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Hindi News ओपिनियन जीना इसी का नाम हैकाश! हर कबीले को एक खालिदा मिल जाती

काश! हर कबीले को एक खालिदा मिल जाती

ऑनर किलिंग का अपराध एकदम थम तो नहीं गया, पर जनजातीय समाजों में बदलाव की बयार बह चली है। खालिदा अब अमेरिका के तीन शहरों में व्यावसायिक केंद्र खोल चुकी हैं। इनसे होने वाली कमाई का आधा हिस्सा पाकिस्तान क

काश! हर कबीले को एक खालिदा मिल जाती
khalida brohi
Monika Minalखालिदा ब्रोही, उद्यमी, सामाजिक कार्यकर्ताSat, 09 Mar 2024 10:43 PM
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इस दुनिया को हम कितना कम जानते हैं, इस बात का एहसास हमें हर उस पल होता है, जब किसी हौसलामंद के हैरतअंगेज कारनामे हम पर खुलते हैं। आज से अड़तीस साल पहले खालिदा जिस ब्रोही जनजाति में पैदा हुईं, उसमें लड़कियों की शादी कई बार उनके जन्म से भी पहले तय हो जाती थी। इसके पीछे ‘वट्टा-सट्टा’ विवाह-प्रथा मुख्य वजह थी। आज भी पाकिस्तान में यह रिवाज जारी है। दरअसल, औरतों को मर्दों की मिल्कियत समझने वाली इस परंपरा में दो परिवार किसी कत्ल के मुआवजे के तौर पर या जायदाद संबंधी विवाद सुलझाने के लिए भी लड़कियों की शादी एक-दूसरे परिवार में करते रहे हैं। ऐसे में, बच्चियों की तालीम और इंसानी हक-हुकूक के बारे में सोचता भी कौन? मगर पिता सिकंदर ब्रोही की हिमाकत के कारण खालिदा तीन बार इस परंपरा की भेंट चढ़ने से बचीं।
पहली बार तो तब, जब वह पैदा भी नहीं हुई थीं।अपनी बीवी के कातिल उनके ताऊ ने जब दूसरी शादी करने का फैसला किया, तो वट्टे-सट्टे के तहत लड़की पक्ष ने भी उनसे एक लड़की देने का मुतालबा किया। उस वक्त परिवार में कोई लड़की नहीं थी, लिहाजा ताऊ ने अपने छोटे भाई और खालिदा के पिता से यह वचन मांगा कि उनकी जो भी पहली बेटी होगी, वह उसे इस वट्टे-सट्टे के लिए देंगे। मगर खालिदा के पिता ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि ‘उसे अपनी गोद में उठाए बिना वह ऐसी कोई जमानत नहीं दे सकते।’
खालिदा के माता-पिता का भी वट्टे-सट्टे के तहत जबरिया निकाह हुआ था, तब सिकंदर ब्रोही 13 साल के थे और ‘खाली’ की मां महज नौ वर्ष की। वे दोनों इस कुरीति के विरोधी थे। इसलिए नहीं चाहते थे कि उनके बच्चों के साथ भी वैसा ही सुलूक हो। शादी के अगले चार वर्षों में ही इस किशोर दंपति को दो बच्चे हो गए। खालिदा के जन्म के दो साल बाद वट्टे-सट्टे के बढ़ते दबाव के कारण पति-पत्नी ने गांव छोड़कर शहर निकलने का फैसला किया, ताकि वहां वे बच्चों को पढ़ा-लिखा सकें। वे सिंध सूबे के शहर हैदराबाद आ गए। जाहिर है, गरीबाबाद (स्लम) में ही पनाह मिलनी थी। शुरू-शुरू में काम बहुत मुश्किल से मिलता था, मगर उसी कमाई में दोनों बच्चों को स्कूल भेजना शुरू किया। मगर सिकंदर ब्रोही ने गांव और कबीले की संस्कृति से बच्चों को आगाह रखा। धीरे-धीरे कुनबा बढ़ता गया और सिकंदर आठ बेटे-बेटियों के पिता बन गए। शहर-दर-शहर नए-नए काम तलाशते और तजुर्बे बटोरते हुए ब्रोही परिवार अंतत: कराची की स्लम बस्ती पहुंचा, जहां रहते हुए सही तरीके से खालिदा ने तालीम पाई। वह अपने गांव ही नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की पहली लड़की हैं, जो स्कूल गईं। 
