वक्त की नजाकत समझें भारत और चीन

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बीजिंग और नई दिल्ली से मिल रहे संकेत स्पष्ट हैं। साल 2020 में गलवान झड़प के बाद रिश्तों में जो कड़वाहट आई थी, उसे भुलाकर अब दोनों देश नए सिरे से आगे बढ़ने को तैयार दिख रहे हैं। बेशक, अमेरिका की इस पर पैनी नजर है…

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जोरावर दौलत सिंह,इतिहासकार और रणनीतिकार

बीजिंग और नई दिल्ली से मिल रहे संकेत स्पष्ट हैं। साल 2020 में गलवान झड़प के बाद रिश्तों में जो कड़वाहट आई थी, उसे भुलाकर अब दोनों देश नए सिरे से आगे बढ़ने को तैयार दिख रहे हैं। बेशक, अमेरिका की इस पर पैनी नजर है, मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पिछले साल अक्तूबर में कजान शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात करके इसका रास्ता काफी हद तक तैयार कर दिया था।

संबंधों में गिरावट दरअसल कई ऐतिहासिक कारकों का नतीजा थी। मसलन, अमेरिका-केंद्रित एकध्रुवीय व्यवस्था से बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था की ओर बढ़ती वैश्विक सत्ता-संरचना, शक्ति के इस बदलते संतुलन को आकार देने के लिए अमेरिका व यूरेशियाई ताकतों के बीच तेज संघर्ष, और इस भू-राजनीतिक व्यवस्था का भारत-चीन संबंधों पर पड़ने वाला परोक्ष प्रभाव।

भारत की बात करें, तो वैश्विक बदलाव के उस दौर में चीन-नीति को लेकर उसकी दुविधा यही रही कि वह अपने इस पड़ोसी देश के खिलाफ आक्रामक रवैया अपनाए या फिर सहनशीलता का परिचय दे। आम तौर पर ऐसी स्थिति में ठीकरा विंस्टन चर्चिल पर फोड़ते हुए कहा जाता है कि कोई राष्ट्र एक ही समय में इन दोनों विकल्पों का एक साथ चयन नहीं कर सकता, बल्कि किसी एक को चुनना उसकी मजबूरी है। लिहाजा, भारत की नीति भी आक्रामकता और सहनशीलता के बीच झूलती रही, जिसका नतीजा यह रहा कि पिछले एक दशक में भू-राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ गई।

अब हमारे क्षेत्रीय रिश्ते पहले से अधिक जटिल हो गए हैं। उत्तरी सीमा पर सैनिकों का जमावड़ा बढ़ गया है, जबकि चीन और पाकिस्तान का सैन्य रिश्ता ऐसा आकार ले चुका है कि वह भू-सामरिक संतुलन को पलटने का माद्दा रखता है। इतना ही नहीं, अमेरिका ने भी भारत को इस उप-महाद्वीप में कमजोर करने और भू-राजनीतिक उठा-पटक के दौर में नई दिल्ली को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया।

यदि यह एक अस्थायी तूफान था, जिसकी नियति गुजर जाने की थी, तो अब इस दौर का लाभ उठाना हमारे लिए रणनीतिक रूप से मुफीद है। हालांकि, भारत द्वारा अभूतपूर्व आर्थिक, तकनीकी और सैन्य बदलाव किए जा रहे हैं, लेकिन इससे पुरानी विश्व-व्यवस्था खुद-ब-खुद साकार नहीं हो सकती। वास्तव में, यह वक्त धीमे पड़ गए प्रयासों को नई गति देने और भू-राजनीतिक खतरों से पार पाने का है, ताकि भारत की बढ़ती ताकत को दुनिया देख सके।

क्या हम चीन-नीति को इस तरह गढ़ सकते हैं कि हमारे लिए कहीं अधिक अनुकूल रणनीतिक माहौल का निर्माण हो सके?

