सेना को ताकतवर बनाती तकनीक

Feb 17, 2026 11:22 pm ISTHindustan लाइव हिन्दुस्तान
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कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसी तकनीक अब सैन्य क्षेत्र में भी पीढ़ीगत बदलाव का वाहक बन गई है। यह सामरिक क्षमताओं को नए सिरे से परिभाषित कर रही है। हम फिलहाल एआई, साइबर, क्वांटम जैसी प्रौद्योगिकी के तूफान से गुजर रहे हैं…

सेना को ताकतवर बनाती तकनीक

राज शुक्ला,लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड)

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसी तकनीक अब सैन्य क्षेत्र में भी पीढ़ीगत बदलाव का वाहक बन गई है। यह सामरिक क्षमताओं को नए सिरे से परिभाषित कर रही है। हम फिलहाल एआई, साइबर, क्वांटम जैसी प्रौद्योगिकी के तूफान से गुजर रहे हैं, जिसकी जद में वैश्विक व्यवस्था और सुरक्षा, दोनों हैं। कैसे? एक उदाहरण से समझाने की कोशिश करता हूं।

यूक्रेन में अमेरिकी एआई कंपनी पैलांटिर ने एआई पर आधारित गोथम कमांड और कंट्रोल सॉफ्टवेयर तैनात किया है, जो सैटेलाइट डाटा, सोशल मीडिया पोस्ट, सैनिकों के ‘वाइड एरिया नेटवर्क’, यानी डब्ल्यूएएन उपकरण, रेडियो फ्रिक्वेंसी आदि सबका विश्लेषण करता है और करीब 1,000 किलोमीटर लंबी उसकी सरहद की रक्षा करता है। यह सुरक्षा तंत्र इस कदर मजबूत है कि सीमा पर कोई भी हरकत हुई, तो घुसपैठिए की पहचान करने से लेकर ढेर करने में उसे सिर्फ छह से सात मिनट का वक्त लगता है। यह एआई तकनीक पर आधारित है और ड्रोन से लैस भी।

भारत में भी इस प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल की मांग गलत नहीं है, खास तौर से नियंत्रण रेखा (एलओसी) और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर। इसके लिए एआई, ड्रोन, थ्रीडी प्रिंटिग, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी आदि सबका ‘कोलाज’ बनाना होगा। यह इसलिए भी जरूरी है कि यदि मैक 6 या मैक 7 की गति से कोई हाइपरसोनिक मिसाइल हमारी सीमा की तरफ बढ़ रही हो, जो एआई की मदद से स्वत: लक्ष्य को नष्ट करने में सक्षम हो, तो मानव संचालित गति से उसका जवाब नहीं दिया जा सकता, बल्कि एआई युक्त उपकरणों से ही हम माकूल जवाब दे सकते हैं।

हम दो विकल्पों की ओर बढ़ सकते हैं। एक, एआई सक्षम तकनीक में इंसान ‘लूप’ में रहे, यानी फैसले लेने की प्रक्रिया में इंसानी दखल हो, और दूसरा- तकनीक में कोई मानवीय हस्तक्षेप न रहे। मेरा मानना है कि जब आक्रमण और बचाव के बीच जंग होती है, तब इंसान अगर जवाबी प्रक्रिया से बाहर रहे, तो प्रतिक्रिया कहीं अधिक तेज हो सकेगी। इससे जवाबी हमले कहीं अधिक मारक और सधे हुए होंगे।

जाहिर है, एआई का फिलहाल कोई दूसरा विकल्प नहीं है। अमेरिका का उदाहरण देखिए। उसने अपने दो कमान चुने- यूनाइटेड स्टेट्स इंडो-पैसिफिक कमांड (इंडोपैकॉम) और यूरोपीय कमान (ईयूकॉम)। इनके लिए उसने लार्ज लैंग्वेज मॉडल बनाने का अनुबंध किया माइक्रोसॉफ्ट के साथ, एजेंटिक एआई का अनुबंध स्केल एआई कंपनी के साथ और डिफ्यूजन एआई का ठेका दिया एंडुरिल कंपनी को। तीनों एआई क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां हैं। इनको कहा गया है कि वे न सिर्फ अमेरिका का, बल्कि दुश्मन देशों के डाटा का भी विश्लेषण करें और सुरक्षा-व्यवस्था को एआई से लैस करें। आज अमेरिका अगर एआई-आधारित सुरक्षा-व्यवस्था में नेतृत्व की भूमिका में है, तो इसकी वजह समझी जा सकती है।

