सम्राट चौधरी को कमान सौंपने के मायने

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बिहार में भारतीय जनता पार्टी के लिए यह एक नए युग की शुरुआत है। ‘1 अणे मार्ग’ भाजपा का पुराना सपना रहा है। वह हिंदी पट्टी के तमाम राज्यों में सत्ता के शीर्ष पर पहुंच चुकी है, पर बिहार अब तक अपवाद था। सबसे बड़ा दल होने के बावजूद यहां उसकी भूमिका ‘जूनियर पार्टनर’ की ही थी…

सम्राट चौधरी को कमान सौंपने के मायने

नीरजा चौधरी, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक

बिहार में भारतीय जनता पार्टी के लिए यह एक नए युग की शुरुआत है। ‘1 अणे मार्ग’ भाजपा का पुराना सपना रहा है। वह हिंदी पट्टी के तमाम राज्यों में सत्ता के शीर्ष पर पहुंच चुकी है, पर बिहार अब तक अपवाद था। सबसे बड़ा दल होने के बावजूद यहां उसकी भूमिका ‘जूनियर पार्टनर’ की ही थी। अब तस्वीर बदल गई है। बुधवार को सम्राट चौधरी के शपथ-ग्रहण के साथ यहां नीतीश-युग का भी विधिवत अंत हो गया है।

एक ओबीसी नेता को ताज सौंपना भाजपा के लिए बिहार में काफी अहमियत रखता है। इसके अपने निहितार्थ हैं, जो पाटलिपुत्र तक सीमित नहीं हैं। भाजपा का ‘ओबीसीकरण’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुआ है। हालांकि, ‘यूजीसी बिल’ का हो रहा विरोध और पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई को मिली हालिया सफलता एक चेतावनी है, पर लगता है कि भाजपा ने सोच-समझकर यह कदम उठाया है। उसके वरिष्ठ नेता कहते रहे हैं कि ओबीसी वोट-बैंक उनकी प्राथमिकता में है। सम्राट की सत्ता इसी प्राथमिकता की अगली कड़ी है। ऐसा करके पूरे उत्तर भारत को संदेश देने की कोशिश की गई है। आकलन है, साल 2024 के आम चुनाव में, विशेषकर पूर्वी उत्तर प्रदेश से जो ओबीसी वोट छिटका था, उसकी कुछ क्षतिपूर्ति इससे हो सकती है।

जाहिर है, इससे भाजपा के जनाधार में वृद्धि होगी। उप-मुख्यमंत्रियों का चयन भी इसी रणनीति का हिस्सा है। सम्राट चौधरी के साथ बुधवार को जनता दल (यू) नेता विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र यादव ने भी शपथ ली। विजय चौधरी बेशक नीतीश कुमार के बेहद करीबी माने जाते हैं, मगर वह जिस भूमिहार जाति से ताल्लुक रखते हैं, वह भाजपा का मतदाता-आधार रहा है। बिजेंद्र यादव को आगे करके भाजपा ने राजद के यादव वोट-बैंक में सेंध मारने की कोशिश की है।

नए मुख्यमंत्री को अगर कुछ मामलों में सहूलियत हासिल है, तो कई जगहों पर उन्हें चुनौतियों से भी जूझना पड़ सकता है। निश्चय, वह भाजपा नेतृत्व के काफी करीबी माने जाते हैं, लेकिन क्या उनको बिहार में वही आजादी मिल सकेगी, जो असम में हिमंत बिस्वा शर्मा को मिली? आज हिमंत पूर्वोत्तर के बड़े राजनेताओं में शुमार हैं। सवाल है, क्या सम्राट चौधरी भी पूर्व में उसी तरह आगे बढ़ाए जाएंगे?

बिहार को आर्थिक मुश्किलों से बाहर निकालना भी उनकी एक बड़ी चुनौती होगी। निस्संदेह, लालू-नीतीश राज में बिहार एक बड़े सामाजिक बदलाव का गवाह रहा है, लेकिन आर्थिक रूप से यह सूबा काफी ज्यादा तरक्की नहीं कर सका। आज भी इसकी आर्थिकी बहुत खराब है और इसकी गिनती ‘मजदूर आपूर्ति’ करने वाले सूबों में होती है। ऐसे में, बिना आर्थिक विकास किए यहां बदलाव का नया दौर लाना मुश्किल होगा। नए-नए उद्योगों के लिए निवेश जुटाना और इसके लिए यहां की आर्थिकी को संवारना आज की जरूरत है।

