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इनाम के पैसे से कर्ज चुकाऊंगी

एना बर्न्स, बुकर अवॉर्ड विजेता

एना बर्न्स का जन्म आयरलैंड के शहर बेलफास्ट में हुआ। सात भाई-बहनों वाले संयुक्त परिवार में वह पली-बढ़ीं। परिवार में माता-पिता के अलावा एक अविवाहित बुआ भी संग रहती थीं। एना की शुरुआती पढ़ाई सेंट जेम्स हाईस्कूल में हुई। बचपन से ही उन्हें किताबें पढ़ने का बड़ा शौक था। काफी वक्त लाइब्रेरी में बीत जाता था। वह 1970 का दशक था। उत्तरी आयरलैंड में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल था। उन दिनों आस-पास कुछ ऐसी घटनाएं हो रही थीं, जिनको लेकर एना काफी असहज थीं। उन्होंने कभी इन मुद्दों पर किसी से बात नहीं की, पर उनके मन में बड़ी तड़प थी। वह लोगों से पूछना चाहती थीं कि यह सब क्यों हो रहा है? मुश्किल यह थी कि परिवार में कोई इस पर चर्चा करने को तैयार नहीं था। लिहाजा वह चुप रहीं।

यह 1987 की बात है। 25 साल की उम्र में एना ब्रिटेन आ गईं। परदेस में रहकर भी दिल अपने वतन में बसा था। शुरुआत में बचपन के दोस्त और घरवाले बहुत याद आते थे। फिर नए दोस्त बन गए। जिंदगी बदलने लगी। आयरलैंड छोड़ने से पहले उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि लेखिका बनेंगी। पर लंदन में ऐसे दोस्त मिले, जो लेखन में दिलचस्पी रखते थे। उनसे प्रेरित होकर वह क्रिएटिव राइटिंग की क्लास में जाने लगीं। पहली बार जब कॉपी-पेन लेकर लिखने बैठीं, तो अपने देश के तमाम किस्से ताजा हो गए। ऐसा लगा, जैसे सब कुछ कल ही घटा हो। वह उन यादों को पन्नों पर उतारने लगीं।

उनका पहला उपन्यास नो बोन्स  2001 में प्रकाशित हुआ। इसमें बेलफास्ट सिटी की एक लड़की की कहानी थी। उपन्यास की काफी तारीफ हुई। इसके लिए उन्हें ‘विनिफ्रेड हॉल्टबाय मेमोरियल प्राइज’ दिया गया। किताब से उन्हें शोहरत तो बहुत मिली, पर कमाई खास नहीं हुई। वह जल्द ही दूसरी किताब लिखना चाहती थीं, पर समय नहीं था। रोजाना के खर्चे पूरे करने के लिए उन्हें कई जगह नौकरी करनी पड़ी। छह साल बाद यानी 2007 में उनका दूसरा उपन्यास लिटिल कन्स्ट्रक्शंस  प्रकाशित हुआ। इसे भी काफी पसंद किया गया।

इस बीच उनकी पीठ में भयानक दर्द रहने लगा। आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी। इलाज काफी महंगा था। एना कहती हैं, लेखकों की ज्यादा कमाई नहीं होती है। मुझे लगता है कि ज्यादातर लेखक आर्थिक तंगी में ही जीवन गुजारते हैं। मुझे लिखना पसंद था, पर जीवन चलाने के लिए बीच-बीच में लेखन से ब्रेक लेना पड़ा। वह उनके जीवन का काफी मुश्किल दौर था। एक ऐसा वक्त भी आया, जब उनके पास खाने तक के पैसे नहीं थे। उनका संघर्ष जारी रहा। एना अपने लिए एक छोटा सा घर खरीदना चाहती थीं, जहां वह सुकून से बैठकर लेखन कर सकें। एक सामाजिक संस्था ने उन्हें घर खरीदने के लिए सस्ता कर्ज दिया। फूड बैंक नाम की संस्था ने भी उनकी मदद की।

सात साल बाद 2014 में उन्होंने फिर से लेखन शुरू किया। तीसरे उपन्यास का शीषर्क था मिल्कमैन। यह एक किशोर लड़की की कहानी है। उसे एक उम्रदराज आदमी से प्यार हो जाता है। वह आदमी परिवार का करीबी है। रिश्तों और सियासी धमक के बल पर वह लंबे समय तक उस लड़की का यौन उत्पीड़न करता है। उपन्यास में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि किस तरह एक मासूम लड़की परिस्थितिवश यौन उत्पीड़न सहने को मजबूर हो जाती है। यह किताब एना के अनुभव पर आधारित है। मिल्कमैन  में उन्होंने उन हालात को बयां किया है, जो उन्होंने 70 के दशक में आयरलैंड में देखे थे। करीब तीन साल लगे उपन्यास को पूरा होने में। इस दौरान पीठ दर्द की वजह से उनका बैठना मुश्किल हो गया। एना कहती हैं, पीठ का दर्द असहनीय था। मेरे लिए बैठकर लिखना बड़ा कठिन था। मुझे लग रहा था कि मैं यह किताब पूरी नहीं कर पाऊंगी। 

किताब पूरी होने के बाद वह कई प्रकाशकों के पास गईं। कई ने किताब के विषय को खारिज करते हुए इसे छापने से मना कर दिया। मगर वह निराश नहीं हुईं। आखिरकार एक प्रकाशक तैयार हो गया। मिल्कमैन  उपन्यास की खास बात यह है कि इसमें किसी पात्र का नाम नहीं दिया गया है। यहां पात्रों के नाम की जगह उनके पदनाम दिए गए हैं। एना कहती हैं, पात्रों के नाम लिखने से कई बार कहानी कमजोर हो जाती है। यह मेरा लिखने का स्टाइल है। मैं इसे आगे भी जारी रखूंगी। पिछले सप्ताह मिल्कमैन  के लिए उन्हें बुकर प्राइज से सम्मानित किया गया। बुकर अवॉर्ड पाने वाली वह आयरलैंड की पहली महिला हैं। इस अवॉर्ड की दौड़ में अमेरिका के रिचर्ड पावर और कनाडा के ए सी एडुगन जैसे मशहूर लेखक भी शामिल थे।

दार्शनिक और अवॉर्ड पैनल के जज क्वाम एंथनी कहते हैं, भले ही मिल्कमैन  की कहानी 40 साल पुराने घटनाक्रम पर आधारित है, पर मौजूदा ‘मी टू’ के दौर में यह कहानी बहुत प्रासंगिक प्रतीत होती है। मुझे लगता है कि एना का उपन्यास पूरी दुनिया को महिलाओं के दर्द के बारे में सोचने को मजबूर करेगा। प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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  • Web Title:Booker Award winner Anna Burns article in Hindustan on 21 october