इस संबंध में हमें इतिहास से सबक लेना चाहिए। एक-दूसरे से होड़ ले रहे देशों ने तमाम संघर्षों के बाद आखिरकार दोस्ती पर ही जोर दिया। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है, 1970 के दशक में अमेरिका और चीन के रिश्तों में आई नरमी या 1980 के दशक में चीन और सोवियत संघ का तालमेल। दोनों ही मामलों में, आक्रामक रुख के कारण आपसी विश्वास को आगे बढ़ाना मुश्किल हो गया था।

क्या आज भारत-चीन रिश्ते को लेकर भी यही कहा जा सकता है? निस्संदेह, कोई भी ऐसा प्रभावी बाहरी कारक या बल नहीं है, जो इन दोनों को तनाव खत्म करने के लिए प्रेरित कर सके। यह समझना अनिवार्य है कि बहुध्रुवीय व्यवस्था में दोनों का व्यावहारिक फायदा है, पर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को लेकर अब भी दोनों देशों की सोच इतनी परिपक्व नहीं है कि ऐसी व्यवस्था को लेकर वे साझा संवाद कर सकें। फिर, महत्वपूर्ण यह भी है कि बाह्य संतुलन को लेकर भारत के सीमित विकल्पों के बावजूद भौतिक विषमता दोनों देशों के बीच किसी बड़े सौदे को साकार नहीं कर सकती।

बेशक, न तो अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन जैसी राजनीतिक मुश्किलें आज सामने हैं और न ही देंग शियाओपिंग जैसा क्रांतिकारी नेता हमारे पास हैं, जो नए वैश्विक परिदृश्य में भारतीय व्यवस्था को नए सिरे से परिभाषित कर सकें। हमें नहीं भूलना चाहिए कि देंग ने आक्रामकता की जगह संयम को अहमियत दी थी और तमाम चुनौतियों के बावजूद तीन दशकों से अधिक समय तक अपनी इस नीति को राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बनाए रखा। जाहिर है, आपसी संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयास तो हो रहे हैं, लेकिन एक वृहद नजरिये के बिना। ऐसे में, चीन-नीति से जुड़े तीन मसले नजर आते हैं।

पहला, एशिया में अमेरिका के नेतृत्व वाली सुरक्षा व्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ बनने का भारत का अघोषित लक्ष्य व्यावहारिक नहीं है। इसके कारण हैं- अमेरिका का अब वैसा दबदबा नहीं रहा, उप-महाद्वीप से बाहर सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए अतिरिक्त ताकत का हमारे पास अभाव है और अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधनों में शामिल होने से संप्रभुता और भू-राजनीतिक नियंत्रण, दोनों मोर्चों पर हमें बड़ा नुकसान हो सकता है। फिर, पश्चिम के देश भारत के इस विचार से भी इत्तफाक नहीं रखते कि आजाद भारत को शामिल करने के लिए उनके गठबंधनों को नया रूप देना चाहिए।

दूसरा, परस्पर निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए अब नव-उदारवाद के बाद के नियम गढ़े जा रहे हैं। बेशक, प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं इसे बनाएंगी, पर भारत के पास तरकश में अब भी कई तीर हैं। बाजार क्षमता, मानव पूंजी और औद्योगिक बुनियादी ढांचे जैसी परिसंपत्तियां भारत के पास हैं और वह चाहे, तो चीन के साथ पारस्परिक रूप से लाभदायक आर्थिक संबंधों के आधार पर बातचीत कर सकता है। यहां दरवाजे को पूरी तरह से खोलने की जरूरत है, व्यापकता के साथ। यदि यह ठीक से किया जाए, तो ब्रिक्स जैसी बहुपक्षीय व्यवस्थाओं को अधिक ठोस रूप दिया जा सकता है, जो भारत और क्षेत्र, दोनों के लिए फायदेमंद होगा।

तीसरा, आपसी मतभेदों के बावजूद, भारत और चीन, दोनों के हित भू-राजनीतिक स्थिरता में छिपे हुए हैं। बेशक, दोनों के बीच कोई बड़ी सौदेबाजी नहीं हो सकती, लेकिन क्षेत्र में अपनी अलग-अलग नीतिगत प्राथमिकताओं और भू-राजनीतिक भूमिकाओं को स्वीकार करते हुए दोनों देश कुछ हद तक आम राय बना सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो उनको एक-दूसरे को यह मौका देना चाहिए कि वे अपनी भू-राजनीतिक व सामाजिक-आर्थिक प्राथमिकताओं को पूरा कर सकें।

आशा हैै कि रविवार को जब शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन की शुरुआत होगी, तो मोदी व जिनपिंग में बातचीत का यह शुरुआती बिंदु बनेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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