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Hindi News ओपिनियन जीना इसी का नाम हैअपने काम से नाम को सार्थक करते उत्तम

अपने काम से नाम को सार्थक करते उत्तम

नेपाल और भारत का रिश्ता साझी संस्कृतियों का ही नहीं, साझे सपनों का भी है। इसीलिए जब-जब भी इन दोनों के आपसी रिश्तों में खटास पैदा हुई, तब-तब पशुपतिनाथ और बाबा विश्वनाथ के दरबार में गुहार के असंख्य...

अपने काम से नाम को सार्थक करते उत्तम
Amitesh Pandeyउत्तम संजल, सामाजिक कार्यकर्ताSat, 30 Sep 2023 10:11 PM
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नेपाल और भारत का रिश्ता साझी संस्कृतियों का ही नहीं, साझे सपनों का भी है। इसीलिए जब-जब भी इन दोनों के आपसी रिश्तों में खटास पैदा हुई, तब-तब पशुपतिनाथ और बाबा विश्वनाथ के दरबार में गुहार के असंख्य हाथ एक साथ उठे। इस अनोखे रिश्ते के कारण ही काठमांडू में पैदा उत्तम संजल हिंदी फिल्मों में हीरो बनने का ख्वाब संजोए मुंबई आ जाते हैं, और उन्हें इंडस्ट्री में काम भी मिल जाता है। 
काठमांडू जिले के गोतातार गांव में सन् 1972 में जन्मे उत्तम बचपन से ही हिंदी फिल्में देखा करते थे। नेपाल टीवी पर उन दिनों हिंदी सिनेमा खूब दिखाया जाता था। जैसे-जैसे उत्तम बड़े हुए, दूसरे नेपाली नौजवानों की तरह उनमें भी हिंदी फिल्मों के प्रति दीवानगी बढ़तीचली गई। उन्हें यही लगता था कि हीरो की इज्जत सभी लोग करते हैं और वह चाह जाए, तो पूरे समाज को बदल सकता है। उन दिनों वह काठमांडू के चामंुडा हाईस्कूल के छात्र थे। बोर्ड की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका अगला ठिकाना कोई कॉलेज होना चाहिए था, मगर उनके अंदर तो हीरो बनने का सपना ठाठें मार रहा था, उत्तम ने मुंबई की राह पकड़ ली।
वह तब सिर्फ 18 साल के थे। मगर मुंबई पहुंचकर उन्हें धचका-सा लगा। उत्तम जैसे लाखों किशोर-नौजवान वहां हीरो बनने आए थे और वे सालों से भटक ही रहे थे। उनका घर लौटना आसान नहीं रह गया था। जुनूनी उम्र के सभी लोगों में उपहास को सहने का धैर्य ही कहां होता है? उत्तम ने भी मुंबई में रहकर संघर्ष करने का फैसला किया। हालांकि, काठमांडू की आरामदेह जिंदगी उन्हें बहुत सताती रही, मगर यह रास्ता तो उन्होंने खुद चुना था। उत्तम का संघर्ष बेकार तो नहीं गया, पर हीरो बनने की उनकी साध पूरी नहीं हुई। उन्हें कैमरे के आगे नहीं, बल्कि उसके पीछे का काम मिला। बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर वह कई प्रोजेक्ट्स का हिस्सा रहे, पर इस क्षेत्र में भी उनके करियर को मुफीद उड़ान नहीं मिल पा रही थी। उन दिनों नेपाल माओवादी विद्रोह की गिरफ्त में था। खासकर ग्रामीण इलाकों के नौजवान बागी गुटों में शामिल हो रहे थे या फिर भागकर काठमांडू आ रहे थे। चूंकि उनके पास न शिक्षा होती और न ही किसी किस्म का कौशल होता, लिहाजा उनमें से ज्यादातर कालीन बनाने वाले कारखानों में काम करने को मजबूर थे। उन्हीं दिनों में उत्तम एक बार मुंबई से काठमांडू अपने घर आए हुए थे। उन्होंने गौर किया कि जब कहीं कोई काम नहीं मिलता, तो कई किशोर चोरियां करने लगते या फिर वे भीख मांगने का पेशा अपना लेते। किशोरियों को देह व्यापार में धकेल दिया जाता था, और अगर उनके खिलाफ कोई शिकायत होती कि वे समाज को बिगाड़ रही हैं, तो पुलिस उन्हें उठा ले जाती।