खालिदा को इस बात की खुशी थी कि वह पहली लड़की हैं, जिन्हें यह आजादी मिली, मगर साथ ही अफसोस भी था कि जिस वक्त वह हाईस्कूल जा रही हैं, खानदान की उनकी कई बहनों और बचपन की सहेलियों का जबरन निकाह कर दिया गया, कुछ वट्टे-सट्टे में किसी बुजुर्ग की बीवी बना दी गईं, तो कुछ ने कच्ची उम्र में मां बनते समय दम तोड़ दिया। हर मौत पर खालिदा का दुखी होना स्वाभाविक था, पर जब  कभी ‘ऑनर किलिंग’ की सूचना मिलती, तो वह कांप उठती थीं, क्योंकि हत्यारे पिता, भाई या चाचा-मामा ही होते थे! 
साल 2002 की बात है, खालिदा तब सोलह साल की थीं। एक रात उन्हें पता चला कि उनकी हमउम्र चचेरी बहन ‘ऑनर किलिंग’ का शिकार बन गई है। उसने बिरादरी से बाहर के नौजवान से मोहब्बत कर ली थी। खालिदा ने सहेली जैसी अपनी इस बहन की मौत पर तय किया कि वह इस ‘आपराधिक’ रिवाज को रोकने के लिए जो कुछ बन पडे़गा, वह सब करेंगी। उसी दिन से उन्होंने ‘ऑनर किलिंग’ के खिलाफ औरतों को जागरूक करना शुरू कर दिया।
उन दिनों खालिदा का परिवार कराची के एक छोटे से कमरे में रहता था। तरक्कीपसंद पिता ने अपने बच्चों के भविष्य को संवारने के इरादे से उस तंग कमरे में भी कंप्यूटर के लिए जगह निकाल ली थी। खालिदा ने इसी कंप्यूटर, इंटरनेट और सोशल मीडिया की मदद से अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया में रह रहे हमख्याल लोगों के साथ मिलकर ऑनर किलिंग के खिलाफ ‘वेक अप’ मुहिम छेड़ दी। काफी समर्थन मिला, मुख्यधारा के मीडिया ने इसे नई धार दे दी। जगह-जगह ऑनर किलिंग के खिलाफ सख्त कानून की मांग होने लगी। जाहिर है, समुदायों के साथ-साथ कट्टरपंथियों ने इसे गैर-इस्लामी बताकर खालिदा पर हमला बोल दिया।
खालिदा को कराची छोड़ना पड़ा। उन्होंने अपनी तमाम गतिविधियां बंद कर दीं। करीब दो साल बाद जब वह कराची लौटीं, तब काफी हताश थीं। उन्होंने गौर किया कि आखिर उनका अभियान नाकाम क्यों हुआ? उन्होंने पाया कि उनकी मुहिम स्थानीय मूल्यों के खिलाफ दिख रही थी, और फिर जिनके लिए वह लड़ रही थीं, उसके स्थानीय हीरो भी इसमें शामिल नहीं थे। खालिदा और उनकी टीम ने रणनीति बदली। वह इन समुदायों के पास लौटीं, उनसे माफी मांगी और कहा कि हम अपनी संस्कृति को दुनिया तक ले जाना चाहते हैं- भाषा, संगीत और कशीदाकारी। कोई भी समुदाय भरोसा करने को तैयार न था। काफी प्रयास के बाद वे राजी हुए।
साल 2008 से सुघड़ फाउंडेशन के जरिये कबाइली कशीदाकारी को बढ़ावा देकर खालिदा हाशिये की हजारों औरतों की जिंदगी बदल चुकी हैं। ऑनर किलिंग का अपराध एकदम थम तो नहीं गया, मगर जनजातीय समाजों और इलाकों में बदलाव की बयार बह चली है। खालिदा अमेरिका में रहती हैं, वहां के तीन शहरों में वह अपने पति के साथ व्यावसायिक केंद्र खोल चुकी हैं। इनसे होने वाली कमाई का आधा हिस्सा पाकिस्तान की जनजातीय ्त्रिरयों के उत्थान पर खर्च होता है।
प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह