DA Image
31 अक्तूबर, 2020|11:55|IST

अगली स्टोरी

वे अब अफीम नहीं, औषधि उगाते हैं

देश के सुदूर पूरब में चार जिले बसे हैं- सेनापति, उखरुल, कांगपोक्पी और थोबल। कुदरत ने मणिपुर के इन जिलों को अपनी नेमतों से नवाजने में तो कोई कमी नहीं रखी, मगर आदिम समाज के काइंयेपन के आगे उसका बस भी कहां चलता है? इन जिलों के बाशिंदों, खासकर किसानों के हिस्से देश के दूसरे इलाकों के भूमिपुत्रों की तरह शोषण, बेबसी और बदहाली ही ज्यादा आई। व्यापारी उन्हें अफीम की खेती के लिए ललचाते रहे, और सरकारी मुलाजिम उनके खेतों में आग लगाते रहे।
भारतीय भूगोल के उसी हिस्से में राजेश किशाम ने 2 फरवरी, 1984 को इस दुनिया में अपनी आंखें खोलीं। उनके दादा एक कारोबारी थे, मगर किन्हीं वजहों से दिवालिया हो गए, मजबूरन राजेश के माता-पिता को सरकारी मुलाजमत करनी पड़ी। जाहिर है, उनके परिवार में आर्थिक तंगी उतनी नहीं थी, जितनी आस-पड़ोस या कुनबे के लोगों से वह चिपकी हुई थी। बहरहाल, 2002 में एसआरडी एकेडमी, मणिपुर से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर राजेश पुणे आ गए थे। मगर बचपन से ही दादा की तरह कारोबारी बनने की ख्वाहिश पलती आ रही थी। पुणे यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद कुछ अपनी माटी से लगाव के कारण, तो कुछ परिजनों की सलाह पर वह इंफाल लौट आए।
वह आ तो गए थे, मगर कुछ दिन काफी ऊहापोह में रहे कि क्या करें, क्या न करें! कई छोटे-मोटे काम किए भी, मगर सपनों की ओर ले जाने वाला कोई मुफीद रास्ता नहीं मिल पा रहा था। आखिरकार, ब्रिटेन में रह रहे एक दोस्त ने राजेश को ‘डाटा डिजिटाइजेशन’ का कुछ काम दिया। मगर वह बीपीओ उन्हें जल्द बंद करना पड़ा, क्योंकि मणिपुर के हालात इसके लायक नहीं थे। बिजली लगातार आती-जाती रहती, बल्कि कभी-कभी तो दिन में महज चार-पांच घंटे टिक पाती थी। इस नाकामी ने उन्हें एक गहरा सबक दिया कि यहां पर रहते हुए किसी ऐसे काम में ही सफलता अर्जित की जा सकती है, जिसमें संसाधन स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हों। उन्होंने संभावनाएं टटोलनी शुरू की। अंतत: वह इत्मीनान हुए कि मणिपुर की भूमि उपजाऊ है और कृषि से जुडे़ किसी काम में ही उन्हें हाथ आजमाना चाहिए। उन्होंने अपनी रिसर्च शुरू कर दी। उन्हें एक ऐसे उत्पाद की तलाश थी, जिसे एक बड़े उद्यम का रूप दिया जा सके। इसी क्रम में उनकी मुलाकात वरिष्ठ एरोमैटिक विज्ञानी डॉ एम अहमद से हुई। अहमद साहब राजेश के जोश और प्रतिबद्धता से खासे प्रभावित हुए। उन्होंने मणिपुर की मिट्टी में लेमनग्रास की एक प्रजाति ‘सिंबोपोगान सिट्रेटस’(सीसी) की बेहतर पैदावार और बाजार में इसके तेल की मांग के बारे में तफसील से बताया। 
राजेश की तलाश को अब मंजिल मिल गई थी। 2007 में उन्होंने इंडोनेशिया के एक दोस्त से उन्नत किस्म की सीसी की 10,000 डालियां मंगाईं और इंफाल से 20 किलोमीटर दूर लेइमाखोंग स्थित अपने एक एकड़ के प्लॉट में उन्हें लगा दिया। डॉ अहमद के ही दिशा-निर्देश में उन्होंने एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की और एसबीआई से कर्ज के लिए आवेदन किया। छह महीने बीत गए, पौधों में फूल आने लगे, मगर बैंक से कर्ज न मिला। डॉ अहमद ने कहा कि फूल के बाद इनकी कोई उपयोगिता नहीं रही, इसलिए इन्हें काटकर जलाना पड़ा। 
राजेश ने वह फसल ही नहीं जलाई, साथ ही कई मनसूबे भी जले। क्योंकि इसी दौरान ल्यूकीमिया की मरीज दत्तक पुत्री के इलाज में उनके माता-पिता को अपना सब कुछ बेचना पड़ा था, हालांकि फिर भी वे उन्हें नहीं बचा सके। राजेश को दोहरा भावनात्मक आघात लगा था। बहन भी नहीं रहीं, सपने भी भस्म हो गए थे। दूसरी बार भी पौधों में फूल आने का वक्त आ गया था, मगर बैंक का अनुमोदन नहीं आया। बेचैन राजेश ने इसकी अन्य उपयोगिताओं के बारे में अध्ययन करना शुरू किया, तो पता चला कि ब्राजील में इसके पेय से बुखार ठीक हुआ है और वहां पर इसे ‘फीवर ग्रास’ कहा जाता है।
नई उम्मीद दहलीज पर हाथ थामने को आ खड़ी हुई। 2009 का साल था। ‘सीसी टी’ के पहले उपभोक्ता राजेश के माता-पिता बने। पाया गया कि इससे उनकी कब्ज की शिकायत काफी हद तक दूर हो गई थी। जैकपॉट हिट हो गया था। राजेश नई दिल्ली के फिक्की रिसर्च ऐंड एनालिसिस सेंटर अपने वॉलंटीयर्स के साथ परीक्षण के लिए आ सकें, इसके लिए मां ने बैंक से कर्ज लिया।
तमाम परीक्षाओं को पास करके और पत्नी के गहने बेचकर जुटाई गई पूंजी से राजेश ने यह कैफिन मुक्त चाय साल 2011 में इंफाल में लॉन्च की। पिछले नौ साल में एक एकड़ से 350 एकड़ में फैल चुकी इसकी खेती ने राजेश को ही करोड़पति नहीं बनाया, उन चार जिलों के सैकड़ों किसानों की जिंदगी भी बदल दी है। वे अब अफीम नहीं, लेमनग्रास उगाते हैं। कम से कम 2000 लोगों की आजीविका की समस्या स्थाई रूप से हल हो चुकी है। सालाना आठ करोड़ की कमाई कर रहे राजेश किशाम कहते हैं, ‘यह तो एक लंबे सफर की शुरुआत है।’
प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह 

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:hindustan jeena isi ka naam hai column 01 november 2020