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महिलाओं के साथ यौन हिंसा रुकनी चाहिए

डेनिस मुकवेगे, नोबेल पुरस्कार विजेता

वह 1960 का दशक था। अफ्रीकी देश कांगो भीषण हिंसा के दौर से गुजर रहा था। हाल में ही वह आजाद हुआ था। इसके बाद मुल्क में तबाही का लंबा दौर चला। जातीय संघर्ष में वहां एक लाख से ज्यादा लोग मारे गए। हजारों परिवार बेघर हुए। सबसे ज्यादा कहर महिलाओं और बच्चों पर टूटा। 

डेनिस मुकवेगे तब पांच साल के थे। नौ भाई-बहनों में वह तीसरे नंबर पर थे। पिताजी धार्मिक सेवा से जुड़े थे। वह रोज सुबह-शाम चर्च में घायलों के लिए प्रार्थना करते थे। डेनिस ने बचपन से दर्द का माहौल देखा। परिवार में अक्सर इस मुद्दे पर बात होती थी। हर कोई चाहता था कि हिंसा रुके, पर किसी को नहीं पता था कि यह कैसे होगा और कब होगा?

कांगो में रोजाना लोग मारे जा रहे थे। घायलों की संख्या बहुत अधिक थी और इलाज करने वाले डॉक्टर बहुत कम। नन्हे डेनिस दर्द से कराहते लोगों को देखकर रो पड़ते थे। वह घायलों की मदद करना चाहते थे, इसलिए तय किया कि बड़े होकर डॉक्टर बनेंगे। पिताजी ने उनका उत्साह बढ़ाया। 28 साल की उम्र में उन्होंने मेडिकल डिग्री हासिल की और बुकावू सिटी में बच्चों का इलाज करने लगे। उन्होंने जान-बूझकर शहर से दूर ग्रामीण इलाके में प्रैक्टिस शुरू की, ताकि गांव के लोगों को आसानी से इलाज मिल सके।

यह 1980 का दशक था। कांगो में जातीय संघर्ष अब भी जारी थे। कबायली गुट एक-दूसरे पर हमले कर रहे थे। तानाशाही हुकूमत हिंसा रोकने में नाकाम थी। गृह युद्ध का चेहरा अब बहुत भयावह हो चुका था। विरोधी गुट बदले की भावना से दूसरे समुदाय की महिलाओं का बलात्कार करते थे। आए दिन अस्पताल में यौन हिंसा से पीड़ित महिलाएं इलाज के लिए आती थीं। डेनिस कहते हैं, दुश्मन गुट बदला लेने के लिए उनके साथ हैवानियत की सारी हदें पार कर रहे थे। उनका दर्द मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता। गर्भवती महिलाओं के इलाज की भी कोई व्यवस्था नहीं थी।

यौन हिंसा से पीड़ित महिलाओं की सर्जरी के लिए विशेषज्ञ महिला डॉक्टरों की जरूरत थी। उन दिनों कांगो में इस तरह की विशेषज्ञ नहीं थीं। डेनिस ने तय किया कि वह महिलाओं का इलाज करेंगे। स्त्री रोग और प्रजनन में विशेष ट्रेनिंग के लिए 1989 में वह फ्रांस गए। यूनिवर्सिटी ऑफ एंजर्स से ट्रेनिंग लेने के बाद स्वदेश लौटे। इसके बाद वह यौन हिंसा से पीड़ित महिलाओं का इलाज करने लगे। इस बीच 1996 में कांगो में फिर गृह युद्ध छिड़ गया। डेनिस को लगा, अब उन्हें बड़ा अस्पताल खोलना चाहिए, जहां ज्यादा से ज्यादा मरीजों को इलाज मिल सके। डेनिस ने 1999 में बुकावू में अस्पताल खोला। इस काम में एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने उनकी मदद की। 

अस्पताल में पीड़ितों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि उन्हें रोजाना 18 घंटे से भी ज्यादा काम करना पड़ता था। उन्होंने हजारों महिलाओं को मौत के मुंह से बाहर निकाला। लोग उन्हें सुपरमैन कहने लगे। इलाज करने के साथ ही डेनिस ने तमाम नए डॉक्टरों को ट्रेनिंग देनी भी शुरू की। वह जानते थे कि हालात सुधारने के लिए देश में हिंसा रोकनी होगी। वह खुलकर यौन हिंसा के खिलाफ भी बोलने लगे। उन्होंने सरकार से मांग की कि वह यौन हिंसा के खिलाफ सख्त कदम उठाए। 2012 में संयुक्त राष्ट्र में उन्होंने अपने भाषण में कांगो सरकार की निंदा करते हुए कहा कि बलात्कार के मामले पर सरकार का चुप रहना गलत है। इससे अपराधियों को बढ़ावा मिल रहा है।

सरकार के खिलाफ बोलना उन्हें महंगा पड़ा। इस भाषण के कुछ दिनों के बाद ही हत्या के इरादे से उनके घर पर हमला किया गया। उस समय वह घर पर नहीं थे। मगर हमलावरों ने उनकी बेटियों को बंधक बना लिया, और जब वह घर लौटे, तो उन पर गोलियां चलाई गईं। किसी तरह दीवार फांदकर उन्होंने अपनी जान बचाई। जान तो बच गई, पर संदेश साफ था कि वह यौन हिंसा पर बोलना बंद करें। डेनिस को चुप रहना मंजूर नहीं था। वह परिवार के साथ बेल्जियम चले गए। पर मरीजों को उनकी जरूरत थी। तमाम मरीजों ने चंदा करके उनकी वापसी का हवाई टिकट बुक कराया और उनसे लौट आने का आग्रह किया। 14 जनवरी, 2013 को वह स्वदेश लौटे।

उनके स्वदेश लौटने का नजारा अद्भुत था। सैकड़ों महिलाएं उनके स्वागत में खड़ी थीं। ये वो महिलाएं थीं, जिनका उन्होंने इलाज किया था। उन्हें देखते ही वे रोने लगीं। लोग चिल्लाने लगे, हमें सेना नहीं, डॉक्टर चाहिए। यह नजारा देख डेनिस भावुक हो गए। उन्होंने कहा, एक दिन अंधकार जरूर मिटेगा। हमें हिंसा का जवाब प्यार से देना होगा। जान की परवाह किए बगैर  वह मरीजों की सेवा में फिर जुट गए। डेनिस के अस्पताल में अब तक यौन हिंसा से पीड़ित 85,000 महिलाओं की सर्जरी हो चुकी है। कांगो में उन्हें ‘डॉक्टर मिरेकल’ के नाम से जाना जाता है। पिछले सप्ताह ही उन्हें नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गई। प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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  • Web Title:Dennis Mukewege article in Hindustan