बस्नेत, समाजसेवीSat, 02 Dec 2023 10:42 PM
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शताब्दियों पहले दार्शनिकों ने यह स्थापना दी थी कि गुणों के एक तल पर मनुष्य ईश्वर के समतुल्य आ सकता है, और वह गुण है- करुणा! शायद यही कारण है कि सज्जन लोग अक्सर यह दोहराते रहते हैं- परमार्थियों के कारण ही यह दुनिया आकर्षक बनी हुई है, वरना फरेबी और मक्कार लोग तो इसे कब का बदसूरत बना चुके होते। आज एक ऐसी ही परमार्थी महिला पुष्पा बस्नेत की कहानी, जिन्होंने अपने सद्कार्यों से न सिर्फ इंसानियत का सिर बुलंद किया है, बल्कि इस दुनिया को कुछ और सुंदर बनाया है।
आज से करीब चार दशक पहले काठमांडू (नेपाल) के एक कारोबारी घराने में पैदा हुईं पुष्पा के पिता बेहद तरक्कीपसंद थे। अपने बेटे-बेटियों में उन्होंने कभी कोई भेदभाव नहीं किया। पुष्पा तीन भाई-बहन हैं। भाई उनसे बडे़ हैं, और बहन छोटी। जाहिर है, उनका बचपन बेहद सुकून भरे स्नेहिल माहौल में गुजरा, मगर उनका दिल किताबों में बिल्कुल नहीं लगता था। खाना पकाना और साइकिल चलाना, उनकी रुचि के दो क्षेत्र थे। बहरहाल, किताबों और कक्षाओं से भारी जंग लड़ते हुए वह दसवीं बोर्ड तक तो आ गई थीं, मगर इसके इम्तिहान को लेकर पुष्पा से ज्यादा घरवालों की धुकधुकी बढ़ी हुई थी। और आखिरकार वही हुआ, जिसकी आशंका थी। जिस रोज बोर्ड के नतीजे आए, पिता को जापान जाना था। वह रोते हुए हवाई अड्डे की ओर बढ़े थे। माता-पिता कितने भी अमीर क्यों न हों, औलाद के मुस्तकबिल को लेकर वे हमेशा फिक्रमंद होते हैं। पिता के वे आंसू बेटी के दिल में जा गिरे थे। पुष्पा को अगली बोर्ड परीक्षा के लिए भले ही एक साल इंतजार करना पड़ा, मगर वह पिता के लिए मुस्कराने का मौका लेकर आईं।
शहर के सेंट जेवियर्स कॉलेज ने समाजशास्त्र में ग्रेजुएशन करने की अनुमति दे दी थी। रुचि का विषय था, तो पुष्पा का भी दिल लग गया। उस समय उनकी उम्र 21 साल थी। वह चाहतीं, तो एक सुकूनदेह जिंदगी का इंतिखाब कर सकती थीं, मगर ख्यालों ने अचानक करवट मार दी। दरअसल, स्नातक करते हुए एक शैक्षिक कार्ययोजना के तहत पुष्पा कालीमाटी जेल पहुंचीं, जहां की महिला कैदियों के हालात पर उन्हें एक परचा तैयार करना था। मगर पुष्पा जब जेल के उस हिस्से में दाखिल हुईं, तो वहां एक दुखद आश्चर्य उनका इंतजार कर रहा था। उनकी नजर एक नौ माह की बच्ची पर पड़ी, जो अपनी मां की गोद में सलाखों के उस पार थी। वह बेहद प्यारी बच्ची थी। उसकी कैदी मां से पुष्पा जब बातचीत कर रही थीं, उसी दौरान उसने पुष्पा की शॉल अपनी मुट्ठी में भींच ली और यूं मुस्कराई, मानो हजारों मोनालिसाएं एक साथ खिलखिला पड़ी हों! 
