औरतों को हक देने में और देरी सही नहीं
भारतीय संसद तीन दिवसीय सत्र में एक ऐसे युगांतकारी विधेयक पर चर्चा कर रही है, जो हमारे विकसित राष्ट्र के सपने को साकार करने में मील का पत्थर साबित होगा। नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल सीटों का आरक्षण नहीं है…

नितिन नवीन, राष्ट्रीय अध्यक्ष, भाजपा
भारतीय संसद तीन दिवसीय सत्र में एक ऐसे युगांतकारी विधेयक पर चर्चा कर रही है, जो हमारे विकसित राष्ट्र के सपने को साकार करने में मील का पत्थर साबित होगा। नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल सीटों का आरक्षण नहीं है, यह उन करोड़ों महिलाओं के सपनों की उड़ान है, जो भारत को समृद्ध, सुरक्षित और सशक्त बनाने की भूमिका में अपनी आहुति देना चाहती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के अनुरूप हम एक ऐसे भारत का निर्माण कर रहे हैं, जहां नारी केवल ‘सहायक’ नहीं, बल्कि ‘2047 तक विकसित भारत’ के निर्माण की ‘मार्गदर्शक’ होगी।
नारी शक्ति के लिए आरक्षण का मुद्दा लगभग तीन दशकों तक संसद में लटका रहा। कई बार इसके लिए प्रयास हुए, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और अकारण विरोध के कारण यह बिल तब कानून नहीं बन पाया। अब जब यह हकीकत बनने जा रहा है, तो विपक्ष को ‘केवल विरोध के लिए विरोध करने’ के बजाय एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में स्वीकार कर राष्ट्र-निर्माण में अपनी भागीदारी दिखानी चाहिए, ताकि उसके ऊपर का यह ‘दाग’ मिटाया जा सके कि विपक्ष हर उस कदम का विरोध करता है, जिससे देश-समाज का भला होता है या नारी शक्ति का सशक्तीकरण होता है। दुनिया के कई विकसित देशों के नीति-निर्धारण में स्त्रियों की भागीदारी बहुत अधिक है। भारत जैसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि उसकी आधी आबादी का प्रतिनिधित्व केवल प्रतीकात्मक न रहे। विपक्ष का समर्थन यह संदेश देगा कि भारत का संपूर्ण राजनीतिक नेतृत्व लैंगिक समानता के प्रति एकजुट है, जिससे वैश्विक मंच पर भारत की लोकतांत्रिक छवि और मजबूत होगी।
भारतीय जनता पार्टी के लिए यह केवल एक बिल नहीं, बल्कि नारी शक्ति के सम्मान की वह उद्घोषणा है, जिसे साकार करने का सपना हम दशकों से देख रहे थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और स्वाभिमान को अपनी नीतियों के केंद्र में रखा है। उन्होंने महिलाओं की गरिमा, उनके सशक्तीकरण को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाया।
महिलाओं के जीवन के हरेक चरण में उनके सशक्तीकरण के लिए योजनाओं का एक व्यापक तंत्र तैयार किया गया है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, मुद्रा योजना, स्टार्ट-अप योजना, स्टैंड-अप योजना, स्वच्छ भारत अभियान, प्रधानमंत्री आवास योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, मिशन इंद्रधनुष, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, ड्रोन दीदी, लखपति दीदी, महिला स्वयं सहायता समूह आदि योजनाओं ने देश की स्त्रियों को न केवल गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार दिया है, बल्कि देश की प्रगति में उन्हें आर्थिक ताकत भी बनाया है। यह हमारे प्रधानमंत्री ही हैं, जिनके नेतृत्व में सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को ‘ट्रिपल तलाक’ के दंश से मुक्ति दिलाकर सम्मानपूर्ण जीवन का हक दिया है।
