Hindi Newsओपिनियन hindustan opinion column 21 November 2025
आतंक पर अमेरिका जैसी सख्ती कीजिए

आतंक पर अमेरिका जैसी सख्ती कीजिए

संक्षेप:

दिल्ली में लाल किले के पास हुए कार विस्फोट ने पूरे देश को झकझोर दिया था और सरकार द्वारा इसे आतंकी घटना बताए जाने के बाद यह बेहद संवेदनशील मुद्दा बन गया हैं। ऐसी घटनाओं के बाद विभिन्न पक्षों द्वारा उल-जुलूल बातें फैलाई जाने लगती हैं….

Nov 20, 2025 11:28 pm ISTHindustan लाइव हिन्दुस्तान
share Share
Follow Us on

आर के राघवन,पूर्व निदेशक, सीबीआई

दिल्ली में लाल किले के पास हुए कार विस्फोट ने पूरे देश को झकझोर दिया था और सरकार द्वारा इसे आतंकी घटना बताए जाने के बाद यह बेहद संवेदनशील मुद्दा बन गया हैं। ऐसी घटनाओं के बाद विभिन्न पक्षों द्वारा उल-जुलूल बातें फैलाई जाने लगती हैं। लेकिन इस बार मीडिया ने जिस तरह से निष्पक्ष होकर तथ्यों पर आधारित कवरेज की, इसके लिए उसकी सराहना की जानी चाहिए। यही सबसे अच्छा तरीका है, जिससे हम आतंक के खिलाफ जनमत बना सकते हैं और आतंकवाद विरोधी जंग में अपनी सुरक्षा एजेंसियों को समर्थन देने के लिए पूरे समाज को प्रेरित कर सकते हैं।

कार धमाके की पूरी योजना के साथ आत्मघाती उमर उन-नबी के वीडियो के सार्वजनिक होने के बाद अनेक लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि प्रतिष्ठित पेशेवरों (डॉक्टरों) का यह समूह इतना कट्टरपंथी बन गया था कि आतंकी हमले को अंजाम देने तक गिर गया? इस मामले में अब तक हुए खुलासे व पकड़े गए संदिग्धों की पृष्ठभूमि यह साफ बताती है कि जब धार्मिक कट्टरता और नफरत की बात आती है, तब कुछ और मायने नहीं रखता। साजिश करने वालों ने अपनी योजना को कैसे अंजाम दिया, या कम से कम उसका हिस्सा बने, इसकी एक अलग कहानी है। सबसे खास बात यह है कि देश भर में फैली हमारी सुरक्षा एजेंसियों की नजर में ये नहीं आ पाए।

कुछ लोग पूछ रहे हैं कि सुरक्षा की दृष्टि से कोई चूक तो नहीं रह गई थी? हमें समझना चाहिए कि इतने बड़े देश में पुलिस-तंत्र की चुनौतियां कितनी गंभीर किस्म की हैं। साथ ही दिल्ली जैसी मिली-जुली सामाजिक संरचना वाली राष्ट्रीय राजधानी में लोगों के आने-जाने पर नजर रखना लगभग नामुमकिन है। ऐसे में, कानून लागू करने वाली एजेंसियों की आलोचना करना गलत है, बल्कि उन्होंने इतनी जल्दी पूरी साजिश को बेनकाब करने का सराहनीय काम किया है। सुरक्षा-तंत्र की तारीफ होनी चाहिए कि उसने घटना में शामिल लोगों और जिम्मेदार ‘टेरर मॉड्यूल’ के बीच संबंधों का पता लगा लिया। निस्संदेह, सुरक्षा एजेंसियों द्वारा की गई गहन जांच और उनके अत्याधुनिक उपकरणों ने एजेंसियों को तार जोड़ने में बहुत मदद की है। पहले पुलिस-जांच में टेक्नोलॉजी को शामिल करने में बड़ी हिचकिचाहट होती थी। खासकर, इसलिए कि एजेंसियों को डर लगता था कि वे इसका सही-सही इस्तेमाल कर भी पाएंगी या नहीं और इसके लिए कितनी ट्रेनिंग की जरूरत होगी। मगर अगले दशकों में टेक्नोलॉजी पुलिस जांच में निर्णायक बनने जा रही है।