हमारे लिए ऐसा करना क्यों जरूरी है? क्योंकि चीन और पाकिस्तान हमारे ऐसे पड़ोसी हैं, जिन पर भरोसा करना काफी मुश्किल है। हमें अपनी उत्तरी और पूर्वी कमान को एआई से लैस करना ही होगा, जिसके लिए सर्वप्रथम डाटा को सार्वजनिक करना आवश्यक है। अभी हमारी सेना के तीनों अंग (थल सेना, वायु सेना और नौसेना) एक-दूसरे से डाटा साझा नहीं करते, जबकि एआई सक्षम मॉडल तभी कारगर माने जाते हैं, जब उसके पास अधिक से अधिक आंकड़े हों।

निस्संदेह, थियेटर कमान बनाने की जरूरत थी, पर हमें डिजिटल थियेटर कमान की भी दरकार है। सरकारी मंचों पर ‘सॉवरेन एआई’ की बात बार-बार कही जाती है। दावा किया जा रहा है कि 12 स्वदेशी ‘सॉवरेन एआई’ मॉडल विकसित किए जा रहे हैं। अपना इन्फ्रास्ट्रक्चर, डाटा, कार्यबल और नियामक ढांचा बनाने पर जोर दिया जा रहा है। अगर इन 12 मॉडल में से दो-तीन फौज को दे दिए जाएं और स्वदेशी स्टार्टअप कंपनियों से डाटा तैयार किया जाए, तो हमारी सुरक्षा व्यवस्था को नई धार मिल सकती है। इस पूरी प्रक्रिया से विदेशी कंपनियों को बाहर रखना जरूरी है, क्योंकि बाहरी कंपनियों से डाटा साझा करने के अपने खतरे हैं।

यह सुखद है कि नई तकनीक को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नजरिया स्पष्ट है। उन्होंने 2035 तक ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ पूरा कर लेने की बात कही है, जो एक बहुस्तरीय वायु और मिसाइल रक्षा प्रणाली है। हालांकि, इसके साथ-साथ हमें थल सेना के लिए भी एआई लैस घातक सुरक्षा तंत्र विकसित करना चाहिए, जो सीमा के साथ-साथ आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करे। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान जिस तरह नई दिल्ली पर मिसाइल दागी गई थी या सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा में सेंध लगाने का प्रयास किया गया था, उसको देखते हुए ऐसा करना और जरूरी है। पाकिस्तान तुलनात्मक रूप से छोटा मुल्क है, इसलिए उसकी मिसाइलों को इंटरसेप्ट करना आसान था, लेकिन चीन की रॉकेट सेना काफी घातक मानी जाती है। इसलिए, सीमा सुरक्षा से अब हमें मुख्यभूमि की सुरक्षा की ओर बढ़ना चाहिए।

दिक्कत यह है कि रक्षा बजट को हम ‘पूंजी’ व ‘राजस्व’ के चश्मे से देखने के आदी हो गए हैं। जबकि, हमें यह देखना चाहिए कि एआई, क्वांटम या नई प्रौद्योगिकी को आत्मसात करने पर हम कितना खर्च कर रहे हैं? राफेल जैसे विमान हमारी सुरक्षा व्यवस्था को तभी मजबूत बना सकते हैं, जब वे एआई से सक्षम और आधुनिक तकनीक से लैस हों। यह ‘सॉफ्टवेयर आधारित युद्ध’ का दौर है। इसमें वही देश आगे रहेगा, जो नई-नई प्रौद्योगिकी में न सिर्फ निवेश करेगा, बल्कि उनको खुले दिल से अपनाएगा।

हमें अब ‘तकनीक-प्रथम सेना’ की ओर कदम बढ़ाना चाहिए। एआई के मामले में वैश्विक तौर पर अमेरिका और चीन, दो ताकतवर देश हैं। अमेरिका जहां कंप्यूटिंग और हार्डवेयर का सरताज है, वहीं चीन की ताकत सॉफ्टवेयर और ऊर्जा है। वह हर दिन एक गीगावाट बिजली की उत्पादन क्षमता बढ़ा रहा है। उधर, अमेरिका में हर दिन एक अरब डॉलर का निवेश किया जा रहा है। हम फिलहाल उनकी बराबरी नहीं कर सकते, लेकिन तकनीक के जरिये बचाव के उपाय जरूर तलाश सकते हैं। हमारे पास भरपूर प्रतिभा है, राजनीतिक इच्छाशक्ति भी है, हमें सिर्फ अपने नौकरशाहों की नीयत ठीक करनी होगी। अगर ऐसा कर सके, तो अगले पांच-सात साल में हम काफी विकसित हो जाएंगे। ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य तक पहुंचते-पहुंचते हम शीर्ष वैश्विक सैन्य ताकत भी बन सकते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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