वह अभिशापित दिलकश मुस्कान पुष्पा के साथ चली आई थी, बल्कि वह हमेशा के लिए उनकी आंखों में बस गई। कैदियों के साथ मासूम बच्चों को यूं सलाखों के पीछे देखना उन्हें हैरान और गमजदा कर गया था। उन पर पहली बार यह खुलासा हुआ कि जिन कैदी माता-पिता के अबोध बच्चों को बाहर संभालने वाला कोई न हो, उन्हें कानून यह इजाजत देता है कि वे आठ साल तक उन्हें अपने साथ जेल में ही रख सकते हैं। इस व्यवस्था का मकसद शायद उन मासूमों को अविश्वसनीय रिश्तेदारों के दुर्व्यवहार और मानव तस्करों से बचाना हो, मगर आठ साल के बाद? और फिर उनकी आजादी का क्या? इस सामाजिक अध्ययन ने पुष्पा को कई दिनों तक बेचैन रखा। उसी दौरान एक पांच साल की बच्ची की दर्दनाक कहानी जब उन्हें पता चली, तब उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने तय किया कि वह इन बच्चों के लिए कुछ न कुछ जरूर करेंगी। दरअसल, उस बदनसीब बच्ची को पिता ने ही हवस का शिकार बना डाला था, क्योंकि उसकी मां किसी अन्य पुरुष के साथ भाग गई थी। 
आजाद फिजां में कैदियों के बच्चों की परवरिश का ख्याल जब पुष्पा ने अपने दोस्तों-रिश्तेदारों से साझा किया, तो किसी ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। सबको यही लगा कि ये वक्ती जज्बात हैं, जो कुछ दिनों में शांत पड़ जाएंगे। आखिर तब उनकी उम्र ही क्या थी! 21 साल। मगर सींखचों के उस पार पड़े बेगुनाह बच्चों की दुखद अवस्था ने पुष्पा के मन पर गहरा असर डाला था। उस जेल-अध्ययन के दो महीने के अंदर उन्होंने अपने दोस्तों-रिश्तेदारों से सत्तर हजार रुपये इकट्ठा कर किराये के घर से ‘अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट सेंटर’ की शुरुआत कर दी। 
अपने माता-पिता को कायल करने में तो पुष्पा को कोई दिक्कत नहीं हुई, पर कैदी अभिभावकों को भरोसे में लेना बहुत कठिन था। मगर इरादे पवित्र थे, तो बाधाओं को भी पिघलना ही था। आखिरकार पांच बच्चों के साथ उनका केंद्र शुरू हो गया। सोमवार से शनिवार तक वह रोज सुबह उन बच्चों को जेल से निकालकर अपने सेंटर ले आतीं और फिर दोपहर में उनके कैदी अभिभावकों को सौंप जातीं। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या चालीस के करीब पहंुच गई। उनमें से कई ने तो पहली बार जेल के बाहर कदम रखा था।
पुष्पा आठ साल से बड़े बच्चों के लिए एक मुकम्मल आवासीय परिसर बनाना चाहती थीं, ताकि वे आजाद माहौल में पल-संवर सकें। साल 2012 में ‘सीएनएन हीरो अवॉर्ड’ के साथ मिली करीब 41 लाख रुपये की रकम ने उनका यह सपना भी पूरा कर दिया। इस धन से उन्होंने जमीन खरीदी और बटरफ्लाई होम का निर्माण कराया। उसके बाद से उन्हें करोड़ों के इनाम मिले, जिनसे उन्होंने ग्रामीण जेलों के करीब भी ‘अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट सेंटर’ की शुरुआत की। इनके कई बच्चे अब कॉलेज पहुंच गए हैं। वे सब प्यार से पुष्पा को ‘मामू’ पुकारते हैं, और नेपाल अपनी इस बेटी पर गदगद है। पुष्पा ने इन बच्चों को अपना जीवन समर्पित कर दिया है।
 प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह 

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