ये सारी योजनाएं महिला सशक्तीकरण के प्रति हमारी सरकार की अटूट प्रतिबद्धता का ही प्रमाण हैं। अब नीति-निर्धारण में उनकी सक्रिय भूमिका के लिए प्रधानमंत्री ये तीनों विधेयक लेकर आए हैं। यह केवल आश्वासन नहीं है, बल्कि उनकी स्पष्ट दृष्टि है कि वर्ष 2029 से संसदीय प्रणाली में महिलाओं की 33 प्रतिशत मौजूदगी रहे, वे सशक्त हों, नीति-निर्धारण में उनकी निर्णायक भूमिका हो और वे देश की मुखर आवाज बनें।
अब तक विपक्ष प्रश्न उठाता रहा है कि महिलाओं को आरक्षण देने के लिए परिसीमन तक का इंतजार क्यों किया जाए, उन्हें आरक्षण तुरंत दीजिए। साल 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के पारित होने के समय उनकी यही मांग थी। हालांकि, तब सात-आठ महीने के भीतर ही लोकसभा चुनाव होने वाले थे और इतनी जल्दी आरक्षण के लिए कानून बनाना संभव नहीं था। अब अगर हमने इस समय नारी शक्ति को अधिकार नहीं दिए, तो बहुत देर हो जाएगी और जैसा कि प्रधानमंत्री ने भी कहा है, अगर हम इस समय इन तीनों विधेयक का विरोध करते हैं, तो आधी आबादी को कभी विश्वास नहीं दिला पाएंगे कि उनके अधिकारों को हम सम्मान देना चाहते हैं।
भारत की बेटियां आज केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि ‘नेतृत्वकर्ता’ बन रही हैं। प्रधानमंत्री का मानना है कि जब एक महिला आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती है, तो पूरा परिवार और समाज सशक्त होता है। आज हमारी बेटियां न केवल सफलतापूर्वक कंपनियां चला रही हैं, बल्कि फाइटर प्लेन भी उड़ा रही हैं। खेल से लेकर कला तक और अर्थव्यवस्था से लेकर डिफेंस तक महिलाएं आज हर जगह परचम लहरा रही हैं। यह सूची अनंत है, जो प्रमाणित करती है कि नारी शक्ति जीवन के हर क्षेत्र में निर्णायक भूमिका में है।
संसद में महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित करने का निर्णय ‘वैदिक गरिमा’ और ‘आधुनिक प्रगति’ का सुंदर संगम है। इसमें ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास और सबका विश्वास’ की पवित्र भावना शामिल है। यह विधेयक उन करोड़ों माताओं-बहनों के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता का प्रतीक है, जिन्होंने परिवार और समाज के निर्माण में स्वयं को खपा दिया। इस बदलाव का क्रांतिकारी प्रभाव हमारे ग्रामीण भारत पर पड़ेगा, जहां महिलाएं अब नेतृत्वकारी भूमिका में उभरेंगी। यह सक्रिय भागीदारी सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ेगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा वातावरण बनाएगी, जहां बेटियां केवल सपने नहीं देखेंगी, बल्कि उन्हें साकार करने का सामर्थ्य और वैधानिक अधिकार भी रखेंगी।
जैसा कि प्रधानमंत्री का मानना है, यह अधिनियम किसी एक पार्टी के एजेंडे की जीत नहीं, बल्कि सभी के प्रयासों की जीत है, राष्ट्र जीवन का निर्णायक पल है। हमारी संसद देश के प्रबुद्ध और उत्तरदायी जन-प्रतिनिधियों का मंदिर है। राष्ट्र की जनता हमारी हर गतिविधि और सरोकार को सूक्ष्मता से परखती है। माननीय सांसदों से यह अपेक्षा है कि वे राष्ट्र के सामूहिक मन को समझेंगे। आज समय की मांग है कि हम दलगत सीमाओं से ऊपर उठें। इस महान संस्था के सदस्य होने के नाते मेरी अपील है कि इस नारी शक्ति के सामर्थ्य और स्वावलंबन के ‘अभिषेक अनुष्ठान’ में अपने समर्थन की आहुति अर्पित करें।
यह सामूहिक प्रयास ही सुनिश्चित करेगा कि भविष्य का भारत न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि सामाजिक न्याय और नारी गौरव के मामले में भी विश्व का नेतृत्व करने में सक्षम है। हमारा सामूहिक प्रयास ही समर्थ और सशक्त भारत के निर्माण में मातृ-शक्ति की निर्णायक भूमिका तय करेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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