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जिसने दुत्कारा, उसे अब रश्क है

जिस दिन तामांग विधवा हुईं, उस दिन उन्होंने सिर्फ अपना पति नहीं खोया, बल्कि सब कुछ गंवा दिया। ससुराल वालों का रवैया दिन-ब-दिन खराब होता गया। बात-बेबात उनके साथ मार-पीट की जाने लगी। उनका घर, बचत, सब कुछ हथिया लिया गया।नेपाल के एक रूढ़िवादी हिंदू परिवार में जन्मी राम देवी तामांग 20 साल की थीं, जब उनका विवाह प्रेम लामा के साथ हुआ। प्रेम एक गैर-सरकारी संगठन में काम करते थे और तामांग टेलरिंग का छोटा-मोटा कारोबार चलाती थीं। नेपाल जैसे देश में, जहां औरतों के लिए काम-काज के मौके बहुत सीमित हैं, तामांग के कारोबार की वजह से घर में खुशियों की भरपूर आमद थी। जिंदगी खुशगवार थी और पति-पत्नी, दोनों एक-दूसरे का दामन थामे बेहतर कल के सपने बुनने में जुटे थे। 

शादी के एक साल बाद ही एक बेटी ने जन्म लेकर तामांग और प्रेम को मां-बाप के एहसास से आबाद कर दिया था। वे दोनों लगभग रोज इसके लिए अपने ईष्टदेव का धन्यवाद करते। जिंदगी रफ्ता-रफ्ता अपना सफर तय करती रही। इस बीच उन्हें एक और बेटी की खुशी नसीब हुई। मगर एक अनहोनी ने उनकी तमाम खुशियों को ग्रहण लगा दिया। प्रेम एक मोटरसाइकिल दुर्घटना में मारे गए। तामांग की पूरी दुनिया उजड़ गई। इस विपदा में जिन लोगों से उन्हें साथ और सहारे की सबसे अधिक उम्मीद थी, वहीं से उन्हें तोहमत और जिल्लत मिली। ससुराल वाले प्रेम की मौत के लिए उन्हें कमनसीब ठहराने लगे। तामांग कहती हैं, ‘उन्होंने मुझे अपने पति को खा जाने वाली कहा। वे यहीं तक नहीं रुके। मुझे  लगातार कोसते रहे कि अगर मैं गांव में रही, तो सभी पुरुषों को खा जाऊंगी।’

जिस दिन तामांग विधवा हुईं, उस दिन उन्होंने सिर्फ अपना पति नहीं खोया, बल्कि अपना सब कुछ गंवा दिया। ससुराल वालों का रवैया दिन-ब-दिन खराब होता गया। सबसे पहले उन्होंने तामांग से उनका टेेलरिंग का कारोबार छीना। फिर बात-बेबात उनके साथ गाली-गलौज और मार-पीट की जाने लगी। उनका घर, बचत, सब कुछ हथिया लिया गया। सामाजिक रूढ़ि के कारण उनका अपना परिवार भी उनके साथ खड़ा नहीं हुआ, क्योंकि यह रवायत भी थी कि  विधवा होने के बाद कोई लड़की अपने पिता के घर नहीं लौट सकती थी।

नेपाल के पारंपरिक हिंदू समाज में आज भी एक विधवा स्त्री पर तरह-तरह की बंदिशें लागू हैं। मसलन, वे पुनर्विवाह नहीं कर सकतीं, लाल कपडे़ नहीं पहन सकतीं और न ही कोई आभूषण धारण कर सकती हैं। उन्हें शाकाहारी भोजन ही करना पड़ता है और वे किसी धार्मिक-मांगलिक कार्य में भी हिस्सा नहीं ले सकतीं। एक तरह से वे बहिष्कृत जीवन जीने को बाध्य हैं। तामांग को जल्द ही एहसास हो गया कि इस घुटन भरी जिंदगी से मुक्ति के लिए उन्हें अपने पति का गांव छोड़ कहीं और ठिकाना ढूंढ़ना होगा।

वे नेपाल के उथल-पुथल भरे दिन थे। देश आंतरिक संघर्ष के चक्रव्यूह में फंसा था। तामांग को अपनी दो बच्चियों के भविष्य की चिंता खाए जा रही थी। वह उन्हें पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाना चाहती थीं। अंतत: उन्होंने अपनी दोनों बच्चियों के साथ पति का गांव छोड़ दिया और काठमांडू से करीब 25 किलोमीटर पूरब स्थित बनेपा गांव में आ गईं। वह अपने साथ सिर्फ तीन सिलाई मशीन लेकर आईं। उनके लिए वे बेहद मुश्किल भरे दिन थे। दो छोटी बच्चियों की देखभाल के साथ उन्हें अपनी आजीविका का आधार तलाशना था। तामांग को अपने हुनर पर यकीन था। उन्होंने सिलाई का काम शुरू किया। साथ ही, वह घर में अचार बनाकर बेचने लगीं। आहिस्ता-आहिस्ता जिंदगी पटरी पर लौट आई। बेटियां स्कूल जाने लगीं।

लेकिन विधवा होने के बाद तामांग के भीतर कुछ दरक गया था। एक टीस थी, जो मुसलसल उन्हें बेधती रही। आखिर पति के रहते जिस परिवार और समाज से उन्हें मान-सम्मान मिलता रहा, वह एकाएक नफरत में क्यों बदला? वह भी तब, जब पति की मौत में उनकी कोई गलती न थी। उन्होंने बेवा औरतों को बदनसीब समझने वाली सोच से टकराने का फैसला किया। पूरे नेपाल में लाखों की संख्या में विधवाएं अभिशप्त जिंदगी जीने को मजबूर थीं।

तामांग अब विधवाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाने लगीं, उनके सशक्तीकरण के लिए उन्हें दस्तकारी और दूसरे तमाम तरह के हुनर सीखने को प्रेरित करने लगीं। वह कहती हैं, ‘औरतों ने ही बुरे वक्त में मेरा साथ दिया। मैं जिस तकलीफ से गुजर चुकी हूं, उससे उन्हें उबारना चाहती हूं। इसलिए मैं उन्हें प्रोत्साहित करती हूं कि वे हुनरमंद बनें। पैसे तो आते-जाते रहते हैं, मगर हुनर हमेशा आपके साथ रहता है।’

सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ते हुए तामांग ने लाल लिबास और आभूषण पहनने शुरू कर दिए। समुदाय के लोग उनसे बार-बार कहते रहते थे कि वह सियासत में उतरें, क्योंकि उनकी बातों का असर लोगों पर होता है। तामांग को भी एहसास हुआ कि शायद इस तरह वह विधवाओं की बेहतर खिदमत कर सकेंगी। साल 2017 में नामोबुद्धा म्युनिसिपैलिटी के डिप्टी मेयर का चुनाव उन्होंने सीपीएन (यूएमएल) के टिकट पर लड़ा और चुनाव में फतह हासिल की। जिस महिला को कभी उनके समाज ने अभागिन कहकर अपमानित किया था, आज वह उनकी किस्मत से रश्क करता है।

प्रस्तुति :  चंद्रकांत सिंह

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  • Web Title:hindustan jeena isi ka naam h column on 8 September