दिल्ली विस्फोट की वारदात बताती है कि कट्टर आतंकवादी, खासकर पाकिस्तान से खुराक लेने वाले आतंकी भारत के लिए परेशानी बने रहेंगे। यह सोचना बहुत मुश्किल है कि वह वक्त कब आएगा, जब आतंकवादियों की भर्ती बंद हो जाएगी या बिना सोचे-समझे हिंसा करना बेकार हो जाएगा। इसलिए निरंतर सतर्कता की दरकार है।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर और अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के कार्यकाल में विशेष अधिकारी रहे सैमुअल हंटिंगटन ने अपने लेख, ‘द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन्स (सभ्यताओं के बीच संघर्ष)’ में आगाह किया था कि धार्मिक कट्टरपंथ किस तरह लगातार टकरावों को बढ़ावा दे रहा है। इसका मतलब है कि कड़े कानून लागू करने और सख्त पाबंदी लगाने जैसे उपायों से समझौता नहीं किया जा सकता, भले ही देश के लोगों को इससे कितनी भी परेशानी और उलझन हो। पहलगाम और अब लाल किले पर हुए हमलों के संदर्भ में लोगों और गाड़ियों की आवाजाही पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।

अमेरिका में 11 सितंबर के आतंकी हमले के बाद दुनिया ने देखा कि मॉल, एयरपोर्ट और शहरों की हर उस जगह की सूची तैयार की गई, जहां ऐसी वारदात होने की आशंका है और फिर वहां कड़ी निगरानी की व्यवस्था लागू की गई है। इस व्यवस्था के खिलाफ लोगों में भारी गुस्सा देखा गया। उनकी नाराजगी न सिर्फ उन नियमों को लेकर थी, जिनके कारण सार्वजनिक जगहों और दफ्तरों में आने-जाने में असुविधा पैदा हो रही थी, बल्कि नस्लीय व धार्मिक भेदभाव को लेकर भी थी। लेकिन उस सख्ती के कारण दुनिया भर में सख्त सुरक्षा दिशा-निर्देशों को मानने का रास्ता बन गया। इसलिए इस तरह के नियमों में किसी किस्म की ढील देना गलत होगा।

सुरक्षा नियमों को लेकर मेरा दृष्टिकोण 21 मई, 1991 को ही बिल्कुल बदल गया था, जब तमिलनाडु के श्रीपेरुंबदुर में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी। उनकी हत्या की जगह से कुछ ही फीट की दूरी पर मैं सुरक्षा तंत्र के हिस्से के तौर पर तैनात था। वह घटना निश्चित रूप से पुलिस और खुफिया मशीनरी की नाकामी थी। मुझे उस शाम एहसास हुआ कि दुश्मनों से बचने के लिए सिर्फ बड़ी संख्या में सुरक्षा बल का होना काफी नहीं है। इसमें सटीक खुफिया सूचनाएं भी बहुत जरूरी हैं। इससे पहले कि आतंकी अपनी तबाही की योजना को अंजाम दे सकें, हमें उनमें से हर एक की पहचान करके उन्हें पकड़ना होगा। लाल किले विस्फोट के मामले में हमारे सामने चुनौती एक चलती हुई गाड़ी की थी। वह एक ऐसा परिदृश्य था, जो पारंपरिक सुरक्षा व्यवस्थाओं से बिल्कुल अलग और नए तरह का था। ऐसे मामलों में, जब तक अपराधी की खास पहचान पहले से न मालूम हो, तो अचूक सुरक्षा रणनीति बनाना काफी कठिन हो जाता है, लेकिन हमें इस कठिनाई को रुकावट नहीं बनने देनी चाहिए।

श्रीपेरुंबुदुर और दिल्ली विस्फोट के अलावा एक और घटना जो मेरे दिमाग में गहरे पैठी है, वह है 11 सितंबर, 2001 को न्यूयॉर्क वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले। उस समय मैं हॉर्वर्ड (बोस्टन) में ही विजिटिंग फेलो के तौर पर था। अल कायदा ने नए तरीके से ट्विन टॉवर्स को गिराने में कामयाबी हासिल की। हममें से कई लोग टीवी सेट के सामने जमा हो गए थे और अमेरिका के सदमे, डर और दुख में शामिल हो गए थे। मेरे लिए इसका असर बहुत करीबी और निजी स्तर का था और वह घटना कड़ी सुरक्षा की जरूरत रेखांकित कर रहा था। उस दिन से लेकर अब तक अमेरिका ने आतंकियों के मनसूबों को सफल नहीं होने दिया, जिनका मुख्य मकसद आतंक फैलाना होता है।

हंटिंगटन का यह सामाजिक सिद्धांत कि दुनिया बहुत ज्यादा बंटी हुई है, आज भी प्रासंगिक है और इससे निपटने के लिए सख्त सुरक्षा तंत्र की आवश्यकता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Hindustan

लेखक के बारे में

Hindustan
हिन्दुस्तान भारत का प्रतिष्ठित समाचार पत्र है। इस पेज पर आप उन खबरों को पढ़ रहे हैं, जिनकी रिपोर्टिंग अखबार के रिपोर्टरों ने की है। और पढ़ें

लेटेस्ट   Hindi News ,    बॉलीवुड न्यूज,   बिजनेस न्यूज,   टेक ,   ऑटो,   करियर , और   राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।

;;;