नीतीश शासन की यह खासियत थी कि उसमें कानून-व्यवस्था पर खासा जोर दिया गया था। ध्रुवीकरण की राजनीति को भी सुशासन बाबू ने कभी सफल नहीं होने दी। ऐसे में, नीतीश की राजनीति को कायम रखते हुए नए मुख्यमंत्री को राज्य की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ानी होगी।

यह तय है कि अगर जद (यू) के पास कोई ‘स्पष्ट उत्तराधिकारी’ होता, जिस तरह राजद ने तैयार किया है, तो बात कुछ और होती। नीतीश कुमार ने अपने बेटे निशांत को सियासत में उतारा जरूर, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। नतीजतन, आज खुद निशांत उप-मुख्यमंत्री पद से दूरी बरतते दिखे हैं। हालांकि, कहा यह भी जा रहा है कि खुद नीतीश कुमार चाहते थे कि वह पहले राजनीति में तपें। समय पर उत्तराधिकारी का चयन कितना अहम होता है, यह वह लालू यादव से सीख सकते थे। तेजस्वी यादव को भले ही चुनावों में मात मिलती रही है, लेकिन एक नेता के रूप में वह राजद और राज्य, दोनों जगह स्थापित हो चुके हैं।

जद (यू) का सिर्फ यही एक संकट नहीं है। उसके कुछ वरिष्ठ नेताओं पर भाजपा से मिलीभगत के आरोप हैं, तो कुछ के राजद में जाने का अंदेशा। यह पार्टी के भविष्य के लिए सुखद नहीं है। बेशक, आज यह राज्य की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन दिल्ली से नीतीश कुमार इसे कितना संभाल पाएंगे, इस पर सवाल बना हुआ है। दबी जुबान यह भी चर्चा है कि देर-सवेर भाजपा इस पर प्रभाव जमा सकती है। हालांकि, ऐसा फिलहाल होता नहीं दिख रहा। सरकार को स्थिर बनाए रखने के लिए शायद ही इसमें अभी कोई छेड़छाड़ की जाएगी। हां, समय बीतते-बीतते, संभवत: अगले विधानसभा चुनाव तक जद (यू) के मतदाता-आधार को हड़पने के प्रयास जरूर किए जा सकते हैं। इसमें अन्य दलों की भूमिका भी दिख सकती है।

जाहिर है, भाजपा ने यहां बड़ी बाजी खेली है। हालांकि, यह तो लग रहा था कि नीतीश कुमार अपने वारिस की तलाश में हैं। नवंबर, 2025 के विधानसभा चुनाव में भी उनकी राजनीति का कथित अंत एक बड़ा मुद्दा था। मगर राज्य की राजनीति इतनी जल्दी करवट ले लेगी, इसका अंदेशा शायद ही उनको रहा होगा। आखिर भाजपा इस कदर उतावली क्यों थी? दरअसल, बिहार को ‘पूर्व का प्रवेश-द्वार’ कहा जाता है। भाजपा इसके पूर्व और पश्चिम, दोनों ओर अपनी पैठ बनाना चाहती है। पश्चिम बंगाल का चुनाव उसके लिए काफी अहमियत रखता है। ऐसे में, बिहार की सत्ता बंगाल को ‘संदेश देने’ का काम कर सकती है।

फिर, पश्चिम एशिया के युद्ध ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को प्रभावित किया है, जिसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। लिहाजा, लोगों की नाराजगी यदि बढ़ी, तो सत्तासीन भाजपा के लिए उसे संभालना अधिक आसान हो सकता है। यही नहीं, नीतीश कुमार अपने अप्रत्याशित बयानों के कारण भी सुर्खियां बटोरते रहे हैं। मुस्लिम आधार की वजह से यदि ईरान युद्ध को लेकर वह कुछ ‘अलग’ बोल जाते, तो भाजपा के लिए चुनौती बढ़ सकती थी। संभव है, इन्हीं सबको देखते हुए भाजपा ने तेज कदम बढ़ाया है।

जाहिर है, अब नजरें सम्राट चौधरी पर ही रहेंगी। वह क्या करते हैं और किस दिशा में आगे बढ़ते हैं, इसका आकलन होता रहेगा। वह नीतीश कुमार की राजनीति पर चलेंगे और ध्रुवीकरण की राजनीति से दूरी बरतेंगे या दूसरी राह चुनेंगे, यह तो आने वाले दिनों में ही पता चल सकेगा, लेकिन इतना तय है कि अभी उन्हें कई मोर्चों पर खुद को साबित करना होगा।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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