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कभी शरणार्थी थे, अब मंत्री हैं

अहमद हुसैन, कनाडा के आव्रजन मंत्री 

अफ्रीकी देश सोमालिया में जन्मे हुसैन का बचपन भीषण दुश्वारियों में बीता। यह 70 के दशक की बात है। उन दिनों मुल्क में घोर निराशा का माहौल था। सियासी अस्थिरता और गरीबी के चलते जनता बदहाल थी। कबीलों की आपसी लड़ाई और सेना के साथ उनका संघर्ष बढ़ता गया। 80 के दशक में यह संघर्ष चरम पर पहुंच गया और 1990 में पूरे देश में गृह युद्ध छिड़ गया। हुसैन तब 12 साल के थे। 

उनका परिवार राजधानी मोगादीशू में रहता था। पिता जी ट्रक चलाते थे। उनकी कमाई छह बच्चों का पेट भरने के लिए काफी नहीं थी। उन दिनों सोमालिया में चारों तरफ मारकाट मची थी। बंदूकें खामोश होने का नाम नहीं ले रही थीं। रोजाना सैकड़ों लोग मारे जा रहे थे। हुसैन का परिवार दहशत में था। हर पल मौत का खतरा था। कबीलाई गुटों के साथ ही सेना का आतंक भी बढ़ रहा था। देश में भयानक भुखमरी थी। देखते-देखते पूरा देर्श ंहसा की चपेट में आ गया। मुल्क का एक भी कोना ऐसा नहीं बचा था, जहां लोग जान बचाकर भाग सकें। हर तरफ दहशत का माहौल था। हुसैन का परिवार भी भागा। उन्हें केन्या में शरण मिली। 

केन्या में उन दिनों भारी संख्या में सोमालियाई शरणार्थी थे। उन्हें भी एक शरणार्थी शिविर में जगह मिल गई। वहां जान का खतरा नहीं था, पर हालात अच्छे नहीं थे। शरणार्थियों की तुलना में संसाधन काफी कम थे। जैसे-तैसे गुजारा होने लगा। शुरुआत में उन्हें लगा था कि हालात सामान्य होते ही वे अपने मुल्क लौट जाएंगे। पर समय के साथ यह उम्मीद धूमिल होती गई। अक्सर उन्हें सोमालिया की खबरें सुनने को मिलती थीं। लोग रेडियो पर खबरें सुनकर चर्चा करते थे। अखबारों में भुखमरी से मर रहे लोगों की तस्वीरें छपती थीं। आए दिन धमाकों और फार्यंरग में लोग मारे जा रहे थे। किसी को हालात सुधरने की उम्मीद नहीं थी। 

हुसैन का परिवार समझ चुका था कि अब उन्हें कभी स्वदेश लौटने का मौका नहीं मिलेगा। पर सवाल था शरणार्थी कैंप में कब तक रहेंगे? जाहिर है, कैंप में पूरा जीवन तो नहीं गुजारा जा सकता। वहां जीवन सुरक्षित था। दो वक्त का खाना भी मिलता था, पर भविष्य नहीं था। लोग अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते थे, ताकि आगे चलकर वे अच्छी जिंदगी जी सकें। शरणार्थी कैंप में कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां राहत-कार्य में जुटी थीं। तमाम शरणार्थी बेहतर भविष्य की तलाश में कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का रुख करने लगे। शरणार्थी कैंप में रहते हुए दो साल बीत गए। इस बीच हुसैन के दो चचेरे भाई कनाडा जाने में सफल रहे। अब हुसैन की बारी थी। उस समय वह 16 साल के थे। माता-पिता ने किसी तरह हवाई जहाज के टिकट का इंतजाम किया। राहत-कार्य में जुटी एजेंसियों ने भी उनकी मदद की। परदेस जाने के नाम पर वह घबरा गए। समझ में नहीं आ रहा था कि नए मुल्क में उनके साथ कैसा व्यवहार होगा? पर माता-पिता ने सुनहरे भविष्य का हवाला देकर उन्हें कनाडा जाने के लिए राजी कर लिया। 
हुसैन 1992 में कनाडा पहुंचे। कुछ दिन चचरे भाई के संग हेमिल्टन शहर में रहे। सेकेंडरी क्लास में दाखिला लिया। यहां सबसे बड़ी दिक्कत भाषा की थी। अंग्रेजी नहीं आने की वजह से वह किसी से बात नहीं कर पाते थे। स्कूल में भी सहमे-सहमे रहते। हर समय लगता सब उन्हें घूर रहे हैं। हुसैन कहते हैं, कनाडा की धरती पर कदम रखा, तो मन में आशंका थी। क्या यह देश मुझे अपनाएगा? क्या मैं यहां का हो पाऊंगा? मन में घबराहट थी। पर समय के साथ सब ठीक हो गया। उन्होंने अंग्रेजी सीखने के लिए दिन-रात एक कर दिया। धीरे-धीरे स्कूल के बच्चों के संग उनकी दोस्ती हो गई। यहां का माहौल शरणार्थी कैंप से बिल्कुल अलग था। यहां बेहतर भविष्य की उम्मीद थी। स्कूल फीस का इंतजाम करने के लिए वह पास के गैस स्टेशन पर पार्ट-टाइम काम करने लगे। दिन में पढ़ाई करते और रात में नौकरी। अब एक ही लक्ष्य था उनका, कुछ करके दिखाना है। 

हुसैन को कनाडा रास आ चुका था। अब वह यहां से लौटकर नहीं जाना चाहते थे। पर मन में डर था कि वह इस देश के नहीं हैं। उन्हें वापस जाने को कहा गया, तो क्या करेंगे? पढ़ाई के साथ ही वह नागरिकता पाने की कोशिश में जुट गए। तमाम कानूनी अड़चनों की वजह से नागरिकता मिलने में देरी हुई। 2002 में उन्होंने यॉर्क यूनिवर्सिटी से इतिहास में स्नातक की डिग्री हासिल की। बाद में ओटावा यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की। प्रवासी होने के कारण आव्रजन संबंधी कानून में उनकी गहरी दिलचस्पी थी, इसलिए उन्होंने आव्रजन और क्रिमिनल लॉ में स्पेशलाइजेशन किया। वह प्रवासी नागरिकों की निशुल्क मदद करने लगे। उन्होंने प्रवासी मुद्दों पर सरकार के साथ मिलकर काम किया। इस बीच वह राजनीति में सक्रिय हो गए। 2015 में यार्क साउथ वेस्टर्न से सांसद चुने गए। उन्हें कनेडियन सोमाली कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। पिछले साल वह कनाडा सरकार में आव्रजन, शरणार्थी और नागरिकता विभाग के मंत्री बने। प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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  • Web Title:Ahmed Hussein article in Hindustan on 27 May