उत्तम यह सब देखकर विचलित थे। उन्हें लगा कि इस समस्या का एकमात्र हल यही है कि इन बच्चों को स्कूल भेजा जाए और इन्हें सड़कों से दूर रखा जाए। मुंबई लौटने से पहले उन्होंने ऐसे 12 बच्चों का दाखिला एक स्कूल में कराया। लेकिन जब अगली बार वह काठमांडू आए, तो पाया कि स्कूल ने उन बच्चों को मुफ्त में शिक्षा देने से इनकार कर दिया था। उत्तम को लगा कि ये बच्चे पढ़ते रहें, यह सुनिश्चित करना अब मेरी जिम्मेदारी है। अंतत: एक दशक बाद उन्होंने मुंबई छोड़ काठमांडू लौटने का निर्णय कर लिया।
साल 2000 में उत्तम ने ‘समता शिक्षा निकेतन’ की नींव रखी, ताकि गरीब परिवारों के बच्चों को भी अंग्रेजी माध्यम में स्तरीय शिक्षा मिल सके। मगर बांसों से बने इस स्कूल में मुफ्त शिक्षा देने के बजाय उन्होंने 100 रुपये की फीस रखी, ताकि गरीब अभिभावक किसी हीन-ग्रंथि के शिकार न हों और उनके भीतर भी दानशीलता का भाव उभारा जा सके। शुरुआती दिनों में कठिनाइयां आईं, किराये और कर्मचारियों के वेतन की व्यवस्था का काम चुनौतीपूर्ण था। लेकिन उत्तम को मुंबई के संघर्ष ने काफी कुछ सिखा दिया था। वह जुटे रहे। कुछ नेपाली दानवीरों ने उनका साथ दिया। 12वीं के बोर्ड के पहले बैच में उनके स्कूल में सिर्फ पांच बच्चे थे। मगर उन पांचों को शानदार नंबर (डिस्टिंगशन) मिले। ये सब 100 रुपये की फीस में पढ़ने वाले बच्चे थे।
इस कामयाबी ने उत्तम को समाज में सुर्खरू कर दिया। फिर तो उन्हें कई दानदाताओं का सहयोग मिला, मगर उन्होंने शिक्षा को मुनाफे का सौदा नहीं बनने दिया। उन्होंने एक कायदा बनाया कि स्कूल की 100 रुपये की फीस चुकाने के लिए अभिभावक को हर माह खुद आना होगा, ताकि छात्र-शिक्षक-अभिभावक के बीच एक अटूट रिश्ता कायम हो सके। आज नेपाल के 77 जिलों में समता शिक्षा निकेतन के 80 संस्थान चल रहे हैं और इनमें प्राइमरी से लेकर मास्टर्स तक की स्तरीय शिक्षा दी जाती है। इस समूह के शिक्षण संस्थान अब 20 अन्य देशों में भी चल रहे हैं, और इन सभी में नेपाल वाला पाठ्यक्रम ही पढ़ाया जाता है।
बीते 22 वर्षों का उत्तम संजल का हासिल यह है कि नेपाल के लगभग 60,000 छात्र-छात्राएं समता शिक्षा के स्कूलों व उच्च शिक्षण संस्थानों में महज 100 रुपये की मासिक फीस चुका अपना भविष्य संवार रहे हैं। इन स्कूलों के 51 बच्चे डॉक्टर बनकर मानवता की सेवा करने लगे हैं, तो 137 बीटेक की डिग्री हासिल करके विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं। यहां के कई बच्चे आज यूरोप व अमेरिकी विश्वविद्यालयों में स्कॉलरशिप पर उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। जाहिर है, ये उपलब्धियां समता शिक्षा निकेतन की स्तरीय शिक्षा की मुनादी करती हैं। ऐसे में, स्वाभाविक ही है कि जब लंदन के ‘वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड’ ने उत्तम को काठमांडू में सम्मानित करने का फैसला किया, तो देश के तीन वर्तमान व पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, पुष्प कमल दाहाल और माधव कुमार नेपाल एक साथ उन्हें सम्मान देने चले आए!
 प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह 

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